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मानवता के भविष्य की खोज

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मानवता के भविष्य की खोज बिखरता ताना-बाना....​ वो सुनहरे धागे , जो अब कहीं खो गए से लगते  हैं... ​ किसी भी समाज का निर्माण ईंट और पत्थरों से नहीं , बल्कि इंसानी भावनाओं , विश्वास और एक - दूसरे के प्रति समर्पण से होता है । एक समय था जब हमारे मानवीय समाज के   ताने - बाने की बुनावट बेहद खूबसूरत और मजबूत हुआ करती थी । अगर हम कुछ दशक   पीछे मुड़कर देखें , तो हमें एक ऐसा समाज नजर आता है , जिसकी नींव में आधुनिकता की चकाचौंध भले ही न हो , लेकिन मानवीय संवेदनाओं की गहराई अथाह थी । ​ कल का वो समाज , जिसे हमने पीछे छोड़ दिया... तब अधिकांश  घरों में ताले नहीं होते थे , बल्कि लोगों के दिलों में एक - दूसरे  की सुरक्षा के प्रति, कर्तव्य वाली सोंच की  जगह हुआ करती थी । जीवन में आज जैसी भागदौड़ और ' गलाकाट प्रतियोगिता ' नहीं थी । सफलता का पैमाना यह नहीं था कि आपने कितने लोगों को पीछे छोड़ा , बल्कि यह था कि आपने कितने लोगों को साथ लेकर चले ।   और ...

कल की कथा, आज की व्यथा (द्वितीय भाग)

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कल की कथा, आज की व्यथा  (द्वितीय भाग) कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई आँसुओं में नहीं, बल्कि मुस्कुराते हुए कहे गए व्यंग्य में छिपी होती है।  यह कविता भी ऐसी ही एक व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति है, जिसमें "पिटना" केवल शारीरिक मार का प्रतीक नहीं, बल्कि उस आम आदमी की रोज़मर्रा की बेबसी, अपमान, संघर्ष और व्यवस्था से लगातार होती टकराहट का रूपक है। बचपन की डाँट से लेकर दफ्तरों की उपेक्षा तक, रिश्तों की उलझनों से लेकर समाज और व्यवस्था की विसंगतियों तक, ज़िंदगी हर मोड़ पर हमें किसी न किसी रूप में "पीटती" रही है। समय बदला, चेहरे बदले, परिस्थितियाँ बदलीं, लेकिन आम आदमी की व्यथा आज भी वैसी ही है। यह कविता किसी व्यक्ति, धर्म, संस्था या वर्ग पर कटाक्ष नहीं, बल्कि उन सामाजिक परिस्थितियों और व्यवस्था पर एक हल्का-फुल्का लेकिन गहरा व्यंग्य है, जहाँ संवेदनशील इंसान कभी व्यवस्था से, कभी हालात से और कभी अपनी ही उम्मीदों से हारता दिखाई देता है। आइए, मुस्कुराते हुए इस व्यथा को महसूस करें और इस व्यंग्य में छिपे उस सच को पहचानें, जो शायद कहीं न कहीं हम सभी की अपनी कहानी है। कविता का मूल भाव हा...