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उद्देश्य से भटकती सोशल मीडिया "ग्रुप्स" : एक चिंतन

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उद्देश्य से भटकती सोशल मीडिया"ग्रुप्स" (एक सामाजिक चिंतन...)       आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया ने संवाद, अभिव्यक्ति और सामाजिक जुड़ाव के नए द्वार खोल दिए हैं। विशेष रूप से " ग्रुप्स ", चाहे वे व्हाट्सएप, फेसबुक, टेलीग्राम या अन्य प्लेटफॉर्म्स पर हों।        शुरुआत में तो ये ग्रुप्स, सामाजिक जागरूकता, ज्ञान-विज्ञान का विनिमय और भावनात्मक जुड़ाव के सशक्त माध्यम थे। परंतु समय के साथ इनकी संरचना और उद्देश्य में निम्न स्तर तक की गिरावट दिखती है।        परिवारिक और सामाजिक ताना-बाना के लिए चेतावनी भी। जो "डिजिटल संस्कृति" की गिरती गुणवत्ता का संकेत तो  देता ही है, साथ ही हमारी "मूल सामाजिक संस्कृति" के प्रति चिंताजनक भी है। प्रारंभिक उद्देश्य:  संवाद और समरसता       अधिकांश सोशल मीडिया ग्रुप्स की शुरुआत किसी सकारात्मक उद्देश्य से होती है, जिसका उद्देश्य.... प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, तकनीकी सहायता, साहित्यिक विमर्श आदि पर ज्ञान साझा करना। पर्यावरण, स्वास्थ्य, शिक्षा या सामाजिक सुधार से जुड़े विषय में साम...

स्क्रीन का नशा – नई सदी का सबसे ख़ामोश, पर सबसे घातक नशा

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The Screen Addiction  नई सदी का सबसे ख़ामोश, पर सबसे घातक नशा         यूं तो मानव समाज में समय के साथ नशे की पहचान भी बदलती रही है। बीते वर्षों में जहां नशे का अर्थ शराब, सिगरेट या अन्य नशीले पदार्थों तक सीमित था, वहीं आज की 21वीं सदी में एक बेहद शांत पर बेहद घातक नशे ने जन्म लिया है। वह है..." स्क्रीन का नशा" । चेतावनी  :--   यह नशा न केवल खतरनाक है, बल्कि इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह बिना शोर-शराबे के, चुपचाप हमारी सोच, जीवनशैली और संबंधों को भीतर से खोखला कर रहा है।  हर आयु वर्ग पर असर करता है यह ‘नया नशा ’      नशा चाहे किसी भी प्रकार का हो, वह हर आयु और हर वर्ग को बिना किसी सीमा के अपनी गिरफ्त में ले लेता है। उसी तरह ये स्क्रीन का नशा भी आज पूरी दुनिया में लोगो को बड़ी तेजी से प्रभावित कर रहा है। हालांकि इस नशे के शिकार हर व्यक्ति को अपने पीड़ित होने का एहसास हो जाता है फिर भी वह खुद को रोक नहीं पाता और जाने अनजाने वह अपने ही परिवार में इसका प्रसार करना शुरू कर देता है।             शुरु...