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दिसंबर, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सास-बहू संबंध और बेटियों की परवरिश : रिश्तों की जड़ों में छिपा सामाजिक सच

सास-बहू संबंध और बेटियों की परवरिश : रिश्तों की जड़ों में छिपा सामाजिक सच      क्या कभी आपने सोचा है जो बच्चियां, जो बेटियां अपने घर में, शादी से पूर्व तमाम खूबियों से परिपूर्ण, घर की रौनक, घर में खुशहाल माहौल बनाने वाली और सब की प्यारी दुलारी होती हैं, वही जब शादी के बाद अपने ससुराल में जाती हैं तो अचानक  वहां से उनकी तमाम कमियां बताई जाने लगती हैं।      उसी बेटी की तमाम बुराइयां बताई जाने लगती हैं, खासकर सास के साथ सामंजस्य न बैठाने वाली या यूं कहें कि संघर्ष की बातें सामने आने लगती है और फिर धीरे धीरे सही और गलत के संघर्ष में दोनों परिवार उलझ कर रह जाते हैं।       तो ऐसा क्यों होता है कि अचानक अच्छी खासी बेटियां, बदनाम बहू बन जाती हैं। तो चलिए एक नए नजरिए से इस विषय पर विचार करें कि आखिर ऐसा क्यों होता है। इस बहुचर्चित विषय पर अपने विचार आपके सामने रखने की कोशिश है। हो सकता है इसमें कुछ सुधार की संभावना हो तो अपनी टिप्पणी अवश्य भेजें।      भारतीय समाज में परिवारिक संबंधों की जटिलता और गहराई, सदियों से चर्चा का विषय रही ...

सामाजिक शिष्टाचार का लुप्त होता स्वरूप : आधुनिक जीवनशैली में विनम्रता और आदर की पुनर्स्थापना

सामाजिक शिष्टाचार का लुप्त होता स्वरूप  आधुनिक जीवनशैली में विनम्रता और आदर की पुनर्स्थापना की आवश्यकता...  लेखक: मनोज भट्ट, कानपुर, प्रकाशन तिथि: १८ मई २०२५ ------------------------------------------------------     यह लेख पूर्व में अपने फेसबुक पेज पर प्रकाशित किया था, जिसे आज थोड़ा विस्तार देते हुए पुनः अपने हिंदी ब्लॉग "सामाजिक ताना-बाना" में प्रकाशित किया जा रहा है। बदलते समय की एक चिंताजनक तस्वीर      आज तक के सामाजिक ताना-बाना की धड़कन, उसके मूल तत्वों, संस्कारों और शिष्टाचार में बसती है। जब हम वर्तमान समय की ओर देखते हैं, तो पाते हैं कि तकनीकी प्रगति और आधुनिक जीवनशैली ने हमें सुविधाएँ तो दी हैं, लेकिन कहीं न कहीं हमारे व्यवहार और आपसी संबंधों की गरिमा को क्षीण कर दिया है।         पहले जहाँ बुजुर्गों के चरण स्पर्श करना, पड़ोसियों से आत्मीयता से मिलना, और सार्वजनिक स्थानों पर संयमित भाषा का प्रयोग करना सामान्य था। किंतु आज यह सब धीरे-धीरे औपचारिकता या " पुराने जमाने की बातें " बनते जा रहे हैं।       यह लेख...

आलोचना बनाम समालोचना : एक विचारशील पुनर्विचार

              आलोचना बनाम समालोचना... एक विचारशील पुनर्विचार (विस्तारित संस्करण)      उपरोक्त विषय पर एक लेख अपने फेसबुक पेज पर दिनांक 13 मई 2025 को प्रकाशित किया था, जिसे आज थोड़ा सा विस्तार देते हुए "सामाजिक ताना-बाना" पर अपने पाठकों के लिए पुनः प्रस्तुत है। शब्दों की शक्ति और समाज की दिशा...     वर्तमान युग संवाद का युग है और आधुनिक तकनीक ने हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है, लेकिन साथ ही यह चुनौती भी दी है कि हम उस स्वतंत्रता का उपयोग किस प्रकार करें।       प्रश्न उठता है कि क्या हम केवल प्रतिक्रिया देने तक सीमित है या हम रचनात्मक और सुधार की दिशा में भी आगे बढ़ रहे हैं ? आलोचना और समालोचना दोनों ही अभिव्यक्त के रूप हैं, लेकिन इनका उद्देश्य और प्रभाव अलग-अलग है।     इस विस्तारित लेख में हम इन दोनों के बीच का अंतर गहराई से समझेंगे युवाओं और बुजुर्गो के दृष्टिकोण को जोड़ेंगे और यह जानेंगे की समालोचना को पुनः कैसे जीवित किया जा सकता है। " आलोचना", प्रतिक्रिया की तीव्रता, परिपक्वता की कमी ... ...

