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"व्यस्तता का भ्रम...जीवन की सरलता में छिपा संतुलन"

                व्यस्तता का भ्रम  एक सामाजिक पड़ताल,  क्या सच में हम इतने व्यस्त है ?     आजकल प्रायः हर एक इंसान, एक दूसरे से, "बहुत व्यस्त हूं" वाक्य कहता मिलेगा। ये वाक्य इतना आम हो गया है कि जैसे यह हमारी पहचान बन गया हो।       यह तो स्पष्ट है कि जब इंसान व्यस्त है तो वह किसी न किसी तरह के कार्य में ही व्यस्त होगा, इसका सीधा अर्थ ये है कि निश्चय ही उसका परिणाम भी निकलता होगा...      सवाल यह है कि क्या हम सच में हम इतने व्यस्त हैं या केवल व्यस्त दिखना चाहते हैं ? यदि हम इतने ही व्यस्त हैं, तो समाज में उसका परिणाम क्या है, क्यों नहीं दिखता उसका सकारात्मक असर, क्यों रिश्ते कमजोर हो रहे हैं, क्यों संवाद घट रहा है और क्यों आत्म-संतोष दूर होता जा रहा है ?      यह लेख इसी ज्वलंत विषय पर एक गहन सामाजिक पड़ताल है, जो निश्चय ही सभी को सोचने पर मजबूर करेगा। व्यस्तता की परिभाषा... भ्रम और सच्चाई      वास्तविक व्यस्तता वह होती है जिसमें व्यक्ति समय का सही उपयोग करता है, का...

"आसमानी मोहब्बत ..." एक भावनात्मक नज़्म

   मेरे द्वारा ली गई तस्वीर तीन वर्ष पूर्व की है । यह तस्वीर देखकर मेरे मन में कुछ जज्बात आए, जिन्हें मै अपनी लेखनी के माध्यम से, शब्दों के ताने बाने में पिरो कर आपके सामने रख रहा हूं...                   " आसमानी मोहब्बत " ऊपर वाले की मोहब्बत,  नीले साए में लिपटी हुई सितारों की तरह चमकती,  ज़मी से कुछ कहती नहीं दिल से आया था नीचे, लेके मोहब्बत के बादलों का हार  ढेर सारी दुआओं के साथ, जैसे रहा उसकी नज़रें उतार  चाहता था वो उसको छूना, पर ज़मीं थी कुछ उदास वो खामोशी से खो बैठी थी, अपनी होश ओ हवास  मोहब्बत पाने को चले थे,  हवा में उड़ते ख्वाबों के साथ,   पर हर कदम पर दूरी बढ़ती गई,  दिल रहा खाली हाथ  वो आसमाँ से आया तो था, पर जमीनी सच से अंजान  यहां मोहब्बत जज़्बा नहीं,  एक जंग है और एक पहचान अब वो मोहब्बत दूर  एक तारा बनकर टिमटिमा रहा है,   ज़मीं पर है " राज " छुपे छुपे,  बेबस खुद को ढूंढ रहा है। मनोज भट्ट कानपुर          26 अक्टूबर ...

अपराध बोध और आत्मबोध: एक स्वाभाविक जागृति की यात्रा....

अपराध बोध और आत्मबोध: एक स्वाभाविक जागृति की यात्रा.... यह लेख "अपराध बोध" की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया को एक आत्मिक परिवर्तन के रूप में देखता है, न कि केवल एक नकारात्मक भावना के रूप में।         इसमें यह तर्क प्रस्तुत किया गया है कि जब स्वाभाविक रूप से यह बोध उत्पन्न होता है, तो वह व्यक्ति के अंतर्मन में एक अमृत समान जागृति लाता है। लेकिन यदि यही बोध किसी अन्य द्वारा आरोपित किया जाए, तो वह व्यक्ति को समय से पूर्व मानसिक मृत्यु की ओर धकेल सकता है। संपादित -- गायत्री भट्ट  लेखक:- मनोज भट्ट  ब्लॉग:- सामाजिक ताना-बाना  स्थान:- कानपुर ------------------------------------------------------- अपराध बोध… अंत नहीं, नवजीवन की ओर एक यात्रा जीवन केवल घटनाओं का क्रम नहीं है, यह अनुभवों, निर्णयों और उनके परिणामों की एक निरंतर यात्रा है। इस यात्रा में हर व्यक्ति अपनी-अपनी नीतियों, मूल्यों और व्यवहारों के साथ आगे बढ़ता है। ये मूल्य उसके संस्कारों, परिस्थितियों और अनुभवों से निर्मित होते हैं। लेकिन समय का एक ऐसा पड़ाव भी आता है, जब व्यक्ति ठहरकर स्वयं को देखता है, अ...

