संदेश

माता पिता लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जब बच्चे बात सुनना बंद कर देते हैं: माता-पिता क्या करें ?

चित्र
जब बच्चे बात सुनना बंद कर देते हैं: माता-पिता क्या करें ? सामाजिक ताना-बाना के लिए एक विचारशील लेख किशोरावस्था वो उम्र है जब घर में सबसे ज़्यादा कहानियां बनती हैं और साथ ही सबसे ज़्यादा दरवाज़े भी घर के ही बंद होते हैं। कल तक जो बच्चा हर छोटी से छोटी बात, अपनों को बताने दौड़कर आता था, आखिर क्यों आज वही आंखें चुराता है, जवाब में "हम्म" बोलता है या कमरे का दरवाज़ा भिड़ा देता है।  और फिर माता-पिता के लिए बच्चों का ऐसा व्यवहार और बच्चे की यह चुप्पी, शोर से भी ज़्यादा डरावनी होती है। अब यहां उनके अंदर कई तरह के सवाल उठते हैं कि "क्या बच्चे की परिवरिश में हमसे कोई गलती हो गई ? क्या हमारा बच्चा हाथ से निकल रहा है या निकल गया? यह लेख इसी मानसिक द्वंद्व और शारीरिक संघर्ष को समझने और सुलझाने की कोशिश है। हम इस लेख में, किशोर मस्तिष्क, बदलते रिश्ते, संवाद के टूटने की वजहें और उसे जोड़ने के व्यावहारिक तरीके देखेंगे। 1. किशोरावस्था: विद्रोह नहीं, विकास का दूसरा नाम सबसे पहले ये समझना जरूरी है कि किशोर का "बात न सुनना" हमेशा अनादर नहीं होता। शारीरिक और मानसिक परिवर्तन, एक स...

माँ-बाप की पुकार...रिश्तों की असली परिभाषा

चित्र
माँ-बाप की पुकार... रिश्तों की असली परिभाषा यह काव्य   रचना, आज के युवा कामकाजी बच्चों को समर्पित है और साथ ही उनके अंतरमन को जगाने का प्रयास भी, जो जाने अनजाने में अपने माता-पिता को भावनाओं के नाम पर, पास तो बुलाते हैं, पर अपनी जीवनशैली की सीमाओं में उन्हें बाँध देते हैं।    यह कविता एक आईना है, जिसमें हर बेटे-बेटी को अपनी भूमिका का पुनर्मूल्यांकन करते हुए उसकी असली तस्वीर देखनी चाहिए।   यह कविता केवल शब्दों का विन्यास नहीं, यह एक तपस्वी जीवन की गाथा है, उन माँ-बाप की, जिन्होंने अपने बच्चों के लिए हर सुख त्यागा, हर पीड़ा सहा, और हर क्षण को उनके भविष्य की नींव में बदल दिया।  यह कविता एक आह्वान है, उस सच्चे रिश्ते की ओर, जहाँ माँ-बाप केवल ज़रूरत नहीं, बल्कि जीवन की गरिमा हैं। जहाँ उनका साथ केवल सहारा नहीं, बल्कि आत्मबल का आधार है। यह कविता कोई शिकायत नहीं, कोई आरोप नहीं, यह एक संत की वाणी है, जो प्रेम और मर्यादा के साथ कहती है.... "माँ-बाप को अपनाओ, पर शर्तों के साथ नहीं।   सम्मान दो, पर दिखावे के लिए नहीं।   प्रेम दो, पर स्वार्थ के तले न...

माता-पिता का सम्मान क्यों जरूरी है? | बुजुर्गों की देखभाल और परिवार की जिम्मेदारी

चित्र
साथ चलती उम्र की कहानी ... (बुजुर्ग माता-पिता पार्क में बैठे हुए – सम्मान और अपनापन की तलाश में) आज के समय में बुजुर्ग माता-पिता का सम्मान और उनकी देखभाल केवल एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और मानवीय मूल्यों का आधार है। यह लेख परिवार, समाज और रिश्तों की सच्चाई को उजागर करता है। यह एक महत्वपूर्ण सामाजिक विषय बन गया है, माता-पिता वो दीवार है जो कभी नहीं गिरती, लेकिन जिसे हम भूल जाते हैं। ध्यान रखे कि जब कोई शिशु अपनी माँ की गोद में पहली बार आँखें खोलता है, तो दुनिया का सबसे पहला स्पर्श उसकी माँ की उँगलियों का होता है। वो नरम, गर्म, और बिना किसी शर्त का स्पर्श।  पिता, अपना हाथ उसकी पीठ पर रखकर उसे सहारा देता है वो सहारा जो जीवन भर चलता है। माँ-पिता उन दीवारों की तरह होते हैं जो तूफान में भी बच्चों को ढककर रखते हैं। कोई शोर और कोई आँधी उन्हें कभी हिला नहीं पाती। लेकिन... समय नाम का वो चोर, धीरे-धीरे सब बदल देता है। बचपन की यादें कितनी मीठी होती हैं, और कितनी कड़वी भी। रात के दो बजे माँ जाग रही है। बच्चे को बुखार चढ़ा हुआ है। माथे पर ठंडी पट्टी रखती हुई वो खुद थक चुकी है, लेकि...