संदेश

नए ताने-बाने की बुनावट

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             नए ताने-बाने की बुनावट “टूटे हुए धागों को फेंकने के बजाय, यदि संयम और प्रेम से उनमें गांठ लगा कर जोड़ा जाए, तो समाज की चादर पहले से कहीं अधिक मजबूत हो सकती है।” आज का समाज एक पुरानी चादर की तरह लगता है, जिसमें कई जगह से धागे उधड़ गए हैं, टूट गए हैं। कुछ धागे रंग बिरंगे दिखते हैं, लेकिन असल में वे कमजोर हो चुके हैं ठीक उसी तरह से जैसे अंधाधुंध भागती दुनिया में हमने अपने रिश्तों को, मूल्यों को और एक-दूसरे के प्रति लगाव को अनदेखा कर दिया है।  शहरों की चमक-दमक, सोशल मीडिया की रोशनी और उपभोग की संस्कृति ने हमें इतना व्यस्त कर दिया है कि हम भूल गए हैं कि असली ताकत इंसानी रिश्तों में छिपी है। हम सब एक गहरी खाई के किनारे खड़े हैं, जहां नीचे अंधेरा है, अलगाव है, टूटन है और नैतिक पतन है। लेकिन अच्छी खबर यह है कि हम अभी गहरी अंधेरी और खाई में गिरे नहीं हैं। हम अभी भी वापस लौट सकते हैं, एक बार फिर से टूटे धागों को समेट सकते हैं और संयम, प्रेम, विवेक तथा साहस से एक नया, मजबूत ताना-बाना बुन सकते हैं, क्योंकि ये खूबियां भारतीय समाज में है। यह नया ता...

भौतिकतावाद में सिमटती संवेदनाएं

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भौतिकतावाद  में सिमटती संवेदनाएं भटकाव का चक्रव्यूह “जब इंसान अंदर से पूरी तरह खाली और भटका हुआ हो जाता है, तो वह उस भयानक खालीपन को बाहर की निर्जीव वस्तुओं और व्यर्थ के शोर से भरने की कोशिश करता है।” हां यह सच है कि आज का इंसान इतना ज्यादा व्यस्त रहता है, जितना पहले कभी नहीं था। लेकिन सच यह भी है कि इतनी व्यस्तताओं के बाद भी वह जितना आज अकेला है उतना पहले कभी अकेला और खाली नहीं रहा।  चारों तरफ रोशनी है, स्क्रीन्स चमक रही हैं, आवाजें गूंज रही हैं, लेकिन अंदर एक सन्नाटा है जो दिन-ब-दिन गहरा होता जा रहा है। और इस भयावह सन्नाटे में आज का इंसान भटक गया है। लेकिन यह भटकाव कोई संयोग मात्र नहीं है।  पूरी दुनिया में अधिकांश सत्ता के शासकों द्वारा अपनी सत्ता को लंबे समय निर्बाध रूप से संचालित करने के लिए पर्दे के पीछे ऐसी गुप्त कूटनीति ( मनोरंजन की अफीम का चक्रव्यूह ) बनाई जाती है कि जिससे आम जन मानस, खासकर युवा वर्ग उसमें उलझ कर अपने मूल उद्देश्य से भटक जाए। जिसका उल्लेख इस लेख में विस्तार से आगे है। इस लेख में हम इन विचारों को विस्तार से समझेंगे, भारतीय संदर्भ में उनके प्रभावों ...

मुखौटों का बाजार

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                  मुखौटों का बाजार इंसानी समाज में मुखौटों का बाजार  हम सब बाजार जाते हैं, दुकानों पर सामान देखते हैं, पर एक बाजार ऐसा भी है जो दिखता नहीं, पर हर गली, हर मोहल्ले, हर ऑफिस, हर सोशल मीडिया की स्क्रीन पर लगा हुआ है। वह है, इंसान द्वारा पहने गए "मुखौटों का बाजार" और यह बाजार दिन पर दिन महंगा होता जा रहा है। यहां तक कि आज के पूरे विश्व में सबसे बड़ा बाजार यदि किसी चीज का गर्म है, तो वह है "मुखौटों का बाजार"। विभिन्न प्रकार के मुखौटे और उनकी कीमत आज समाज में लगभग हर इंसान तरह तरह के मुखौटे लगाए हुए है। लोगो की असलियत को जो मुखौटा सफलता पूर्वक सबसे ज्यादा और दीर्घकालिक छुपा देता है, उसकी कीमत सबसे अधिक होती है। कुछ मुखौटे ज्यादा दिन तक असलियत नहीं ढक पाते हैं, स्वाभाविक रूप से उसकी कीमत कम होगी। एक मुखौटा पारदर्शी होता है, जिसकी कीमत नकारात्मक में चली जाती है। ऐसे मुखौटे पहले ही दिन से इंसान की असलियत को ढक पाने में असमर्थ होते हैं। इसका अर्थ ये है कि जो इंसान अपनी असलियत को छुपाने के लिए जितना अच्छा मुखौटा लगायेगा, समाज में उसक...

गांव का सच और हमारी सोच, पगडंडी से चौपाल तक

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गांव का सच और हमारी सोच  पगडंडी से चौपाल तक,  शोर में दबा हुआ सच गांव की पगडंडी पर जब हम चलते हैं, तो पैर के नीचे सिर्फ मिट्टी नहीं होती, बल्कि पूरी एक कहानी होती है, कई पीढ़ियों का एक इतिहास होता है। यह वही मिट्टी है जिसने हमें चलना सिखाया, जिसने हमारे दादा-परदादा को अन्न दिया। यह खेत, यह बगिया, यह पोखरा, यह बरगद के नीचे की चौपाल, यह सब हमारी पहचान है। शहर में लोग एड्रेस से पहचाने जाते हैं, गांव में लोग मिट्टी से पहचाने जाते हैं। दरअसल इसी मिट्टी के नीचे में हमारी जड़ें हैं। पर आज जब उसी पगडंडी पर चलते हुए मैं लोगों की आंखों में देखता हूं, तो एक अजीब सा बोझ दिखता है। चेहरे पर झुर्रियां तो पहले भी थीं, पर अब उन झुर्रियों में चिंता ज्यादा है। आंखों में थकान ज्यादा है। लोग हंसते तो हैं, पर वह हंसी खुलकर नहीं निकलती। लगता है जैसे भीतर कुछ घुट रहा है। आज का समय बड़ा अजीब है। अब गांव में भी चारों तरफ शोर है। सुबह-सुबह मंदिर में लाउडस्पीकर पर भजन, दोपहर में टीवी पर नेता लोगन की बहस, शाम को मोबाइल में टिक-टिक नोटिफिकेशन, और बाजार में सब्जी वाले की चिल्लाहट। इतना शोर है कि आ...