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भौतिकतावाद में सिमटती संवेदनाएं

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भौतिकतावाद  में सिमटती संवेदनाएं भटकाव का चक्रव्यूह “जब इंसान अंदर से पूरी तरह खाली और भटका हुआ हो जाता है, तो वह उस भयानक खालीपन को बाहर की निर्जीव वस्तुओं और व्यर्थ के शोर से भरने की कोशिश करता है।” हां यह सच है कि आज का इंसान इतना ज्यादा व्यस्त रहता है, जितना पहले कभी नहीं था। लेकिन सच यह भी है कि इतनी व्यस्तताओं के बाद भी वह जितना आज अकेला है उतना पहले कभी अकेला और खाली नहीं रहा।  चारों तरफ रोशनी है, स्क्रीन्स चमक रही हैं, आवाजें गूंज रही हैं, लेकिन अंदर एक सन्नाटा है जो दिन-ब-दिन गहरा होता जा रहा है। और इस भयावह सन्नाटे में आज का इंसान भटक गया है। लेकिन यह भटकाव कोई संयोग मात्र नहीं है।  पूरी दुनिया में अधिकांश सत्ता के शासकों द्वारा अपनी सत्ता को लंबे समय निर्बाध रूप से संचालित करने के लिए पर्दे के पीछे ऐसी गुप्त कूटनीति ( मनोरंजन की अफीम का चक्रव्यूह ) बनाई जाती है कि जिससे आम जन मानस, खासकर युवा वर्ग उसमें उलझ कर अपने मूल उद्देश्य से भटक जाए। जिसका उल्लेख इस लेख में विस्तार से आगे है। इस लेख में हम इन विचारों को विस्तार से समझेंगे, भारतीय संदर्भ में उनके प्रभावों ...

मुखौटों का बाजार

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                  मुखौटों का बाजार इंसानी समाज में मुखौटों का बाजार  हम सब बाजार जाते हैं, दुकानों पर सामान देखते हैं, पर एक बाजार ऐसा भी है जो दिखता नहीं, पर हर गली, हर मोहल्ले, हर ऑफिस, हर सोशल मीडिया की स्क्रीन पर लगा हुआ है। वह है, इंसान द्वारा पहने गए "मुखौटों का बाजार" और यह बाजार दिन पर दिन महंगा होता जा रहा है। यहां तक कि आज के पूरे विश्व में सबसे बड़ा बाजार यदि किसी चीज का गर्म है, तो वह है "मुखौटों का बाजार"। विभिन्न प्रकार के मुखौटे और उनकी कीमत आज समाज में लगभग हर इंसान तरह तरह के मुखौटे लगाए हुए है। लोगो की असलियत को जो मुखौटा सफलता पूर्वक सबसे ज्यादा और दीर्घकालिक छुपा देता है, उसकी कीमत सबसे अधिक होती है। कुछ मुखौटे ज्यादा दिन तक असलियत नहीं ढक पाते हैं, स्वाभाविक रूप से उसकी कीमत कम होगी। एक मुखौटा पारदर्शी होता है, जिसकी कीमत नकारात्मक में चली जाती है। ऐसे मुखौटे पहले ही दिन से इंसान की असलियत को ढक पाने में असमर्थ होते हैं। इसका अर्थ ये है कि जो इंसान अपनी असलियत को छुपाने के लिए जितना अच्छा मुखौटा लगायेगा, समाज में उसक...

