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माँ-बाप की पुकार...रिश्तों की असली परिभाषा

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माँ-बाप की पुकार... रिश्तों की असली परिभाषा यह काव्य   रचना, आज के युवा कामकाजी बच्चों को समर्पित है और साथ ही उनके अंतरमन को जगाने का प्रयास भी, जो जाने अनजाने में अपने माता-पिता को भावनाओं के नाम पर, पास तो बुलाते हैं, पर अपनी जीवनशैली की सीमाओं में उन्हें बाँध देते हैं।    यह कविता एक आईना है, जिसमें हर बेटे-बेटी को अपनी भूमिका का पुनर्मूल्यांकन करते हुए उसकी असली तस्वीर देखनी चाहिए।   यह कविता केवल शब्दों का विन्यास नहीं, यह एक तपस्वी जीवन की गाथा है, उन माँ-बाप की, जिन्होंने अपने बच्चों के लिए हर सुख त्यागा, हर पीड़ा सहा, और हर क्षण को उनके भविष्य की नींव में बदल दिया।  यह कविता एक आह्वान है, उस सच्चे रिश्ते की ओर, जहाँ माँ-बाप केवल ज़रूरत नहीं, बल्कि जीवन की गरिमा हैं। जहाँ उनका साथ केवल सहारा नहीं, बल्कि आत्मबल का आधार है। यह कविता कोई शिकायत नहीं, कोई आरोप नहीं, यह एक संत की वाणी है, जो प्रेम और मर्यादा के साथ कहती है.... "माँ-बाप को अपनाओ, पर शर्तों के साथ नहीं।   सम्मान दो, पर दिखावे के लिए नहीं।   प्रेम दो, पर स्वार्थ के तले न...

कल की कथा, आज की व्यथा

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"हँसी के पीछे छुपी सच्चाई, और व्यथा के पीछे छुपा व्यंग्य।"  (भाग प्रथम)           जीवन की राहों पर हम सभी कभी न कभी ठोकर खाते हैं, कहीं न कहीं "पिटते" हैं। बचपन से लेकर बुढ़ापे तक, घर से लेकर गली-मोहल्ले तक, मंदिर-मस्जिद से लेकर सरकारी दफ्तर तक, हर जगह किसी न किसी रूप में इंसान ठोकर खाता ही रहता है। कभी समाज से, कभी परिवार से, कभी व्यवस्था से और कभी रिश्तों से।         यह कविता "कल भी हम पिटते थे, आज भी हम पिटते हैं…" केवल हास्य नहीं है, बल्कि एक गहरा व्यंग्य है उस जिंदगी पर, जहाँ आम आदमी की पीड़ा हर युग में एक-सी बनी रही है। यह व्यथा हँसते-हँसते सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर इंसान कब तक इस "पिटाई" को सहता रहेगा और कब उसकी आवाज़ सुनी जाएगी।         रचना आपको हँसी भी दिलाएगी, सोचने पर भी विवश करेगी और जीवन की कटु सच्चाइयों से भी रूबरू कराएगी।  आइए पढ़ते हैं यह व्यंग्यात्मक काव्य.... कल की कथा,और आज की व्यथा... जब हम बचपन में छोटे थे, बिन बात के पिटते थे स्कूल कॉलेज में पढ़ते थे,फिर भी हम पिटते थे कल भी हम पिटते ...