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वर्किंग पेरेंट्स और सिसकता बचपन

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  वर्किंग पेरेंट्स और सिसकता बचपन   गगनचुंबी इमारतें और खोते हुए आँगन इक्कीसवीं सदी का वैश्विक समाज विकास के उस शिखर पर है, जहाँ तकनीक, आर्थिक समृद्धि और करियर की ऊँची उड़ान ने इंसानी जीवन को सुगम, तीव्र और वैभवशाली बना दिया है। आज के आधुनिक माता-पिता के पास अपने बच्चों को देने के लिए बेहतरीन अंतरराष्ट्रीय स्कूल हैं, आधुनिकतम इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स हैं, महंगे ब्रांडेड कपड़े हैं और विदेशों में छुट्टियाँ बिताने के असीमित साधन हैं।  लेकिन इस चौंधिया देने वाली चमक-दमक के पीछे, आधुनिक घरों के बंद आलीशान कमरों से एक खामोश सिसकी भी निरंतर सुनाई दे रही है। यह सिसकी किसी शारीरिक चोट की नहीं, बल्कि एक ऐसे गहरे, अंधकार वाले दमघोंटू अकेलेपन की है जिसमें आज का नौनिहाल बचपन तिल-तिल कर दम तोड़ रहा है। "वर्किंग पेरेंट्स... घर में सिसकता बचपन और बाहर करियर की ऊँची उड़ान"