जब सत्ता विवेक को नहीं सुनती: धृतराष्ट्र से आज तक
धृतराष्ट्र और संजय: महाभारत के संवाद में सत्ता और विवेक का द्वंद्व लेख की शुरुआत करने से पूर्व लेखक जिम्मेदारी के साथ यहां एक बात स्पष्ट करना चाहता है कि पूरे लेख में जहां भी सत्ता का संदर्भ आया है, उसका तात्पर्य उस पक्ष से है जो शासक है। न कि किसी दल विशेष से। क्योंकि लेखक का मानना है कि जो भी सत्ता में आता है, उसकी कार्य शैली अलग अलग हो सकती है, किंतु "परिणाम" सदियों से वही "ढाक के तीन पात" जैसे रहते हैं... लेखक;-- मनोज भट्ट, कानपुर ------------------------------------------------------ महाभारत केवल एक युद्धकथा नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के भीतर चल रहे नैतिक संघर्षों, भावनात्मक उलझनों और सत्ता के समीकरणों का दार्शनिक दस्तावेज है। इसके पात्र समय-काल की सीमाओं से परे जाकर आज भी हमारे सामाजिक और राजनीतिक जीवन में जीवंत प्रतीकों की तरह उपस्थित हैं। वर्तमान समय में विशेष रूप से धृतराष्ट्र और संजय का संबंध, एक अंधे राजा और एक दिव्य दृष्टि संपन्न सलाहकार का संवाद, आज के भारत में सत्ता और विवेक के बीच के तनाव को उजागर करता है। सबसे महत्वपूर्ण तत्व ये है कि महाभारत कालीन धृ...