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युवा पीढ़ी और समय की पुकार

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युवा पीढ़ी के लिए, रचनात्मकता और समय की पुकार .... सोशल मीडिया के भंवर से सृजन के शिखर तक... युवा ऊर्जा और वर्तमान परिदृश्य किसी भी राष्ट्र , समाज और पूरी दुनिया का भविष्य उसकी युवा पीढ़ी की ऊर्जा , सोच और उसकी दिशा पर निर्भर करता है । युवावस्था जीवन का वह स्वर्णिम काल है , जिसमें असीम संभावनाएं , असीमित ऊर्जा और कुछ नया कर गुजरने का अद्वितीय जज्बा होता है ।   इस अवस्था में व्यक्ति जो भी बीज बोता है , उसी की फसल उसे और उसके आने वाली पीढ़ियों को काटनी पड़ती है । लेकिन आज जब हम अपने चारों ओर नजर दौड़ाते हैं , तो एक बेहद चिंताजनक तस्वीर उभर कर सामने आती है । हमारी युवा पीढ़ी , जिसके कंधों पर नए युग के निर्माण की जिम्मेदारी है , वह एक ऐसे मायाजाल में उलझ गई है , जिसका न कोई अंत है और न ही कोई सार्थक परिणाम । यह मायाजाल  है,  सोशल मीडिया और डिजिटल दुनिया का । ​ आज के दौर में युवा अपनी अनमोल ऊर्जा और बहुमूल्य समय का ...

जब बच्चे बात सुनना बंद कर देते हैं: माता-पिता क्या करें ?

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जब बच्चे बात सुनना बंद कर देते हैं: माता-पिता क्या करें ? सामाजिक ताना-बाना के लिए एक विचारशील लेख किशोरावस्था वो उम्र है जब घर में सबसे ज़्यादा कहानियां बनती हैं और साथ ही सबसे ज़्यादा दरवाज़े भी घर के ही बंद होते हैं। कल तक जो बच्चा हर छोटी से छोटी बात, अपनों को बताने दौड़कर आता था, आखिर क्यों आज वही आंखें चुराता है, जवाब में "हम्म" बोलता है या कमरे का दरवाज़ा भिड़ा देता है।  और फिर माता-पिता के लिए बच्चों का ऐसा व्यवहार और बच्चे की यह चुप्पी, शोर से भी ज़्यादा डरावनी होती है। अब यहां उनके अंदर कई तरह के सवाल उठते हैं कि "क्या बच्चे की परिवरिश में हमसे कोई गलती हो गई ? क्या हमारा बच्चा हाथ से निकल रहा है या निकल गया? यह लेख इसी मानसिक द्वंद्व और शारीरिक संघर्ष को समझने और सुलझाने की कोशिश है। हम इस लेख में, किशोर मस्तिष्क, बदलते रिश्ते, संवाद के टूटने की वजहें और उसे जोड़ने के व्यावहारिक तरीके देखेंगे। 1. किशोरावस्था: विद्रोह नहीं, विकास का दूसरा नाम सबसे पहले ये समझना जरूरी है कि किशोर का "बात न सुनना" हमेशा अनादर नहीं होता। शारीरिक और मानसिक परिवर्तन, एक स...

समय की साक्षी: घड़ी की आत्मकथा से जीवन की प्रेरणा

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समय की चुप साक्षी, की आत्मकथा से जीवन की प्रेरणा...                           "मैं घड़ी हूं..."    (युवा पीढ़ी के लिए एक प्रेरणादायक दृष्टिकोण) लेखक: मनोज भट्ट, कानपुर   संपादन: गायत्री भट्ट   ब्लॉग: सामाजिक ताना-बाना            मनोज भट्ट जी द्वारा रचित यह "घड़ी की आत्मकथा" यह वाक्य मात्र नहीं, बल्कि एक जीवनदर्शी की पुकार है। और न ही केवल एक उपकरण की कहानी है, बल्कि समय के साथ चलने, उसे समझने और उसका सम्मान करने की प्रेरणा देती है।       किशोरावस्था और युवा जीवन में, जब सपनों की उड़ान और चुनौतियों की आंधी साथ-साथ चलती है, तब यह लेख एक मार्गदर्शक की तरह सामने आता है।   समय: सबसे मूल्यवान संसाधन     आज के युवाओं के लिए सबसे बड़ी पूंजी " समय"  है। उदाहरण देखिए और समझिए कि जिन्होंने समय की कीमत को समय से पूर्व समझा, आज अपने अपने क्षेत्र में सफलता से उनकी अलग ही पहचान से है। जैसे... * बिल गेट्स ने Microsoft की नींव तब रखी जब वे...

संघर्ष ही आत्मबल का स्रोत

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                संघर्ष ही आत्मबल का स्रोत  आज का युवा छोटी-सी असफलता या संघर्ष देखकर हतोत्साहित हो जाता है। इसका कारण है कि उन्हें बचपन से ही कठिन परिस्थितियों से जूझने के अवसर से उनके ही माता पिता ही वंचित कर देते हैं ।        संघर्ष ही आत्मबल का शिक्षक है, कठिनाइयाँ हमें हमारी कमजोरियों और मजबूतियों से परिचित कराती हैं। जब हम उनसे जूझते हैं, तो आत्मविश्वास और धैर्य बढ़ता है। मानव जीवन सरल रास्तों से नहीं, बल्कि संघर्षों से निखरता है।        जब इंसान कठिनाइयों से जूझता है तो उसे अपनी वास्तविक क्षमता का पता चलता है। संघर्ष हमें यह सिखाता है कि किस परिस्थिति में धैर्य रखना है, कहाँ साहस दिखाना है और कैसे अपनी कमजोरियों को ताकत में बदलना है।         इसे एक सरल उदाहरण द्वारा आसानी से समझा जा सकता है जैसे आप सबने टीवी पर जंगल के कुछ वीडियो देखे होंगे, जिसमें शेर के बच्चे अपने माता-पिता से कैसे शिक्षा प्राप्त करते हैं वह उदाहरण सबसे समीचीन है। शेर मां-बाप द्वारा बच्चों को कब तक खुद स...