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बिखरते एकल परिवार

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            बिखरते एकल परिवार .... इस वृहद् आलेख में न केवल सामाजिक ताने-बाने के बिखरने के मनोवैज्ञानिक, नीतिगत और वैश्विक कारणों का गहरा विश्लेषण है, बल्कि इसमें आने वाली पीढ़ी को एक सुदृढ़ व्यवस्था देने के लिए व्यावहारिक (समाधानों की एक मुकम्मल रूपरेखा भी प्रस्तुत की गई है। सामाजिक ताने-बाने के समक्ष वैचारिक विसंगतियाँ यह लेख समाज, परिवार, शिक्षा और नीतिगत मसलों पर गहराई से सोचने के लिए एक वैचारिक दस्तावेज़ के रूप में, वैश्विक चुनौतियाँ और नीतिगत समाधान आपके सामने है । १ आधुनिकता की वेदी पर होम होते रिश्ते मानव सभ्यता के इतिहास में 'परिवार' केवल व्यक्तियों का एक समूह मात्र नहीं रहा है, बल्कि यह वह पहली पाठशाला है जहाँ मनुष्य सामाजिक जीव बनना सीखता है। भारतीय मनीषा ने तो संपूर्ण विश्व को ही एक परिवार मानकर 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का उद्घोष किया था। इस  विचार की धुरी, हमारा वह पारंपरिक 'संयुक्त परिवार' (Joint Family) था, जिसने सदियों तक हमारे सामाजिक ताने-बाने को एक अटूट मजबूती प्रदान की।  संयुक्त  परिवार केवल एक आर्थिक या रहने की व्यवस्था नहीं थ...

वर्किंग पेरेंट्स और सिसकता बचपन

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  वर्किंग पेरेंट्स और सिसकता बचपन   गगनचुंबी इमारतें और खोते हुए आँगन इक्कीसवीं सदी का वैश्विक समाज विकास के उस शिखर पर है, जहाँ तकनीक, आर्थिक समृद्धि और करियर की ऊँची उड़ान ने इंसानी जीवन को सुगम, तीव्र और वैभवशाली बना दिया है। आज के आधुनिक माता-पिता के पास अपने बच्चों को देने के लिए बेहतरीन अंतरराष्ट्रीय स्कूल हैं, आधुनिकतम इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स हैं, महंगे ब्रांडेड कपड़े हैं और विदेशों में छुट्टियाँ बिताने के असीमित साधन हैं।  लेकिन इस चौंधिया देने वाली चमक-दमक के पीछे, आधुनिक घरों के बंद आलीशान कमरों से एक खामोश सिसकी भी निरंतर सुनाई दे रही है। यह सिसकी किसी शारीरिक चोट की नहीं, बल्कि एक ऐसे गहरे, अंधकार वाले दमघोंटू अकेलेपन की है जिसमें आज का नौनिहाल बचपन तिल-तिल कर दम तोड़ रहा है। "वर्किंग पेरेंट्स... घर में सिसकता बचपन और बाहर करियर की ऊँची उड़ान"

जब बच्चे बात सुनना बंद कर देते हैं: माता-पिता क्या करें ?

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जब बच्चे बात सुनना बंद कर देते हैं: माता-पिता क्या करें ? सामाजिक ताना-बाना के लिए एक विचारशील लेख किशोरावस्था वो उम्र है जब घर में सबसे ज़्यादा कहानियां बनती हैं और साथ ही सबसे ज़्यादा दरवाज़े भी घर के ही बंद होते हैं। कल तक जो बच्चा हर छोटी से छोटी बात, अपनों को बताने दौड़कर आता था, आखिर क्यों आज वही आंखें चुराता है, जवाब में "हम्म" बोलता है या कमरे का दरवाज़ा भिड़ा देता है।  और फिर माता-पिता के लिए बच्चों का ऐसा व्यवहार और बच्चे की यह चुप्पी, शोर से भी ज़्यादा डरावनी होती है। अब यहां उनके अंदर कई तरह के सवाल उठते हैं कि "क्या बच्चे की परिवरिश में हमसे कोई गलती हो गई ? क्या हमारा बच्चा हाथ से निकल रहा है या निकल गया? यह लेख इसी मानसिक द्वंद्व और शारीरिक संघर्ष को समझने और सुलझाने की कोशिश है। हम इस लेख में, किशोर मस्तिष्क, बदलते रिश्ते, संवाद के टूटने की वजहें और उसे जोड़ने के व्यावहारिक तरीके देखेंगे। 1. किशोरावस्था: विद्रोह नहीं, विकास का दूसरा नाम सबसे पहले ये समझना जरूरी है कि किशोर का "बात न सुनना" हमेशा अनादर नहीं होता। शारीरिक और मानसिक परिवर्तन, एक स...

सास-बहू संबंध और बेटियों की परवरिश : रिश्तों की जड़ों में छिपा सामाजिक सच

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सास-बहू संबंध और बेटियों की परवरिश   रिश्तों की जड़ों में छिपा सामाजिक सच      क्या कभी आपने सोचा है जो बच्चियां, जो बेटियां अपने घर में, शादी से पूर्व तमाम खूबियों से परिपूर्ण, घर की रौनक, घर में खुशहाल माहौल बनाने वाली और सब की प्यारी दुलारी होती हैं, वही जब शादी के बाद अपने ससुराल में जाती हैं तो अचानक वहां से उनकी तमाम कमियां और शिकायतें बताई जाने लगती हैं। हमारी सामाजिक परंपरा के अनुसार, बेटी को लड़के के माता पिता और अन्य परिवारीजन बारात लेकर उसे ब्याह कर अपने घर लाते हैं और उसे अपने परिवार के साथ जोड़ते हुए उसका पूरे समाज के सामने स्वागत करते हैं। लड़के का परिवार भरापूरा तो पहले से ही वहीं था, किंतु  बेटी के लिए ससुराल, एक अंजान और नई दुनिया की तरह होती है।  ऐसे में ससुराल वालों की बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है कि उस बेटी को, जो अपने माता पिता, भाई बहन सब छोड़ कर ससुराल आई है, उसे ससुराल परिवार में सब मिल कर भावनात्मक रूप से ऐसा माहौल दें कि वह जल्दी ही नए परिवेश में, अपने आप को समाहित कर ले। उसे न केवल क्रमशः अपनाए बल्कि उसे महसूस भी कराए। लेकिन दुर्भा...