नए ताने-बाने की बुनावट
नए ताने-बाने की बुनावट “टूटे हुए धागों को फेंकने के बजाय, यदि संयम और प्रेम से उनमें गांठ लगा कर जोड़ा जाए, तो समाज की चादर पहले से कहीं अधिक मजबूत हो सकती है।” आज का समाज एक पुरानी चादर की तरह लगता है, जिसमें कई जगह से धागे उधड़ गए हैं, टूट गए हैं। कुछ धागे रंग बिरंगे दिखते हैं, लेकिन असल में वे कमजोर हो चुके हैं ठीक उसी तरह से जैसे अंधाधुंध भागती दुनिया में हमने अपने रिश्तों को, मूल्यों को और एक-दूसरे के प्रति लगाव को अनदेखा कर दिया है। शहरों की चमक-दमक, सोशल मीडिया की रोशनी और उपभोग की संस्कृति ने हमें इतना व्यस्त कर दिया है कि हम भूल गए हैं कि असली ताकत इंसानी रिश्तों में छिपी है। हम सब एक गहरी खाई के किनारे खड़े हैं, जहां नीचे अंधेरा है, अलगाव है, टूटन है और नैतिक पतन है। लेकिन अच्छी खबर यह है कि हम अभी गहरी अंधेरी और खाई में गिरे नहीं हैं। हम अभी भी वापस लौट सकते हैं, एक बार फिर से टूटे धागों को समेट सकते हैं और संयम, प्रेम, विवेक तथा साहस से एक नया, मजबूत ताना-बाना बुन सकते हैं, क्योंकि ये खूबियां भारतीय समाज में है। यह नया ता...