सोशल मीडिया और बच्चों का खोता बचपन (आत्म-सम्मान की लड़ाई... एक मनोवैज्ञानिक युद्ध) आज की दुनिया में मोबाइल फोन हर बच्चे की जेब में है। स्कूल जाते समय, घर लौटते समय, खाना खाते समय और सोने से पहले तक बच्चे स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रहते हैं। सोशल मीडिया अब केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहा, बल्कि यह हमारे बच्चों के मन, विचार और आत्म-सम्मान को गहरे स्तर पर प्रभावित कर रहा है। यह लेख उन माता-पिता, शिक्षकों और अभिभावकों के लिए है जो अपने बच्चों को एक स्वस्थ, आत्मविश्वासी और खुशहाल इंसान बनाना चाहते हैं। हम सरल भाषा में समझेंगे कि सोशल मीडिया कैसे काम करता है, यह हमारे बच्चों के मन पर क्या असर डाल रहा है और हम मिलकर इस चुनौती से कैसे निपट सकते हैं। गणना प्रणाली का जाल: आपकी पसंद या मशीन की चाल ? सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म कोई साधारण ऐप नहीं हैं। इनके पीछे दुनिया के सबसे तेज कंप्यूटर चल रहे हैं। जब आपका बच्चा फोन पर ऊपर-नीचे स्क्रॉल करता है, तो पीछे बैठी मशीन हर छोटी-छोटी हरकत को ध्यान से देखती है। किस तस्वीर पर बच्चा रुका ? कितनी देर तक देखा ? किस तस्वीर को पसंद किया ? किसे स्किप कर दिया ? ...
सामाजिक ताना-बाना - मनोज भट्ट कानपुर के ब्लॉग पर परिवार, रिश्ते, समाज और जीवन से जुड़े गहरे विचारशील लेख। वास्तविक अनुभवों के साथ समाज को बेहतर समझने का सफर।