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बुढ़ापे की वैश्विक यात्रा: संपत्ति के मोह से संस्कार की ओर

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बुढ़ापे की वैश्विक यात्रा: संपत्ति के मोह से संस्कार की ओर ... समय किसी एक देश की सीमा में नहीं बंधता। वह जब करवट लेता है तो पूरी दुनिया की धड़कन बदल जाती है। वृद्धावस्था की अवधारणा भी अब किसी एक संस्कृति का प्रश्न नहीं रही। टोक्यो की तंग गलियों से लेकर टोरंटो के उपनगरों तक, स्टॉकहोम के सीनियर लिविंग अपार्टमेंट से लेकर सूरत की पुरानी हवेलियों तक, एक ही प्रश्न गूँज रहा है, बुढ़ापे का असली सहारा क्या है ? कुछ दशक पहले तक इसका उत्तर लगभग सार्वभौमिक था: बचत, पेंशन, मकान, ज़मीन। पश्चिम में ‘रिटायरमेंट नेस्ट एग’ और पूरब में ‘बुढ़ापे की लाठी’ ल, शब्द अलग थे, भाव एक था। माना जाता था कि संतानें न केवल रक्त-संबंध के कारण, बल्कि विरासत की प्रत्याशा में भी माता-पिता की छाया बनकर रहेंगी।  पर वैश्वीकरण, शहरीकरण और डिजिटल क्रांति ने इस समीकरण को पूरी दुनिया में हिला दिया है। आज जर्मनी का बुजुर्ग भी उतना ही अकेला है जितना जापान का, और कैलिफोर्निया की माँ भी उतनी ही संवाद के लिए तरसती है जितनी कोलकाता की। इसलिए अब वृद्धावस्था को केवल आर्थिक या पारिवारिक नहीं, वैश्विक सामाजिक लेंस से देखना आवश्यक ह...