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नवंबर, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

"संयुक्त परिवार: एक लुप्तप्राय सामाजिक व्यवस्था"

संयुक्त परिवार ...एक लुप्तप्राय सामाजिक व्यवस्था वर्तमान समय में युवा पीढ़ी में इसकी प्रासंगिकता और पुनर्स्थापन की संभावनाएँ...       भारतीय समाज की नींव सदियों से परिवार पर आधारित रही है। परिवार केवल रक्त संबंधों का समूह नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक सुरक्षा का केंद्र है। विशेषकर संयुक्त परिवार व्यवस्था. ..         जिसने भारतीय समाज को एकजुट रखा। इसमें कई पीढ़ियाँ एक साथ रहती हैं, जिम्मेदारियाँ साझा करती हैं और जीवन के हर उतार-चढ़ाव में एक-दूसरे का सहारा बनती हैं। संयुक्त परिवार व्यवस्था सही मायने में सामाजिक ताना-बाना का आधार है      लेकिन आधुनिकता, शहरीकरण और भौतिकतावादी प्रचार ने इस व्यवस्था को कमजोर कर दिया। आज के समय में जब लोगों में मानसिक तनाव, अकेलापन और सामाजिक विघटन बढ़ रहा है, संयुक्त परिवार का महत्व और भी बढ़ जाता है।        हमारी पिछली पीढ़ी इस व्यवस्था के महत्व को भली भांति बात समझती थी। किंतु वर्तमान पीढ़ी इस व्यवस्था के प्रति उदासीन दिखती है। जबकि आज की युवा पीढ़ी...

आनंद ही जीवन का महामंत्र

.                                    आनंद ही जीवन का महामंत्र....      मनुष्य परमात्मा की सर्वोत्तम कृति कहलाता है, लेकिन मनुष्य स्वयं मानता है कि वह परमात्मा की सबसे बड़ी भूल है। यही भ्रम उसे जीवन में लगातार एक ही लक्ष्य की ओर धकेलता है, वो है "आनंद" ।     आनंद की परिभाषा उतनी ही उलझी हुई है जितनी गणित की किताब। हर किताब में अलग, हर शिक्षक के हिसाब से उसका उल्टा।      लेकिन दुनिया के सभी महान विचारक, ऋषि, वैज्ञानिक, बाबाजी, यूट्यूबर, रील क्रिएटर, कोच, मोटिवेशनल वकता और नुक्कड़ पर बैठा चायवाला, सभी एक ही बात पर सहमत हैं... कि “आनंद लेना चाहिए… चाहे किसी भी तरीके से लेना पड़े।”      यूँ तो आनंद प्राप्त करने के अनगिनत रास्ते हैं, किंतु संक्षेप में कुछ रास्ते,जो आम से है, उन पर प्रकाश डाल रहा हूँ। इसके अलावा बाकी आप भी बहुत से अन्य रास्तों से परिचित होंगे, जो शायद आपके घर से या आसपास से गुजरते होंगे...  1-- बिस्तर का आनंद बिस्तर पर पड़े ...

उद्देश्य से भटकती सोशल मीडिया "ग्रुप्स" : एक चिंतन

उद्देश्य से भटकती सोशल मीडिया"ग्रुप्स" (एक सामाजिक चिंतन...)       आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया ने संवाद, अभिव्यक्ति और सामाजिक जुड़ाव के नए द्वार खोल दिए हैं। विशेष रूप से " ग्रुप्स ", चाहे वे व्हाट्सएप, फेसबुक, टेलीग्राम या अन्य प्लेटफॉर्म्स पर हों।        शुरुआत में तो ये ग्रुप्स, सामाजिक जागरूकता, ज्ञान-विज्ञान का विनिमय और भावनात्मक जुड़ाव के सशक्त माध्यम थे। परंतु समय के साथ इनकी संरचना और उद्देश्य में निम्न स्तर तक की गिरावट दिखती है।        परिवारिक और सामाजिक ताना-बाना के लिए चेतावनी भी। जो "डिजिटल संस्कृति" की गिरती गुणवत्ता का संकेत तो  देता ही है, साथ ही हमारी "मूल सामाजिक संस्कृति" के प्रति चिंताजनक भी है। प्रारंभिक उद्देश्य:  संवाद और समरसता       अधिकांश सोशल मीडिया ग्रुप्स की शुरुआत किसी सकारात्मक उद्देश्य से होती है, जिसका उद्देश्य.... प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, तकनीकी सहायता, साहित्यिक विमर्श आदि पर ज्ञान साझा करना। पर्यावरण, स्वास्थ्य, शिक्षा या सामाजिक सुधार से जुड़े विषय में साम...

सोशल मीडिया और AI फर्जी सामग्री: सामाजिक चेतना की पुकार

सोशल मीडिया और AI जनित फर्जी सामग्री, एक घातक राष्ट्रीय और सामाजिक विपत्ति... लेख-- मनोज भट्ट, कानपुर   विवेचना -- गायत्री भट्ट       श्री मनोज भट्ट द्वारा लिखित यह लेख उनके द्वारा अपने फेसबुक पेज पर दिनांक १२ मई २०२५ को प्रकाशित किया गया था। वही लेख नए सिरे से विवेचना कर,"सामाजिक ताना-बाना"ब्लॉग में प्रस्तुत हो रहा रहा है। आज इस लेख की प्रासंगिकता भारतीय समाज के हर वर्ग के लिए महत्वपूर्ण है।   एक नई वैश्विक चुनौती का उदय       वर्तमान डिजिटल युग में सोशल मीडिया ने संवाद, सूचना और अभिव्यक्ति के नए द्वार खोले हैं। परंतु इसी मंच पर एक नई और गंभीर सामाजिक विपत्ति जन्म ले चुकी है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) द्वारा निर्मित फर्जी सामग्री का प्रसार। यह संकट केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सामाजिक, नैतिक और भावनात्मक  स्तर पर भी गहरा प्रभाव डाल रहा है।      आज जब डीपफेक वीडियो, बनावटी तस्वीरें और भ्रामक समाचार मिनटों में वायरल हो जाते हैं, तो सत्य और असत्य के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। यहां तक कि पढ़े-लिखे लोग भी भा...