बदलते समाज में बुजुर्गों की उपेक्षा: एक नैतिक और सामाजिक संकट
" बदलते समाज में बुजुर्गों की उपेक्षा: एक गहरी सामाजिक और नैतिक चुनौती" लेखक: मनोज भट्ट, भारतीय समाज की आत्मा हमेशा से सम्मान, सह-अस्तित्व और संवेदना में बसती रही है। यहाँ उम्र बढ़ने के साथ व्यक्ति का महत्व बढ़ता था, घटता नहीं। बुजुर्ग केवल परिवार के सदस्य नहीं, बल्कि संस्कारों के संवाहक, परंपराओं के रक्षक और जीवन के कठिन मोड़ों पर मार्गदर्शक माने जाते थे। अब बुजुर्गों का अनुभव बोझ समझा जाने लगा है आज का समाज एक विचित्र विरोधाभास से गुजर रहा है। एक ओर हम विकास, तकनीक और आधुनिकता की बात करते हैं, दूसरी ओर अपने ही घरों में बैठे उन लोगों को अनदेखा कर देते हैं। जिन्होंने हमें चलना, बोलना और जीना सिखाया। जिनके पास हर क्षेत्र से संबंधित एक लंबी उम्र का अनुभव होता है और जो "सामाजिक ताना-बाना" के मजबूत आधार हैं, अब हम उन्हें महत्व नहीं देते। बदलते सामाजिक ढांचे में बुजुर्गों की उपेक्षा केवल एक पारिवारिक समस्या नहीं रह गई है बल्कि यह एक गंभीर सामाजिक संकट और नैतिक पतन का संकेत बन चुकी है। भारतीय पारिवारिक संरचना: अतीत से वर्तमान तक कभी भारतीय समाज की पहचान संयुक्त परिवारों ...