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वर्तमान आईना झूठ बोलता है

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वर्तमान आईना झूठ बोलता है यथार्थ, माया और परछाइयों के बीच एक दार्शनिक और व्यंग्यात्मक यात्रा ​मित्रों, मनुष्य और आईने का रिश्ता सदियों पुराना है। एक समय था जब आईना केवल एक परावर्तक सतह हुआ करता था, चाहे वह शांत जल काके तालाब हो या कांसे और कांच का टुकड़ा। उसका एकमात्र धर्म था सत्य बोलना। सामने जो है, जैसा है, उसे उसी रूप में प्रस्तुत कर देना। तब आईना सीधा-सादा होता था। लेकिन आज ? आज का आईना चालाक, कूटनीतिक और एक शातिर मार्केटिंग एक्सपर्ट बन चुका है। अब वह सत्य नहीं दिखाता, बल्कि वह दिखाता है जो हम देखना चाहते हैं। थोड़ा फिल्टर, थोड़ी चमक, थोड़ी परछाईं की भीड़, और बस, सच्चाई पूरी तरह से गायब। ​"वर्तमान आईना झूठ बोलता है" केवल एक वाक्य नहीं है, बल्कि यह हमारे पूरे आधुनिक युग का सबसे कठोर यथार्थ है। सजग हुआ जब आज देख, आईने में जो प्रतिबिंब है... परछाइयों की एक भीड़ है, सत्य कहीं पर लुप्त है.... ​ये पंक्तियां एक गहरी चुभन पैदा करती हैं। आज हम इसी आईने की चालाकी पर एक लंबी, तीखी, विचारशील और हँसते-हँसाते यात्रा करेंगे। इस व्यंग्य-यात्रा में हम देखेंगे कि कैसे हमारा पूरा सामाजिक त...

गुस्सा, एकांत और बेचारा पति

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गुस्सा, एकांत और बेचारा पति:.... (एक विस्तृत पारिवारिक हास्य-व्यंग्य कथा) दार्शनिक का परिचय हमारे मोहल्ले में एक ऐसे दार्शनिक रहते थे, जिनका नाम सुनते ही लोग हंसने लगते थे, श्री हरिशंकर पंडित ‘अनुभवी’।  अब ‘अनुभवी’ नाम कैसे पड़ा, यह एक अलग कहानी है, लेकिन संक्षेप में कहें तो उन्होंने शादी के 25 साल पूरे कर लिए थे, और वह भी जीवित अवस्था में... जी हां, जीवित! क्योंकि शादी के बाद कई पुरुषों की आत्मा तो पहले ही दफन हो जाती है, लेकिन पंडित जी की आत्मा न सिर्फ जीवित थी, बल्कि वह मोहल्ले के हर नये दूल्हे को जीवन का मंत्र देने के लिए तैयार रहती थी।एक "अनुभवी आत्मा"... लोग कहते थे, “पीएचडी कर लो, आईएएस बन जाओ, योग गुरु बन जाओ, पर पंडित जी कहते थे कि असली योग्यता चाहिए तो 20 साल शादी निभाओ।” पंडित जी फिर कहते कि "जिसने शादी के दो दशक पूरे कर लिए,वो ठसक से जीवन जीता है।"  पंडित जी ने एक फिलॉसफर की तरह जीवन का एक महान सिद्धांत खोजा था, जो वे हर शादीशुदा जोड़े को मुफ्त में बांटते थे।  वह सिद्धांत था: “ पुरुष गुस्से में एकांत ढूंढता है…लेकिन स्त्री गुस्से में पति ढूंढती है ।”  प...

