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मुखौटों का बाजार

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                  मुखौटों का बाजार इंसानी समाज में मुखौटों का बाजार  हम सब बाजार जाते हैं, दुकानों पर सामान देखते हैं, पर एक बाजार ऐसा भी है जो दिखता नहीं, पर हर गली, हर मोहल्ले, हर ऑफिस, हर सोशल मीडिया की स्क्रीन पर लगा हुआ है। वह है, इंसान द्वारा पहने गए "मुखौटों का बाजार" और यह बाजार दिन पर दिन महंगा होता जा रहा है। यहां तक कि आज के पूरे विश्व में सबसे बड़ा बाजार यदि किसी चीज का गर्म है, तो वह है "मुखौटों का बाजार"। विभिन्न प्रकार के मुखौटे और उनकी कीमत आज समाज में लगभग हर इंसान तरह तरह के मुखौटे लगाए हुए है। लोगो की असलियत को जो मुखौटा सफलता पूर्वक सबसे ज्यादा और दीर्घकालिक छुपा देता है, उसकी कीमत सबसे अधिक होती है। कुछ मुखौटे ज्यादा दिन तक असलियत नहीं ढक पाते हैं, स्वाभाविक रूप से उसकी कीमत कम होगी। एक मुखौटा पारदर्शी होता है, जिसकी कीमत नकारात्मक में चली जाती है। ऐसे मुखौटे पहले ही दिन से इंसान की असलियत को ढक पाने में असमर्थ होते हैं। इसका अर्थ ये है कि जो इंसान अपनी असलियत को छुपाने के लिए जितना अच्छा मुखौटा लगायेगा, समाज में उसक...

"गरीब और अमीर", दुनिया में दो ही जाति और धर्म

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"गरीब और अमीर",  दुनिया में दो ही जाति और धर्म.... आज की दुनिया में बस, दो ही जाति और धरम ! नए नजरिए से देखिए, तो दूर हो जाएगा भरम  !! अपना परंपरागत रूढ़िवादी चश्मा उतार कर फेंक दीजिए और नए सिरे से, नए नजरिए का साफ चश्मा पहन कर अपने अगल बगल से लेकर दुनिया भर को देखिए तो आपको मेरी उपरोक्त दो पंक्तियों का संदेश स्पष्ट दिखने लगेगा। यदि अभी भी कुछ धुंधला दिख रहा है, तो पूरा लेख अवश्य पढ़ें... दरअसल दुनिया भर का मानव समाज अनगिनत जातियों, धर्म, भाषाओं और रंगबिरंगी संस्कृतियों से भरा हुआ हैं। लोग अलग-अलग देशों में रहते हैं, अलग-अलग रीति-रिवाजों को मानते हैं। लेकिन अगर हम गहराई से देखें तो सच्चाई यह है कि मानव समाज वास्तव में सिर्फ दो हिस्सों में बंटा हुआ है, गरीब और अमीर। यह विभाजन न किसी देश की सीमा से जुड़ा है, न किसी रंग या भाषा से। यह वह रेखा है जो हर इंसान के जीवन को सबसे गहरे स्तर पर छूती है। यह लेख इसी सच्चाई को सरल शब्दों में समझाने की कोशिश करता है। हम देखेंगे कि यह फर्क क्या है, यह कैसे पैदा होता है, इसका असर क्या है और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न ये है कि इसे कैसे मिटाया जा ...

जब सत्ता विवेक को नहीं सुनती: धृतराष्ट्र से आज तक

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धृतराष्ट्र और संजय: महाभारत के संवाद में सत्ता और विवेक का द्वंद्व लेख की शुरुआत करने से पूर्व लेखक जिम्मेदारी के साथ यहां एक बात स्पष्ट करना चाहता है कि पूरे लेख में जहां भी सत्ता का संदर्भ आया है, उसका तात्पर्य उस पक्ष से है जो शासक है। न कि किसी दल विशेष से। क्योंकि लेखक का मानना है कि जो भी सत्ता में आता है, उसकी कार्य शैली अलग अलग हो सकती है, किंतु "परिणाम" सदियों से वही "ढाक के तीन पात" जैसे रहते हैं... लेखक;-- मनोज भट्ट, कानपुर  ------------------------------------------------------ महाभारत केवल एक युद्धकथा नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के भीतर चल रहे नैतिक संघर्षों, भावनात्मक उलझनों और सत्ता के समीकरणों का दार्शनिक दस्तावेज है। इसके पात्र समय-काल की सीमाओं से परे जाकर आज भी हमारे सामाजिक और राजनीतिक जीवन में जीवंत प्रतीकों की तरह उपस्थित हैं। वर्तमान समय में विशेष रूप से धृतराष्ट्र और संजय का संबंध, एक अंधे राजा और एक दिव्य दृष्टि संपन्न सलाहकार का संवाद, आज के भारत में सत्ता और विवेक के बीच के तनाव को उजागर करता है। सबसे महत्वपूर्ण तत्व ये है कि महाभारत कालीन धृ...