समय की साक्षी: घड़ी की आत्मकथा से जीवन की प्रेरणा

समय की चुप साक्षी, की आत्मकथा से जीवन की प्रेरणा...                           "मैं घड़ी हूं..."    (युवा पीढ़ी के लिए एक प्रेरणादायक दृष्टिकोण) लेखक: मनोज भट्ट, कानपुर   संपादन: गायत्री भट्ट   ब्लॉग: सामाजिक ताना-बाना            मनोज भट्ट जी द्वारा रचित यह "घड़ी की आत्मकथा" यह वाक्य मात्र नहीं, बल्कि एक जीवनदर्शी की पुकार है। और न ही केवल एक उपकरण की कहानी है, बल्कि समय के साथ चलने, उसे समझने और उसका सम्मान करने की प्रेरणा देती है।       किशोरावस्था और युवा जीवन में, जब सपनों की उड़ान और चुनौतियों की आंधी साथ-साथ चलती है, तब यह लेख एक मार्गदर्शक की तरह सामने आता है।   समय: सबसे मूल्यवान संसाधन     आज के युवाओं के लिए सबसे बड़ी पूंजी " समय"  है। उदाहरण देखिए और समझिए कि जिन्होंने समय की कीमत को समय से पूर्व समझा, आज अपने अपने क्षेत्र में सफलता से उनकी अलग ही पहचान से है। जैसे... * बिल गेट्स ने Microsoft की नींव तब रखी जब वे...

बेटे के नाम, अंतिम पत्र

वृद्धाश्रम से, एक मां की साँसों में बसी आख़िरी पुकार... गायत्री भट्ट , सह-संपादक मनोज भट्ट , मूल लेखक कानपुर तिथि: १० अक्टूबर २०२५ बेटे के नाम, एक पत्र...(अंतिम) यह केवल एक पत्र नहीं है। यह एक मां की अधूरी सांसों में बसी वह पुकार है, जो... बेटे के हृदय तक पहुँचना चाहती है। यह एक ऐसी आवाज़ है, जो हर उस बेटे को झकझोरती है, जिसने समय की आपाधापी में मां की गोद को पीछे छोड़ दिया।        यह व्यथा उस मां की है, जो वृद्धाश्रम की दीवारों के बीच बेटे की आहट ढूंढती रही और अंततः एक पत्र में अपनी आत्मा समेट कर उसे भेज दिया... वृद्धाश्रम की खामोशी      शारदा देवी, उम्र लगभग अस्सी वर्ष। एक वृद्धाश्रम के छोटे से कमरे में रहती थीं। जहां खिड़की से धूप तो आती थी, पर बेटे की आहट नहीं। दीवारों पर कुछ तस्वीरें थीं, एक में राहुल गोद में बैठा मुस्कुरा रहा था, दूसरी में उसकी शादी की तस्वीर, जिसमें शारदा देवी ने गोटे वाली साड़ी पहनी थी। वही साड़ी अब भी अलमारी में रखी थी, जैसे किसी त्यौहार की प्रतीक्षा में...     ...

भीड़ से अलग, स्वयं की खोज – पहचान संकट और समाधान

                                              आज का युवा, कॉलेज कैम्पस से लेकर, सोशल मीडिया, ऑफिस की पॉलिटिक्स या समाज के आंदोलन तक, हर जगह भीड़ के दबाव में है।       भीड़ में अपने आप को अलग कर,  स्वयं की खोज...  युवाओं के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती है... “भीड़ में खो जाना आसान है, लेकिन स्वयं को भीड़ में खोजना साहस का काम है।”      यह पंक्ति आज की युवा पीढ़ी पर सबसे अधिक लागू होती है। हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं, जहाँ अपनी असली पहचान यानी कि  I dentity Crisis,  खो देने का खतरा हर युवा के सामने है।      लोग सोचते हैं कि वे स्वतंत्र हैं, लेकिन ऐसा नहीं है, सच्चाई यह है कि जैसे ही वे भीड़ का हिस्सा बनते हैं, उनकी सोच और विवेक ( Ra tional Thinking ) धुंधले पड़ने लगते हैं।     आज का युवा F reedom चाहता है, लेकिन सच ये है कि वह अक्सर भीड़ की C ollective Energy में बहकर वह अपनी स्वतंत्रता खो बैठता है...