आनंद ही जीवन का महामंत्र

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.                                    आनंद ही जीवन का महामंत्र....      मनुष्य परमात्मा की सर्वोत्तम कृति कहलाता है, लेकिन मनुष्य स्वयं मानता है कि वह परमात्मा की सबसे बड़ी भूल है। यही भ्रम उसे जीवन में लगातार एक ही लक्ष्य की ओर धकेलता है, वो है "आनंद" ।     आनंद की परिभाषा उतनी ही उलझी हुई है जितनी गणित की किताब। हर किताब में अलग, हर शिक्षक के हिसाब से उसका उल्टा।      लेकिन दुनिया के सभी महान विचारक, ऋषि, वैज्ञानिक, बाबाजी, यूट्यूबर, रील क्रिएटर, कोच, मोटिवेशनल वकता और नुक्कड़ पर बैठा चायवाला, सभी एक ही बात पर सहमत हैं... कि “आनंद लेना चाहिए… चाहे किसी भी तरीके से लेना पड़े।”      यूँ तो आनंद प्राप्त करने के अनगिनत रास्ते हैं, किंतु संक्षेप में कुछ रास्ते,जो आम से है, उन पर प्रकाश डाल रहा हूँ। इसके अलावा बाकी आप भी बहुत से अन्य रास्तों से परिचित होंगे, जो शायद आपके घर से या आसपास से गुजरते होंगे...  1-- बिस्तर का आनंद बिस्तर पर पड़े ...

चप्पल की व्यथा, गाँव की पंचायत की अनोखी सुनवाई

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  " एक अनोखी पंचायत जहाँ इंसान नहीं, चप्पल ने दिखाया समाज को आईना"      कल रात को अचानक गांव से फोन आया कि गुड्डू भैया बहुत गंभीर समस्या है, पंचायत बैठी है। और जब हमने पूछा, "का हुआ ?"... जवाब मिला..."कुछ पूछौ ना, सुबह जल्दी तुम्हे आय का है बस ,बहुत जरूरी है"। पत्नी बोली , "का हुआ ?" हमने कहा, लगता है कि कोई मामला बड़ा गंभीर है।"        रात भर मैं सो नहीं पाया और सुबह जल्दी उठकर गांव की ओर चल दिया। गांव भी करीब आ गया, गांव के बाहर से ही गहमा गहमी का एहसास होने लगा। फिर  जैसे ही अपने गांव में प्रवेश किया, भीड़ से पूछा कि काहे की भीड़ है तो कारण बड़ा अजीब पता चला,  “ चप्पल महोदय की जनहित याचिका"         अपने बड़बक पुरवा गांव की पंचायत भवन में आज खास बैठक बुलाई गई थी। भवन के बाहर ढोल-नगाड़े बज रहे थे। अंदर मंच पर चौधरी कालूराम ताव से बैठे थे, मानो खुद मुख्य न्यायाधीश हों, जैसे ही हमें देखा, जोर से चिल्ला कर बोले, आओ आओ गुड्डू भैया, यहां बगल में बैठो और एक कुर्सी में मुझे बैठा दिया। मेरे  बगल में गांव का सचिव कल्लू, ह...

कल की कथा, आज की व्यथा

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"हँसी के पीछे छुपी सच्चाई, और व्यथा के पीछे छुपा व्यंग्य।"  (भाग प्रथम)           जीवन की राहों पर हम सभी कभी न कभी ठोकर खाते हैं, कहीं न कहीं "पिटते" हैं। बचपन से लेकर बुढ़ापे तक, घर से लेकर गली-मोहल्ले तक, मंदिर-मस्जिद से लेकर सरकारी दफ्तर तक, हर जगह किसी न किसी रूप में इंसान ठोकर खाता ही रहता है। कभी समाज से, कभी परिवार से, कभी व्यवस्था से और कभी रिश्तों से।         यह कविता "कल भी हम पिटते थे, आज भी हम पिटते हैं…" केवल हास्य नहीं है, बल्कि एक गहरा व्यंग्य है उस जिंदगी पर, जहाँ आम आदमी की पीड़ा हर युग में एक-सी बनी रही है। यह व्यथा हँसते-हँसते सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर इंसान कब तक इस "पिटाई" को सहता रहेगा और कब उसकी आवाज़ सुनी जाएगी।         रचना आपको हँसी भी दिलाएगी, सोचने पर भी विवश करेगी और जीवन की कटु सच्चाइयों से भी रूबरू कराएगी।  आइए पढ़ते हैं यह व्यंग्यात्मक काव्य.... कल की कथा,और आज की व्यथा... जब हम बचपन में छोटे थे, बिन बात के पिटते थे स्कूल कॉलेज में पढ़ते थे,फिर भी हम पिटते थे कल भी हम पिटते ...