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जून, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

समाज और परिवार में संवाद का क्षय

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परिवार और समाज में राजनीतिक बहस संवादहीनता का संकट और सामाजिक पुनरुत्थान का मार्ग.... लगभग तीन दशक पूर्व, भारतीय घरों की बैठकें और समाज की गोष्ठियाँ विचारों का जीवंत केन्द्र हुआ करती थीं। शाम ढलते ही चाय की केतली चूल्हे पर चढ़ती, और लोग धर्म, शिक्षा, संस्कृति, नैतिक मूल्यों तथा जीवन की गहराइयों पर चर्चा करते।  बच्चे, बुजुर्गों के पैर छूते, उनकी कहानियाँ सुनते; महिलाएँ घर-गृहस्थी के साथ-साथ सामाजिक मुद्दों में अपनी भूमिका निभातीं। असहमति होती, लेकिन गरिमा के साथ। संवाद में संवेदना होती, सहमति में उत्साह और असहमति में भी सम्मान। वह समय था जब परिवार एक जीवित इकाई था न कि विवाद-कक्ष। समाज एक बुनाव था, न कि टूटे तारों का ढेर। किंतु धीरे-धीरे, जैसे-जैसे टेलीविजन, सोशल मीडिया और 24×7 न्यूज़ चैनलों का वर्चस्व बढ़ा, “राजनीति” ने संवाद के सिंहासन पर कब्जा कर लिया। आज सुबह की चाय से लेकर रात के भोजन तक, हर मेज पर वही एक विषय घूमता है, राजनीति।  बेरोजगारी, शिक्षा की बदहाली, स्वास्थ्य व्यवस्था की खामियाँ, ग्रामीण-नगरीय असंतुलन जैसे वास्तविक सामाजिक मुद्दे चर्चा से गायब हो चुके हैं। परिवारि...

“वृद्धावस्था और हमारी पारिवारिक जवाबदेही

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वृद्धाश्रम की एक दीवार घड़ी..    (एक रुकी  हुई धड़कन की करुण कहानी) समय की सिसकियाँ और दिल की चीखें... हर घर की दीवारों पर टंगी घड़ी महज समय की साक्षी नहीं होती। वह परिवार की धड़कन होती है, रिश्तों की लय, और कभी-कभी टूटे हुए सपनों की करुण गाथा। लेकिन कुछ घड़ियाँ ऐसी भी होती हैं, जो समय बताने से इनकार कर देती हैं ।  वे प्रतीक्षा की असहनीय पीड़ा को गिनती हैं, टूटे हुए वादों की गूंज को सहेजती हैं, और उस मौन को कैद करती हैं जो शब्दों से कहीं अधिक वजनदार होता है, दिल को चीरता हुआ, आत्मा को खोखला करता हुआ, जैसे कोई अनसुनी चीख जो रातों की नींद उड़ा देती है। यह दास्तान एक वृद्धाश्रम की है  जहाँ हवाएँ उम्मीद की जगह उदासी की ठंडी साँसें लाती हैं और हर कोना अकेलेपन की सिसकियों से गूँजता है। यह कहानी एक पिता की है, जिनके जीवन की किताब अधर में लटक गई और आंसुओं से भीग गई। और यह उस घड़ी की दास्तान है...जो 01:45 पर ठहर गई, जैसे दिल की आखिरी साँस रुक गई हो। एक ऐसा ठहराव, जो कभी न खत्म होने वाली प्रतीक्षा का प्रतीक बन गया, लेकिन हर पल में एक पिता का टूटा हुआ दिल धड़कता रहा। एक वृ...

ब्लॉग की शुरुआत : क्यों बना सामाजिक ताना-बाना

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                सामाजिक ताना-बाना  ब्लॉग की शुरुआत : क्यों बना सामाजिक ताना-बाना ​एक विचार का जन्म ​जीवन की पाठशाला में हम रोज़ अनगिनत अनुभवों से गुज़रते हैं। कुछ अनुभव हमें हँसाते हैं, कुछ रुलाते हैं, तो कुछ हमारे भीतर एक ऐसा मौन छोड़ जाते हैं जो समय के साथ गहरा होता चला जाता है। हर परिवार में, हर रिश्ते में और समाज के हर कोने में कुछ ऐसा अनकहा दर्द, कुछ ऐसी अनछुई खुशियाँ और कुछ ऐसे अहसास होते हैं, जिन्हें केवल महसूस किया जा सकता है, पर कई वजहों से शब्दों में कहा नहीं जा पाता। ​जब मैंने इस मौन को बहुत करीब से देखा, तो मेरे भीतर एक बेचैनी ने जन्म लिया। मुझे महसूस हुआ कि इन अनकहे भावों को, इन दबे हुए अहसासों को एक ज़ुबान मिलनी चाहिए। बस, इसी आकुलता और विनम्र कोशिश का परिणाम आपके सामने है.... "सामाजिक ताना-बाना" । शुरुआत का वह पहला कदम ​जब मैंने इस ब्लॉग की यात्रा की शुरुआत की थी, तब मेरे मन में भावनाओं का एक सैलाब था और शब्दों की एक छोटी सी डगर। उस समय मैंने अपने पाठकों का स्वागत करते हुए कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं, जो आज भी इस ब्लॉग...