वृद्धावस्था की नई परिभाषा... संपत्ति नहीं, संस्कार और संबंध हैं सच्चा सहारा तेजी से बदलते समय, सामाजिक संरचनाओं और पारिवारिक व्यवस्थाओं ने वृद्धावस्था की परिभाषा को पूरी तरह बदल दिया है। एक समय था जब माना जाता था कि जितनी अधिक संचित संपत्ति होगी, उतना ही बुढ़ापा सुरक्षित होगा। माता-पिता के लिए संतानें सबसे बड़ी ढाल और सहारा थीं, क्योंकि भावनात्मक जुड़ाव के साथ-साथ संपत्ति की सुरक्षा और हिस्सेदारी की भावना उन्हें माता-पिता की देखभाल के लिए प्रेरित करती थी। लेकिन बदलते दौर ने इस सोच की सीमाओं को धराशाई कर दिया है। आज स्पष्ट है कि संपत्ति कभी भी रिश्तों को स्थायी रूप से जोड़कर नहीं रख सकती। वास्तविक सहारा धन नहीं, बल्कि संस्कार, संवाद, संबंध और आपसी सम्मान हैं। बदलती सामाजिक तस्वीर भारत की पारंपरिक संयुक्त परिवार प्रणाली ने सदियों तक बुजुर्गों को सहारा दिया। दादा-दादी, पोते-पोतियों के साथ रहते थे, घर में निर्णय का अधिकार उनके पास...
सामाजिक ताना-बाना - मनोज भट्ट कानपुर के ब्लॉग पर परिवार, रिश्ते, समाज और जीवन से जुड़े गहरे विचारशील लेख। वास्तविक अनुभवों के साथ समाज को बेहतर समझने का सफर।