"मजा" की खोज: बचपन से आज तक का सफ़र

  "मजा" की खोज, बचपन से आज तक का सफ़र”  (एक विस्तृत, हास्य-व्यंग्यात्मक, भावपूर्ण और सभी आयु वर्ग के लिए उपयुक्त कथा) पहला दृश्य - वर्तमान समय का ‘अत्याधुनिक’ घर शहर के एक पॉश इलाके में “मनोहर निवास” नाम का एक आधुनिक घर था। और इसमें रहते थे.... दादा जी - (गंगाराम जी): उम्र 72, दिल से 18... बेटा – महेश: आधुनिकता में विश्वास रखने वाला... बहू – कविता: सुविधा की देवी... पोता – आरव: मोबाइल गेम्स का महायोद्धा... एक दिन रविवार की सुबह सभी अपने-अपने कमरों से धीरे-धीरे बाहर निकले, जैसे थके हुए राक्षस एक रात पहले भारी युद्ध लड़कर उठते हैं। दादा जी पहले से ही सोफे पर बैठे थे। हाथ में अख़बार, बगल में चश्मा और सामने 65 इंच की LED टीवी, लेकिन चालू नहीं। महेश: (खिंचाई करते हुए) “पापा! टीवी क्यों नहीं चला लेते ?इतनी बड़ी स्क्रीन है… 4K… डॉल्बी साउंड… दुनिया का हर चैनल!” दादा: (हंसकर) “बेटा, इतना बड़ा टीवी... हम ने बचपन में तो सिनेमा हॉल भी नहीं देखा था। अब रोज़ घर में फिलम देखूं तो उसका उत्साह कैसा ?” और आरव अपने मोबाइल पर PUBG के नए संस्करण में व्यस्त था। उसकी नज़र स्क्रीन से उठकर किसी इंसा...

"क्षमा"... सह-अस्तित्व की मौन शक्ति

"क्षमा"...सामाजिक ताना-बाना का एक महत्वपूर्ण तत्व      "जिस समाज में "क्षमा" की भावना नहीं, वहाँ संवाद नहीं। जहाँ संवाद नहीं, वहाँ सह-अस्तित्व नहीं। और जहाँ सह-अस्तित्व नहीं, वहाँ केवल अकेलापन और अविश्वास की दीवारें हैं।" "क्षमा", एक भूली हुई नैतिकता      हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ तकनीक ने संवाद को तेज़ किया है, लेकिन संवेदना को धीमा। जहाँ हम दूसरों की गलतियों को माइक्रोस्कोप से देखते हैं, पर अपनी भूलों को धुंधले शीशे में। क्षमा, जो कभी मानवीय संबंधों की रीढ़ हुआ करती थी, आज एक दुर्लभ गुण बनती जा रही है।     क्या आपने कभी सोचा है कि हम दूसरों से इतनी कठोर अपेक्षाएँ क्यों रखते हैं, जबकि स्वयं को बार-बार माफ़ कर देते हैं ? यही प्रश्न इस लेख की आत्मा है। आत्ममंथन की अनुपस्थिति: जब हम खुद को ही केंद्र मान लेते हैं...     आज का समाज आत्ममंथन से दूर होता जा रहा है। हम अपनी कमियों को "इंसानी फितरत" कहकर तर्कों की चादर ओढ़ा देते हैं। "मैं भी तो इंसान हूँ", यह वाक्य हमारे लिए ढाल बन गया है। लेकिन जब कोई और गलती करता है, तो ...