संदेश

जुलाई, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

वृद्धावस्था की नई परिभाषा: संपत्ति नहीं, संस्कार और संबंध हैं सहारा

चित्र
                 वृद्धावस्था की नई परिभाषा...       संपत्ति नहीं, संस्कार और संबंध हैं सच्चा सहारा   तेजी से बदलते समय, सामाजिक संरचनाओं और पारिवारिक व्यवस्थाओं ने वृद्धावस्था की परिभाषा को पूरी तरह बदल दिया है। एक समय था जब माना जाता था कि जितनी अधिक संचित संपत्ति होगी, उतना ही बुढ़ापा सुरक्षित होगा।         माता-पिता के लिए संतानें सबसे बड़ी ढाल और सहारा थीं, क्योंकि भावनात्मक जुड़ाव के साथ-साथ संपत्ति की सुरक्षा और हिस्सेदारी की भावना उन्हें माता-पिता की देखभाल के लिए प्रेरित करती थी।      लेकिन बदलते दौर ने इस सोच की सीमाओं को धराशाई कर दिया है। आज स्पष्ट है कि संपत्ति कभी भी रिश्तों को स्थायी रूप से जोड़कर नहीं रख सकती। वास्तविक सहारा धन नहीं, बल्कि संस्कार, संवाद, संबंध और आपसी सम्मान हैं। बदलती सामाजिक तस्वीर      भारत की पारंपरिक संयुक्त परिवार प्रणाली ने सदियों तक बुजुर्गों को सहारा दिया। दादा-दादी, पोते-पोतियों के साथ रहते थे, घर में निर्णय का अधिकार उनके पास...

“रिटर्न गिफ्ट की परंपरा बनाम भावनाओं की गरिमा: एक आवश्यक सामाजिक विचार”

चित्र
रिटर्न गिफ्ट की चकाचौंध में दम तोड़ती सामाजिक संवेदनाएँ... उपहार या व्यापार ?" (एक आवश्यक एवम् ज्वलंत सामाजिक विचार)   परंपरा का आधुनिक विरूपण भारतीय संस्कृति में 'अतिथि' को ईश्वर का रूप माना गया है। हमारे संस्कारों में भेंट या उपहार देना 'त्याग' और 'समर्पण' का प्रतीक था। प्राचीन काल में जब कोई अतिथि घर आता था, तो विदा होते समय उसे कुछ फल, मिठाई या वस्त्र भेंट करना इस बात का प्रतीक था कि मेजबान के मन में उसके प्रति अगाध प्रेम है।  परंतु, आज के उपभोक्तावादी युग में इस सुंदर परंपरा का स्वरूप विकृत हो चुका है। 'रिटर्न गिफ्ट' (Return Gift) के नाम पर एक ऐसी व्यवस्था खड़ी कर दी गई है, जो आत्मीयता की जड़ों में मट्ठा डाल रही है। यह लेख केवल एक विचार नहीं, बल्कि उस बढ़ती हुई सामाजिक बीमारी का एक्सरे है, जो हमारे रिश्तों को भीतर से खोखला कर रही है। 1. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में  भारतीय दर्शन हमेशा से "देने" पर केंद्रित रहा है, न कि "बदले में पाने" पर। हमारे शास्त्रों में आवश्यकता से अधिक संचय न करना और 'दान' के महत्व को समझाया गया है। ...