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"क्षमा"... सह-अस्तित्व की मौन शक्ति

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"क्षमा"...सामाजिक ताना-बाना का एक महत्वपूर्ण तत्व      "जिस समाज में "क्षमा" की भावना नहीं, वहाँ संवाद नहीं। जहाँ संवाद नहीं, वहाँ सह-अस्तित्व नहीं। और जहाँ सह-अस्तित्व नहीं, वहाँ केवल अकेलापन और अविश्वास की दीवारें हैं।" "क्षमा", एक भूली हुई नैतिकता      हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ तकनीक ने संवाद को तेज़ किया है, लेकिन संवेदना को धीमा। जहाँ हम दूसरों की गलतियों को माइक्रोस्कोप से देखते हैं, पर अपनी भूलों को धुंधले शीशे में। क्षमा, जो कभी मानवीय संबंधों की रीढ़ हुआ करती थी, आज एक दुर्लभ गुण बनती जा रही है।     क्या आपने कभी सोचा है कि हम दूसरों से इतनी कठोर अपेक्षाएँ क्यों रखते हैं, जबकि स्वयं को बार-बार माफ़ कर देते हैं ? यही प्रश्न इस लेख की आत्मा है। आत्ममंथन की अनुपस्थिति: जब हम खुद को ही केंद्र मान लेते हैं...     आज का समाज आत्ममंथन से दूर होता जा रहा है। हम अपनी कमियों को "इंसानी फितरत" कहकर तर्कों की चादर ओढ़ा देते हैं। "मैं भी तो इंसान हूँ", यह वाक्य हमारे लिए ढाल बन गया है। लेकिन जब कोई और गलती करता है, तो ...