संदेश

सितंबर, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

“कोई चोटी अकेली नहीं होती”...युवा के लिए सहयोग का संदेश

चित्र
पर्वतों की ऊँचाइयाँ  और हमारे जीवन की  ऊँचाइयों की नींव...     "कोई भी ऊँची पर्वत की चोटी अकेले ऊँचाई तक नहीं पहुंचती। उसकी ऊँचाई और गौरव से भरा मस्तक उसके सहयोगी छोटी पर्वत श्रृंखला पर आधारित होती है।"       यह वाक्य केवल प्रकृति का सौंदर्य नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन है। यह हमें सिखाता है कि कोई भी व्यक्ति, संस्था या राष्ट्र अकेले महान नहीं बनता। हर ऊँचाई की नींव में सहयोग, समर्थन, सामूहिक प्रयास छिपा होता है।     आज की युवा पीढ़ी, जो तकनीक, प्रतिस्पर्धा और आत्मनिर्भरता के युग में जी रही है, इस संदेश को समझे बिना अधूरी रह जाती है। यह लेख उसी भाव को विस्तार देता है, कि ऊँचाइयों की नींव, दूसरों के साथ मिलकर कैसे बनाई जाती है... 1. पर्वतों से प्रेरणा: ऊँचाई का अर्थ अकेलापन नहीं      जब हम हिमालय की चोटियों को देखते हैं, तो उनकी भव्यता हमें चकित करती है। लेकिन वे अकेली नहीं होतीं। उनके चारों ओर छोटी-छोटी श्रृंखलाएँ होती हैं, जो उन्हें सहारा देती हैं।       ठीक उसी तरह, जीवन में कोई भी उपलब्धि अकेले नहीं आती...

माँ-बाप की पुकार...रिश्तों की असली परिभाषा

चित्र
            " सामाजिक ताना-बाना"      मेरे द्वारा, मनोज भट्ट जी की यह एक रचना, आज के युवा कामकाजी बच्चों को समर्पित है और साथ ही उनके अंतरमन को जगाने का प्रयास भी, जो जाने अनजाने में अपने माता-पिता को भावनाओं के नाम पर, पास तो बुलाते हैं, पर अपनी जीवनशैली की सीमाओं में उन्हें बाँध देते हैं।    यह कविता एक आईना है, जिसमें हर बेटे-बेटी को अपनी भूमिका का पुनर्मूल्यांकन करते हुए उसकी असली तस्वीर देखनी चाहिए।   यह कविता केवल शब्दों का विन्यास नहीं, यह एक तपस्वी जीवन की गाथा है, उन माँ-बाप की, जिन्होंने अपने बच्चों के लिए हर सुख त्यागा, हर पीड़ा सहा, और हर क्षण को उनके भविष्य की नींव में बदल दिया।  यह कविता एक आह्वान है, उस सच्चे रिश्ते की ओर, जहाँ माँ-बाप केवल ज़रूरत नहीं, बल्कि जीवन की गरिमा हैं। जहाँ उनका साथ केवल सहारा नहीं, बल्कि आत्मबल का आधार है। यह कविता कोई शिकायत नहीं, कोई आरोप नहीं, यह एक संत की वाणी है, जो प्रेम और मर्यादा के साथ कहती है.... "माँ-बाप को अपनाओ, पर शर्तों के साथ नहीं।   सम्मान दो, पर दिख...

वक्त की पुकार

चित्र
                   "वक्त की पुकार"... The Call of Time... For the Youth       वक्त एक ऐसी शक्ति है जो दिखाई नहीं देती, पर हर बदलाव की नींव उसी पर टिकी होती है। वह न बोलता है, न चलता है, न लड़ता है, लेकिन हर आंदोलन, हर विचार, हर निर्माण उसी की प्रेरणा से जन्म लेता है।               यह कविता युवा पीढ़ी को, उनके मौन पर,  लेकिन निर्णायक शक्ति की याद दिलाती है, जो उन्हें जिम्मेदारी, चेतना और निर्माण की ओर बुलाती है...     वक्त की चाल... The Movement of Time वक्त खुद चलता नहीं, सबको चलाता है,   हर मोड़ पर नया " रास्ता " दिखाता है।   वो खुद तो कभी कुछ नहीं बोलता,   पर तुम्हारी चुप्पी में, " शोर " बन जाता है। वो अपने लिए, कभी लिखता नहीं,   पर तुम्हारे कर्मों से " इतिहास"  बनाता है।   वक्त की आंखें नहीं, वो देखता नहीं,   पर तुम्हारी आँखों में " सपने"  सजाता है। वक्त का पाठ ... The Lessons of Time वो स्व...

