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जब सत्ता विवेक को नहीं सुनती: धृतराष्ट्र से आज तक

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धृतराष्ट्र और संजय: महाभारत के संवाद में सत्ता और विवेक का द्वंद्व लेख की शुरुआत करने से पूर्व लेखक जिम्मेदारी के साथ यहां एक बात स्पष्ट करना चाहता है कि पूरे लेख में जहां भी सत्ता का संदर्भ आया है, उसका तात्पर्य उस पक्ष से है जो शासक है। न कि किसी दल विशेष से। क्योंकि लेखक का मानना है कि जो भी सत्ता में आता है, उसकी कार्य शैली अलग अलग हो सकती है, किंतु "परिणाम" सदियों से वही "ढाक के तीन पात" जैसे रहते हैं... लेखक;-- मनोज भट्ट, कानपुर  ------------------------------------------------------ महाभारत केवल एक युद्धकथा नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के भीतर चल रहे नैतिक संघर्षों, भावनात्मक उलझनों और सत्ता के समीकरणों का दार्शनिक दस्तावेज है। इसके पात्र समय-काल की सीमाओं से परे जाकर आज भी हमारे सामाजिक और राजनीतिक जीवन में जीवंत प्रतीकों की तरह उपस्थित हैं। वर्तमान समय में विशेष रूप से धृतराष्ट्र और संजय का संबंध, एक अंधे राजा और एक दिव्य दृष्टि संपन्न सलाहकार का संवाद, आज के भारत में सत्ता और विवेक के बीच के तनाव को उजागर करता है। सबसे महत्वपूर्ण तत्व ये है कि महाभारत कालीन धृ...

बुनियादी शिक्षा...अक्षर ज्ञान से जीवन कौशल तक

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जब हम “बुनियादी शिक्षा” की बात करते हैं, तो अक्सर ध्यान केवल पढ़ना-लिखना और गिनती तक सीमित रह जाता है। परंतु शिक्षा का वास्तविक अर्थ इससे कहीं व्यापक है। शिक्षा का उद्देश्य केवल अक्षर ज्ञान नहीं, बल्कि एक सशक्त, संतुलित, स्वस्थ और नैतिक व्यक्ति का निर्माण है, जो जीवन की चुनौतियों का सामना आत्मविश्वास और विवेक से कर सके।   बुनियादी शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण तत्व यह है कि विश्व के सभी देश में इसका सकारात्मक प्रभाव, उसके "सामाजिक ताना-बाना" को मजबूती प्रदान करने वाला होता है। 1. शिक्षा का वास्तविक लक्ष्य सर्वप्रथम यह तो सर्वमान्य सत्य है कि पढ़ना-लिखना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि यह संज्ञानात्मक योग्यता की नींव रखता है। परंतु यह पर्याप्त नहीं है। बच्चों को हर तरह की समस्या-समाधान, आलोचनात्मक सोच, संवेदनशीलता, सहयोग और निर्णय-निर्माण जैसे कौशल भी सिखाना चाहिए।   भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) का लक्ष्य है कि हर बच्चा प्राथमिक स्तर पर आधारभूत साक्षरता और संख्या-ज्ञान प्राप्त करे, परंतु इसके साथ जीवन कौशलों का विकास भी उतना ही आवश्यक है।   2. शिक्षा के तीन...

आलोचना बनाम समालोचना : एक विचारशील पुनर्विचार

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              आलोचना बनाम समालोचना... एक विचारशील पुनर्विचार (विस्तारित संस्करण)      उपरोक्त विषय पर एक लेख अपने फेसबुक पेज पर दिनांक 13 मई 2025 को प्रकाशित किया था, जिसे आज थोड़ा सा विस्तार देते हुए "सामाजिक ताना-बाना" पर अपने पाठकों के लिए पुनः प्रस्तुत है। शब्दों की शक्ति और समाज की दिशा...     वर्तमान युग संवाद का युग है और आधुनिक तकनीक ने हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है, लेकिन साथ ही यह चुनौती भी दी है कि हम उस स्वतंत्रता का उपयोग किस प्रकार करें।       प्रश्न उठता है कि क्या हम केवल प्रतिक्रिया देने तक सीमित है या हम रचनात्मक और सुधार की दिशा में भी आगे बढ़ रहे हैं ? आलोचना और समालोचना दोनों ही अभिव्यक्त के रूप हैं, लेकिन इनका उद्देश्य और प्रभाव अलग-अलग है।     इस विस्तारित लेख में हम इन दोनों के बीच का अंतर गहराई से समझेंगे युवाओं और बुजुर्गो के दृष्टिकोण को जोड़ेंगे और यह जानेंगे की समालोचना को पुनः कैसे जीवित किया जा सकता है। " आलोचना", प्रतिक्रिया की तीव्रता, परिपक्वता की कमी ... ...

स्क्रीन का नशा – नई सदी का सबसे ख़ामोश, पर सबसे घातक नशा

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The Screen Addiction  नई सदी का सबसे ख़ामोश, पर सबसे घातक नशा         यूं तो मानव समाज में समय के साथ नशे की पहचान भी बदलती रही है। बीते वर्षों में जहां नशे का अर्थ शराब, सिगरेट या अन्य नशीले पदार्थों तक सीमित था, वहीं आज की 21वीं सदी में एक बेहद शांत पर बेहद घातक नशे ने जन्म लिया है। वह है..." स्क्रीन का नशा" । चेतावनी  :--   यह नशा न केवल खतरनाक है, बल्कि इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह बिना शोर-शराबे के, चुपचाप हमारी सोच, जीवनशैली और संबंधों को भीतर से खोखला कर रहा है।  हर आयु वर्ग पर असर करता है यह ‘नया नशा ’      नशा चाहे किसी भी प्रकार का हो, वह हर आयु और हर वर्ग को बिना किसी सीमा के अपनी गिरफ्त में ले लेता है। उसी तरह ये स्क्रीन का नशा भी आज पूरी दुनिया में लोगो को बड़ी तेजी से प्रभावित कर रहा है। हालांकि इस नशे के शिकार हर व्यक्ति को अपने पीड़ित होने का एहसास हो जाता है फिर भी वह खुद को रोक नहीं पाता और जाने अनजाने वह अपने ही परिवार में इसका प्रसार करना शुरू कर देता है।             शुरु...