मानवीय संवेदना का टूटता ताना-बाना
मानवीय संवेदना का टूटता ताना-बाना यह तथ्य अब किसी से छुपा हुआ नहीं है कि आज के समय में चारों तरफ अंधी भाग-दौड़ मची हुई है। हर कोई आगे निकलने की होड़ में लगा है। इस दौड़ में हम दूसरे का गला काटने को तैयार हो गए हैं। परिवार के सदस्यों के साथ भी बात करना कम हो गया है। मां-बाप की चिंता नहीं, भाई-बहन की परवाह नहीं, पत्नी या बच्चों के भविष्य की फिक्र नहीं। सिर्फ अपना फायदा, अपना समय और अपनी खुशी। इससे क्या हो रहा है ? मानवीय संवेदना धीरे-धीरे मर रही है। दिलों के बीच का रिश्ता कमजोर हो रहा है। समाज का ताना-बाना टूट रहा है। इस लेख में हम इस समस्या को विस्तार से समझेंगे और देखेंगे कि इसे कैसे रोका जा सकता है। समस्या क्या है ? पहले के समय में गांवों और शहरों में लोग एक-दूसरे से जुड़े रहते थे। कोई बीमार पड़ता, तो पूरा मोहल्ला मदद के लिए आ जाता। त्योहार साथ मनाए जाते। बच्चे बुजुर्गों के पास बैठकर कहानियां सुनते। लेकिन जिस तरह से अब तक नदियों में पानी बहुत दूर तक बह गया है, उसी तरह आज का युग अच्छाइयों के साथ साथ, कमियों में भी बहुत आगे हो हो गया है। हर घर में मोबाइल, टीवी और इंटरनेट है। ...