चप्पल की व्यथा, गाँव की पंचायत की अनोखी सुनवाई

चित्र
  " एक अनोखी पंचायत जहाँ इंसान नहीं, चप्पल ने दिखाया समाज को आईना"      कल रात को अचानक गांव से फोन आया कि गुड्डू भैया बहुत गंभीर समस्या है, पंचायत बैठी है। और जब हमने पूछा, "का हुआ ?"... जवाब मिला..."कुछ पूछौ ना, सुबह जल्दी तुम्हे आय का है बस ,बहुत जरूरी है"। पत्नी बोली , "का हुआ ?" हमने कहा, लगता है कि कोई मामला बड़ा गंभीर है।"        रात भर मैं सो नहीं पाया और सुबह जल्दी उठकर गांव की ओर चल दिया। गांव भी करीब आ गया, गांव के बाहर से ही गहमा गहमी का एहसास होने लगा। फिर  जैसे ही अपने गांव में प्रवेश किया, भीड़ से पूछा कि काहे की भीड़ है तो कारण बड़ा अजीब पता चला,  “ चप्पल महोदय की जनहित याचिका"         अपने बड़बक पुरवा गांव की पंचायत भवन में आज खास बैठक बुलाई गई थी। भवन के बाहर ढोल-नगाड़े बज रहे थे। अंदर मंच पर चौधरी कालूराम ताव से बैठे थे, मानो खुद मुख्य न्यायाधीश हों, जैसे ही हमें देखा, जोर से चिल्ला कर बोले, आओ आओ गुड्डू भैया, यहां बगल में बैठो और एक कुर्सी में मुझे बैठा दिया। मेरे  बगल में गांव का सचिव कल्लू, ह...

शांति का मार्ग: एक नए युग की शुरुआत अपने घर से

चित्र
शांति का मार्ग (घर से विश्व तक एक नए युग की शुरुआत.... एक आह्वान) अशांति के युग में शांति की पुकार हम इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में खड़े हैं। एक ओर विज्ञान चाँद पर घर बसाने की योजना बना रहा है, दूसरी ओर मनुष्य का मन सबसे अधिक बेचैन है। विश्व संस्था की दो हजार पच्चीस की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में हर चालीस सेकंड में एक व्यक्ति अपना जीवन समाप्त कर लेता है। हर दिन चार हजार चार सौ से अधिक लोग हिंसा में मारे जाते हैं। सत्तानवे करोड़ लोग मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं। भारत में अपराध आंकड़ा विभाग के आंकड़े कहते हैं कि दो हजार चौबीस में एक लाख पैंतीस हजार घरेलू हिंसा के मामले दर्ज हुए। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में पंद्रह प्रतिशत से अधिक युवा चिंता और अवसाद के शिकार हैं। तकनीक ने दूरियों को मिटाया, पर दिलों में दीवारें खड़ी कर दीं। संचार माध्यमों ने आवाज़ दी, पर सुनने का धैर्य छीन लिया। होड़ ने तरक्की दी, पर चैन छीन लिया। ऐसे में सवाल उठता है: क्या शांति केवल बड़ी-बड़ी बैठकों का विषय है ? क्या सरकारें और कानून ही शांति ला सकते हैं ?  जवाब है - नहीं।  शांति की पहली ईंट आपक...

"दिमाग की आंखें खोलना: पूर्वाग्रहों से मुक्त सोच की ओर

चित्र
"दिमाग की आंखें खोलना" : पूर्वाग्रहों से मुक्त-सोच की ओर ... दिमाग की आंखें खोलना, केवल एक रूपक नहीं बल्कि आज के समय की पुकार है।  " मन की आंखें खोल रे भैया", यह पुकार आज के भारत की ही नहीं समूचे संसार की सबसे आवश्यक चेतावनी बन चुकी है। इसी गंभीर विषय पर आधारित  एक विवेकशील यात्रा...। आज के दौर में जब सूचना के महासागर की बाढ़ में, सच्चाई पूरी तरह डूब रही हो और "तथाकथित" पढ़ा लिखा वर्ग भी, भ्रम तथा पूर्वाग्रहों का शिकार बन रहा हो, तब केवल शारीरिक आंखें खोलना पर्याप्त नहीं होता। बल्कि हमें दिमाग की आंखें खोलनी होंगी अर्थात विवेक तर्कशक्ति और आत्मनिरीक्षण के माध्यम से हर बात को देखना, समझना और परखना होगा।  यह कोई साधारण रूपक नहीं है बल्कि आज के युग की सबसे गहरी पुकार है, जो हमें भ्रम के अंधकार से बाहर निकालकर सच्चाई की ओर ले जा सकती है। जिस सच्चाई को अपनी इस रचना में उजागर किया है वह आज हर देश हर समाज और हर व्यक्ति के लिए प्रासंगिक है, क्योंकि सूचना का यह महासागर अब किसी एक राष्ट्र तक सीमित नहीं रहा है। सूचना युग में भ्रम की परतें आज पूरा विश्व सूचना के एक अथ...