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मानवीय संवेदना का टूटता ताना-बाना

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मानवीय संवेदना का टूटता ताना-बाना यह तथ्य अब किसी से छुपा हुआ नहीं है कि आज के समय में चारों तरफ अंधी भाग-दौड़ मची हुई है। हर कोई आगे निकलने की होड़ में लगा है। इस दौड़ में हम दूसरे का गला काटने को तैयार हो गए हैं।  परिवार के सदस्यों के साथ भी बात करना कम हो गया है। मां-बाप की चिंता नहीं, भाई-बहन की परवाह नहीं, पत्नी या बच्चों के भविष्य की फिक्र नहीं। सिर्फ अपना फायदा, अपना समय और अपनी खुशी। इससे क्या हो रहा है ? मानवीय संवेदना धीरे-धीरे मर रही है। दिलों के बीच का रिश्ता कमजोर हो रहा है। समाज का ताना-बाना टूट रहा है। इस लेख में हम इस समस्या को विस्तार से समझेंगे और देखेंगे कि इसे कैसे रोका जा सकता है। समस्या क्या है ? पहले के समय में गांवों और शहरों में लोग एक-दूसरे से जुड़े रहते थे। कोई बीमार पड़ता, तो पूरा मोहल्ला मदद के लिए आ जाता। त्योहार साथ मनाए जाते। बच्चे बुजुर्गों के पास बैठकर कहानियां सुनते।  लेकिन जिस तरह से अब तक नदियों में पानी बहुत दूर तक बह गया है, उसी तरह आज का युग अच्छाइयों के साथ साथ, कमियों में भी बहुत आगे हो हो गया है। हर घर में मोबाइल, टीवी और इंटरनेट है। ...

इमर्जेंसी नम्बर, आपकी असली कमाई क्या है ?

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इमर्जेंसी नम्बर - जीवन की असली पूँजी इस लेख के पाठकों से पहला प्रश्न ये है कि आपकी असली कमाई क्या है ? लेखक का विनम्र निवेदन है कि इस लेख को आगे पढ़ने से पहले, उपरोक्त प्रश्न का उत्तर एक पहेली की भांति बड़ी गंभीरता, साहस और ईमानदारी  से अपने आप को दें... अपने उत्तर पर मनन करें... फिर आगे लेख पढ़ें। आज के इस भाग-दौड़ भरे जीवन में जरा रुक कर सोचिए कि आपकी असली कमाई क्या है, क्या आपकी जिंदगी में कोई ऐसा व्यक्ति है, जिसे आप आधी रात को, बिना एक पल सोचे, फोन लगा सकें ? जिसे आप कह सकें, "यार, मैं फँस गया हूँ, मदद चाहिए" और वह बिना सवाल पूछे, बिना हिसाब-किताब लगाए, बस आपके लिए निकल पड़े ? और दूसरा, इससे भी बड़ा सवाल ये है कि क्या आप खुद किसी के लिए ऐसे व्यक्ति हैं ? क्या किसी की फोनबुक में आपका नाम उस "इमर्जेंसी नम्बर" के तौर पर सेव है ? अगर इन दोनों सवालों का जवाब 'हाँ' है, तो यकीन मानिए, आप इस दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक हैं। यह लेख बैंक बैलेंस की नहीं, दिल के बैलेंस की बात करता है । उस पूँजी की, जो न लॉकर में रखी जाती है, न सोशल मीडिया पर दिखाई जा...

शिक्षा से पहले सभ्यता

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शिक्षित होने से पहले सभ्य होना आवश्यक है (एक दृष्टिकोण)       आज का युग ज्ञान-विज्ञान, तकनीक और प्रगति का युग कहा जाता है। हर ओर डिग्रियों की दौड़ है, बच्चों से लेकर युवाओं तक हर कोई केवल इस प्रतिस्पर्धा में उलझा हुआ है कि कौन अधिक अंक लाता है, किसे बेहतर संस्थान से डिग्री मिलती है, कौन ऊँचे वेतन वाली नौकरी पाता है।       लेकिन इस आपाधापी में एक महत्वपूर्ण प्रश्न पीछे छूट जाता है कि क्या केवल शिक्षित होना ही पर्याप्त है, या सभ्य होना, उससे कहीं अधिक अनिवार्य है ? निःसंदेह सभ्यता, सर्वोपरि है और इसका आधार, बचपन की परिवरिश और स्कूली शिक्षा के अनुसार बनती है।      क्योंकि, हर इंसान के बचपन की प्रारंभिक शिक्षा का आधार अपने परिवार के बुजुर्गों के सानिध्य से बनना शुरू होता है जो आगे चलकर स्कूली शिक्षा प्राप्त कर, नैतिकता के पाठ के साथ वह अपनी डिग्री आदि लेकर समाज के सामने आता है। शिक्षा और सभ्यता में अंतर की सूक्ष्म रेखा      शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन नहीं है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य है, इंसान को इंसान बनाना, उसके ...