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माँ-बाप की पुकार...रिश्तों की असली परिभाषा

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माँ-बाप की पुकार... रिश्तों की असली परिभाषा यह काव्य   रचना, आज के युवा कामकाजी बच्चों को समर्पित है और साथ ही उनके अंतरमन को जगाने का प्रयास भी, जो जाने अनजाने में अपने माता-पिता को भावनाओं के नाम पर, पास तो बुलाते हैं, पर अपनी जीवनशैली की सीमाओं में उन्हें बाँध देते हैं।    यह कविता एक आईना है, जिसमें हर बेटे-बेटी को अपनी भूमिका का पुनर्मूल्यांकन करते हुए उसकी असली तस्वीर देखनी चाहिए।   यह कविता केवल शब्दों का विन्यास नहीं, यह एक तपस्वी जीवन की गाथा है, उन माँ-बाप की, जिन्होंने अपने बच्चों के लिए हर सुख त्यागा, हर पीड़ा सहा, और हर क्षण को उनके भविष्य की नींव में बदल दिया।  यह कविता एक आह्वान है, उस सच्चे रिश्ते की ओर, जहाँ माँ-बाप केवल ज़रूरत नहीं, बल्कि जीवन की गरिमा हैं। जहाँ उनका साथ केवल सहारा नहीं, बल्कि आत्मबल का आधार है। यह कविता कोई शिकायत नहीं, कोई आरोप नहीं, यह एक संत की वाणी है, जो प्रेम और मर्यादा के साथ कहती है.... "माँ-बाप को अपनाओ, पर शर्तों के साथ नहीं।   सम्मान दो, पर दिखावे के लिए नहीं।   प्रेम दो, पर स्वार्थ के तले न...

शिक्षा से पहले सभ्यता

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शिक्षित होने से पहले सभ्य होना आवश्यक है (एक दृष्टिकोण)       आज का युग ज्ञान-विज्ञान, तकनीक और प्रगति का युग कहा जाता है। हर ओर डिग्रियों की दौड़ है, बच्चों से लेकर युवाओं तक हर कोई केवल इस प्रतिस्पर्धा में उलझा हुआ है कि कौन अधिक अंक लाता है, किसे बेहतर संस्थान से डिग्री मिलती है, कौन ऊँचे वेतन वाली नौकरी पाता है।       लेकिन इस आपाधापी में एक महत्वपूर्ण प्रश्न पीछे छूट जाता है कि क्या केवल शिक्षित होना ही पर्याप्त है, या सभ्य होना, उससे कहीं अधिक अनिवार्य है ? निःसंदेह सभ्यता, सर्वोपरि है और इसका आधार, बचपन की परिवरिश और स्कूली शिक्षा के अनुसार बनती है।      क्योंकि, हर इंसान के बचपन की प्रारंभिक शिक्षा का आधार अपने परिवार के बुजुर्गों के सानिध्य से बनना शुरू होता है जो आगे चलकर स्कूली शिक्षा प्राप्त कर, नैतिकता के पाठ के साथ वह अपनी डिग्री आदि लेकर समाज के सामने आता है। शिक्षा और सभ्यता में अंतर की सूक्ष्म रेखा      शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन नहीं है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य है, इंसान को इंसान बनाना, उसके ...

आम आदमी को ईश्वर संदेश

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  प्रार्थना और सपना – एक स्वचिंतन            रात के तीसरे पहर, जब सारा संसार निद्रा में लीन था, एक रहस्यमयी "शीतलता" मुझे जगाने लगी। नींद और जागरण के उस धुंधले क्षण में, एक दिव्य प्रकाश झलका... और उसी में प्रकट हुआ एक स्वप्न... ईश्वर का सन्देश, जो मेरी आत्मा को हमेशा के लिए झकझोर गया। "हे मानव!" एक गूंजती हुई दिव्य वाणी मेरे अंतर्मन में प्रतिध्वनित हुई.... "तू प्रतिदिन मुझसे प्रार्थना करता है,... एक ऐसे तेजस्वी बालक की याचना करता है, जो तेरे देश को गौरव की ऊँचाइयों तक ले जाए। परंतु सुन, हे मानव! मैं तो हर दिन तेरे समाज में एक 'सूर्यपुत्र' भेजता हूँ... ऐसा बालक जो ऊर्जा, संभावनाओं और दिव्य प्रतिभा से ओतप्रोत होता है... किन्तु तेरा समाज उसे बचा नहीं पाता।" मैं स्तब्ध था। वाणी पुनः गूंजी.... "हे मानव! उस बालक के लिए तेरा 'समाज' ही वह प्रथम परीक्षा है, जहाँ वह बालक असफल हो जाता है..." "शैशव काल में उसे भूख और उपेक्षा का स्वाद चखना पड़ता है..." "बाल्यकाल में उसे शिक्षा के स्थान पर अराजकता मिलती है..." "किशोर हो...

“रिटर्न गिफ्ट की परंपरा बनाम भावनाओं की गरिमा: एक आवश्यक सामाजिक विचार”

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रिटर्न गिफ्ट की चकाचौंध में दम तोड़ती सामाजिक संवेदनाएँ... उपहार या व्यापार ?" (एक आवश्यक एवम् ज्वलंत सामाजिक विचार)   परंपरा का आधुनिक विरूपण भारतीय संस्कृति में 'अतिथि' को ईश्वर का रूप माना गया है। हमारे संस्कारों में भेंट या उपहार देना 'त्याग' और 'समर्पण' का प्रतीक था। प्राचीन काल में जब कोई अतिथि घर आता था, तो विदा होते समय उसे कुछ फल, मिठाई या वस्त्र भेंट करना इस बात का प्रतीक था कि मेजबान के मन में उसके प्रति अगाध प्रेम है।  परंतु, आज के उपभोक्तावादी युग में इस सुंदर परंपरा का स्वरूप विकृत हो चुका है। 'रिटर्न गिफ्ट' (Return Gift) के नाम पर एक ऐसी व्यवस्था खड़ी कर दी गई है, जो आत्मीयता की जड़ों में मट्ठा डाल रही है। यह लेख केवल एक विचार नहीं, बल्कि उस बढ़ती हुई सामाजिक बीमारी का एक्सरे है, जो हमारे रिश्तों को भीतर से खोखला कर रही है। 1. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में  भारतीय दर्शन हमेशा से "देने" पर केंद्रित रहा है, न कि "बदले में पाने" पर। हमारे शास्त्रों में आवश्यकता से अधिक संचय न करना और 'दान' के महत्व को समझाया गया है। ...