व्यस्तता का भ्रम एक सामाजिक पड़ताल, क्या सच में हम इतने व्यस्त है ? आजकल प्रायः हर एक इंसान, एक दूसरे से, "बहुत व्यस्त हूं" वाक्य कहता मिलेगा। ये वाक्य इतना आम हो गया है कि जैसे यह हमारी पहचान बन गया हो। यह तो स्पष्ट है कि जब इंसान व्यस्त है तो वह किसी न किसी तरह के कार्य में ही व्यस्त होगा, इसका सीधा अर्थ ये है कि निश्चय ही उसका परिणाम भी निकलता होगा... सवाल यह है कि क्या हम सच में हम इतने व्यस्त हैं या केवल व्यस्त दिखना चाहते हैं ? यदि हम इतने ही व्यस्त हैं, तो समाज में उसका परिणाम क्या है, क्यों नहीं दिखता उसका सकारात्मक असर, क्यों रिश्ते कमजोर हो रहे हैं, क्यों संवाद घट रहा है और क्यों आत्म-संतोष दूर होता जा रहा है ? यह लेख इसी ज्वलंत विषय पर एक गहन सामाजिक पड़ताल है, जो निश्चय ही सभी को सोचने पर मजबूर करेगा। व्यस्तता की परिभाषा... भ्रम और सच्चाई वास्तविक व्यस्तता वह होती है जिसमें व्यक्ति समय का सही उपयोग करता है, का...
सामाजिक ताना-बाना - मनोज भट्ट कानपुर के ब्लॉग पर परिवार, रिश्ते, समाज और जीवन से जुड़े गहरे विचारशील लेख। वास्तविक अनुभवों के साथ समाज को बेहतर समझने का सफर।