गांव का सच और हमारी सोच, पगडंडी से चौपाल तक

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गांव का सच और हमारी सोच  पगडंडी से चौपाल तक,  शोर में दबा हुआ सच गांव की पगडंडी पर जब हम चलते हैं, तो पैर के नीचे सिर्फ मिट्टी नहीं होती, बल्कि पूरी एक कहानी होती है, कई पीढ़ियों का एक इतिहास होता है। यह वही मिट्टी है जिसने हमें चलना सिखाया, जिसने हमारे दादा-परदादा को अन्न दिया। यह खेत, यह बगिया, यह पोखरा, यह बरगद के नीचे की चौपाल, यह सब हमारी पहचान है। शहर में लोग एड्रेस से पहचाने जाते हैं, गांव में लोग मिट्टी से पहचाने जाते हैं। दरअसल इसी मिट्टी के नीचे में हमारी जड़ें हैं। पर आज जब उसी पगडंडी पर चलते हुए मैं लोगों की आंखों में देखता हूं, तो एक अजीब सा बोझ दिखता है। चेहरे पर झुर्रियां तो पहले भी थीं, पर अब उन झुर्रियों में चिंता ज्यादा है। आंखों में थकान ज्यादा है। लोग हंसते तो हैं, पर वह हंसी खुलकर नहीं निकलती। लगता है जैसे भीतर कुछ घुट रहा है। आज का समय बड़ा अजीब है। अब गांव में भी चारों तरफ शोर है। सुबह-सुबह मंदिर में लाउडस्पीकर पर भजन, दोपहर में टीवी पर नेता लोगन की बहस, शाम को मोबाइल में टिक-टिक नोटिफिकेशन, और बाजार में सब्जी वाले की चिल्लाहट। इतना शोर है कि आ...

"गरीब और अमीर", दुनिया में दो ही जाति और धर्म

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"गरीब और अमीर",  दुनिया में दो ही जाति और धर्म.... आज की दुनिया में बस, दो ही जाति और धरम ! नए नजरिए से देखिए, तो दूर हो जाएगा भरम  !! अपना परंपरागत रूढ़िवादी चश्मा उतार कर फेंक दीजिए और नए सिरे से, नए नजरिए का साफ चश्मा पहन कर अपने अगल बगल से लेकर दुनिया भर को देखिए तो आपको मेरी उपरोक्त दो पंक्तियों का संदेश स्पष्ट दिखने लगेगा। यदि अभी भी कुछ धुंधला दिख रहा है, तो पूरा लेख अवश्य पढ़ें... दरअसल दुनिया भर का मानव समाज अनगिनत जातियों, धर्म, भाषाओं और रंगबिरंगी संस्कृतियों से भरा हुआ हैं। लोग अलग-अलग देशों में रहते हैं, अलग-अलग रीति-रिवाजों को मानते हैं। लेकिन अगर हम गहराई से देखें तो सच्चाई यह है कि मानव समाज वास्तव में सिर्फ दो हिस्सों में बंटा हुआ है, गरीब और अमीर। यह विभाजन न किसी देश की सीमा से जुड़ा है, न किसी रंग या भाषा से। यह वह रेखा है जो हर इंसान के जीवन को सबसे गहरे स्तर पर छूती है। यह लेख इसी सच्चाई को सरल शब्दों में समझाने की कोशिश करता है। हम देखेंगे कि यह फर्क क्या है, यह कैसे पैदा होता है, इसका असर क्या है और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न ये है कि इसे कैसे मिटाया जा ...

फौजी: जीते जी उपेक्षा, शहादत पर श्रद्धांजलि

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फौजी: जीते जी उपेक्षा, शहादत पर श्रद्धांजलि   एक कठोर सत्य और चिंतन जब कोई फौजी शहीद होता है, तो पूरा देश एक स्वर में उसकी वीरगति पर श्रद्धांजलि अर्पित करता है। तिरंगे में लिपटी उसकी देह पर फूल बरसाए जाते हैं, सड़कें बंद हो जाती हैं, सोशल मीडिया पर भावुक पोस्ट्स वायरल होते हैं, नेता मंच से भाषण देते हैं, और स्कूलों में बच्चे “सैनिक हमारा गौरव है”,"जय जवान जय किसान" जैसे नारे लगाते हैं।  लेकिन असलियत ये है कि किसान और जवान के अपने परिवार के अंदर चल रही रोजमर्रा के जीवन की परेशानियों से समाज में किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता और ऐसे में उनकी कितनी जय है, ये भी सब जानते हैं। क्या हमने कभी ठहरकर यह सोचा है कि जब वही फौजी अपनी वर्दी में सांस लेता हुआ, अपने परिवार के साथ होता है, तब समाज उसके साथ क्या व्यवहार करता है ? क्या उसे या उसके परिवार को वह सम्मान, वह सहानुभूति और वह सहयोग मिलता है, जिसका वह वाकई हकदार है ? लेकिन वहीं उसकी शहादत की खबर सुनते ही क्षणिक भीड़ अचानक उमड़ पड़ती है। क्यों...? यह प्रश्न दुखद है, लेकिन जरूरी है। यह हमारी सामाजिक चेतना की परीक्षा है। यह लेख केवल ए...