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मानवता के भविष्य की खोज

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मानवता के भविष्य की खोज बिखरता ताना-बाना....​ वो सुनहरे धागे , जो अब कहीं खो गए से लगते  हैं... ​ किसी भी समाज का निर्माण ईंट और पत्थरों से नहीं , बल्कि इंसानी भावनाओं , विश्वास और एक - दूसरे के प्रति समर्पण से होता है । एक समय था जब हमारे मानवीय समाज के   ताने - बाने की बुनावट बेहद खूबसूरत और मजबूत हुआ करती थी । अगर हम कुछ दशक   पीछे मुड़कर देखें , तो हमें एक ऐसा समाज नजर आता है , जिसकी नींव में आधुनिकता की चकाचौंध भले ही न हो , लेकिन मानवीय संवेदनाओं की गहराई अथाह थी । ​ कल का वो समाज , जिसे हमने पीछे छोड़ दिया... तब अधिकांश  घरों में ताले नहीं होते थे , बल्कि लोगों के दिलों में एक - दूसरे  की सुरक्षा के प्रति, कर्तव्य वाली सोंच की  जगह हुआ करती थी । जीवन में आज जैसी भागदौड़ और ' गलाकाट प्रतियोगिता ' नहीं थी । सफलता का पैमाना यह नहीं था कि आपने कितने लोगों को पीछे छोड़ा , बल्कि यह था कि आपने कितने लोगों को साथ लेकर चले ।   और ...

युवा पीढ़ी और समय की पुकार

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युवा पीढ़ी के लिए, रचनात्मकता और समय की पुकार .... सोशल मीडिया के भंवर से सृजन के शिखर तक... युवा ऊर्जा और वर्तमान परिदृश्य किसी भी राष्ट्र , समाज और पूरी दुनिया का भविष्य उसकी युवा पीढ़ी की ऊर्जा , सोच और उसकी दिशा पर निर्भर करता है । युवावस्था जीवन का वह स्वर्णिम काल है , जिसमें असीम संभावनाएं , असीमित ऊर्जा और कुछ नया कर गुजरने का अद्वितीय जज्बा होता है ।   इस अवस्था में व्यक्ति जो भी बीज बोता है , उसी की फसल उसे और उसके आने वाली पीढ़ियों को काटनी पड़ती है । लेकिन आज जब हम अपने चारों ओर नजर दौड़ाते हैं , तो एक बेहद चिंताजनक तस्वीर उभर कर सामने आती है । हमारी युवा पीढ़ी , जिसके कंधों पर नए युग के निर्माण की जिम्मेदारी है , वह एक ऐसे मायाजाल में उलझ गई है , जिसका न कोई अंत है और न ही कोई सार्थक परिणाम । यह मायाजाल  है,  सोशल मीडिया और डिजिटल दुनिया का । ​ आज के दौर में युवा अपनी अनमोल ऊर्जा और बहुमूल्य समय का ...

स्वस्थ दिखने वाले वरिष्ठ नागरिकों की अनकही व्यथा

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  बुजुर्गों के प्रति समाज का दोहरा मापदंड देखने में चुस्त, दुरुस्त और स्वस्थ वरिष्ठ नागरिकों की अनकही व्यथा और सामाजिक वास्तविकता.... ​ खोखले आदर्शों और कटु यथार्थ के बीच का अंतर ​ किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बच्चों , महिलाओं और विशेषकर अपने बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है । भारतीय संस्कृति में तो सदियों से " मातृ देवो भव , पितृ देवो भव " की शिक्षा दी जाती रही है । मंचों से , भाषणों में , सरकारी विज्ञापनों में और सामाजिक चर्चाओं में अक्सर यह दावा किया जाता है कि वरिष्ठ नागरिकों को सर्वोच्च सम्मान और विशेष सुविधाएं मिलनी चाहिए ।   यह सुनने में तो  बहुत आदर्श और सुकून देने वाला जुमला   लगता है । किंतु जब हम इस आवरण को हटाकर समाज की व्यावहारिक और जमीनी सच्चाई को देखते हैं , तो एक बेहद ही विचलित करने वाली तस्वीर उभर कर सामने आती है । ​ आज के दौर में बुजुर्गों के प्रति हर क्षेत्र में  दुर्व्यवहार क...