वैश्विक उथल-पुथल के दौर में परिवारों में सामंजस्य की कशमकश...

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वैश्विक उथल-पुथल के दौर में परिवारों में सामंजस्य की कशमकश...    वैश्विक उथल-पुथल के दौर में बिखरते पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों के ताना-बाना को साधने की कशमकश ...        आज का युग वैश्विक अस्थिरता (Global Instability) और सामाजिक तनाव (Social Stress) का है। एक ओर महामारी, युद्ध और आर्थिक असमानता ने मानवता को झकझोरा है, तो वहीं दूसरी ओर परिवार, जो समाज की सबसे मूलभूत इकाई होती है, उसकी आंतरिक एकजुटता (Internal Cohesion) टूटने लगी है।       बच्चों से लेकर युवाओं और बुजुर्गों तक हर वर्ग आज एक अजीब सी कशमकश से गुजर रहा है। जहाँ पहले परिवार को “सुरक्षित आश्रय” माना जाता था, आज वहीं, अब वही स्थान तनाव, अविश्वास और मतभेद का प्रतीक बन रहा है।       इस लेख में हम देखेंगे कि कैसे वैश्विक उथल-पुथल का असर सीधे पारिवारिक जीवन पर पड़ रहा है, साथ ही उन रास्तों को तलाशने की कोशिश करेंगे, जिनसे परिवार और समाज एक बार फिर से सामंजस्य (Harmony) और तालमेल (Coordination) की नई दिशा में, एक नए रास्ते पर बढ़ सकें।   वैश्विक संकट और परिवारों पर प...

आम आदमी को ईश्वर संदेश

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  प्रार्थना और सपना – एक स्वचिंतन            रात के तीसरे पहर, जब सारा संसार निद्रा में लीन था, एक रहस्यमयी "शीतलता" मुझे जगाने लगी। नींद और जागरण के उस धुंधले क्षण में, एक दिव्य प्रकाश झलका... और उसी में प्रकट हुआ एक स्वप्न... ईश्वर का सन्देश, जो मेरी आत्मा को हमेशा के लिए झकझोर गया। "हे मानव!" एक गूंजती हुई दिव्य वाणी मेरे अंतर्मन में प्रतिध्वनित हुई.... "तू प्रतिदिन मुझसे प्रार्थना करता है,... एक ऐसे तेजस्वी बालक की याचना करता है, जो तेरे देश को गौरव की ऊँचाइयों तक ले जाए। परंतु सुन, हे मानव! मैं तो हर दिन तेरे समाज में एक 'सूर्यपुत्र' भेजता हूँ... ऐसा बालक जो ऊर्जा, संभावनाओं और दिव्य प्रतिभा से ओतप्रोत होता है... किन्तु तेरा समाज उसे बचा नहीं पाता।" मैं स्तब्ध था। वाणी पुनः गूंजी.... "हे मानव! उस बालक के लिए तेरा 'समाज' ही वह प्रथम परीक्षा है, जहाँ वह बालक असफल हो जाता है..." "शैशव काल में उसे भूख और उपेक्षा का स्वाद चखना पड़ता है..." "बाल्यकाल में उसे शिक्षा के स्थान पर अराजकता मिलती है..." "किशोर हो...

समाज और परिवार में संवाद का क्षय

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परिवार और समाज में राजनीतिक बहस संवादहीनता का संकट और सामाजिक पुनरुत्थान का मार्ग.... लगभग तीन दशक पूर्व, भारतीय घरों की बैठकें और समाज की गोष्ठियाँ विचारों का जीवंत केन्द्र हुआ करती थीं। शाम ढलते ही चाय की केतली चूल्हे पर चढ़ती, और लोग धर्म, शिक्षा, संस्कृति, नैतिक मूल्यों तथा जीवन की गहराइयों पर चर्चा करते।  बच्चे, बुजुर्गों के पैर छूते, उनकी कहानियाँ सुनते; महिलाएँ घर-गृहस्थी के साथ-साथ सामाजिक मुद्दों में अपनी भूमिका निभातीं। असहमति होती, लेकिन गरिमा के साथ। संवाद में संवेदना होती, सहमति में उत्साह और असहमति में भी सम्मान। वह समय था जब परिवार एक जीवित इकाई था न कि विवाद-कक्ष। समाज एक बुनाव था, न कि टूटे तारों का ढेर। किंतु धीरे-धीरे, जैसे-जैसे टेलीविजन, सोशल मीडिया और 24×7 न्यूज़ चैनलों का वर्चस्व बढ़ा, “राजनीति” ने संवाद के सिंहासन पर कब्जा कर लिया। आज सुबह की चाय से लेकर रात के भोजन तक, हर मेज पर वही एक विषय घूमता है, राजनीति।  बेरोजगारी, शिक्षा की बदहाली, स्वास्थ्य व्यवस्था की खामियाँ, ग्रामीण-नगरीय असंतुलन जैसे वास्तविक सामाजिक मुद्दे चर्चा से गायब हो चुके हैं। परिवारि...