कल की कथा, आज की व्यथा (द्वितीय भाग)
कल की कथा, आज की व्यथा (द्वितीय भाग)
कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई आँसुओं में नहीं, बल्कि मुस्कुराते हुए कहे गए व्यंग्य में छिपी होती है। यह कविता भी ऐसी ही एक व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति है, जिसमें "पिटना" केवल शारीरिक मार का प्रतीक नहीं, बल्कि उस आम आदमी की रोज़मर्रा की बेबसी, अपमान, संघर्ष और व्यवस्था से लगातार होती टकराहट का रूपक है।
बचपन की डाँट से लेकर दफ्तरों की उपेक्षा तक, रिश्तों की उलझनों से लेकर समाज और व्यवस्था की विसंगतियों तक, ज़िंदगी हर मोड़ पर हमें किसी न किसी रूप में "पीटती" रही है। समय बदला, चेहरे बदले, परिस्थितियाँ बदलीं, लेकिन आम आदमी की व्यथा आज भी वैसी ही है।
यह कविता किसी व्यक्ति, धर्म, संस्था या वर्ग पर कटाक्ष नहीं, बल्कि उन सामाजिक परिस्थितियों और व्यवस्था पर एक हल्का-फुल्का लेकिन गहरा व्यंग्य है, जहाँ संवेदनशील इंसान कभी व्यवस्था से, कभी हालात से और कभी अपनी ही उम्मीदों से हारता दिखाई देता है।
आइए, मुस्कुराते हुए इस व्यथा को महसूस करें और इस व्यंग्य में छिपे उस सच को पहचानें, जो शायद कहीं न कहीं हम सभी की अपनी कहानी है।
कविता का मूल भाव हास्य-व्यंग्य के माध्यम से आम आदमी की पीड़ा को प्रस्तुत करना है। चलिए आज फिर से उसी शैली और लय में आगे बढ़ते हुए नयी रचना....
कल भी हम पिटते थे, आज भी हम पिटते हैं..
मोबाइल जब हम लाते थे, तब नेटवर्क से पिटते थे
रीचार्ज जब करवाते थे, तो ऑफरों मे हम पिटते थे
कल भी हम पिटते थे, आज भी हम पिटते हैं..
ऑनलाइन जब आते थे, नेटवर्क से हम पिटते थे
पासवर्ड जब भूल गए, तो सिस्टम से भी पिटते थे
कल भी हम पिटते थे, आज भी हम पिटते हैं..
बिजली का बिल भरते थे, तब कतारों में पिटते थे
मीटर जब दिखलाते थे, अधिकारियों से पिटते थे
कल भी हम पिटते थे, आज भी हम पिटते हैं..
राशन लेने जाते थे, तब नियमों से हम पिटते थे
हक़ की जब बात उठाते, जवाबों से भी पिटते थे
कल भी हम पिटते थे, आज भी हम पिटते हैं..
नेताओं को तो चुनते थे, पर वादों से हम पिटते थे
सवाल जब हम करते थे, तब भाषण से भी पिटते थे
कल भी हम पिटते थे, आज भी हम पिटते हैं..
महँगाई जब बढ़ती थी, खाली जेब से हम पिटते थे
घर का बजट बनाते-बनाते, उम्मीदों से भी पिटते थे
कल भी हम पिटते थे, आज भी हम पिटते हैं..
नौकरी जब हम करते थे, बॉस की डांट से पिटते थे
ओवरटाइम भी करते थे, पर टारगेट से हम पिटते थे
कल भी हम पिटते थे, आज भी हम पिटते हैं..
बच्चों को जब समझाते तो, उनकी बातों से पिटते थे
संस्कार जब सिखलाते, तब मोबाइल से हम पिटते थे
कल भी हम पिटते थे, आज भी हम पिटते हैं..
सोशल मीडिया पर जब आए, तो ट्रोलों से हम पिटते थे
सच लिखने की कोशिश की, तो अंधों से भी पिटते थे
कल भी हम पिटते थे, आज भी हम पिटते हैं..
पड़ोसी से निभाते निभाते, हम अफ़वाहों से पिटते थे
अपनों पर विश्वास किया पर, गलतफ़हमी से पिटते थे
कल भी हम पिटते थे, आज भी हम पिटते हैं..
चुनावों में जाते थे जब हम , उम्मीदों से पिटते थे
सरकारें जब जब बदली, तब हालातों से पिटते थे
कल भी हम पिटते थे, आज भी हम पिटते हैं..
सच का जब साथ दिया, तो झूठों से हम पिटते थे
चुप रहना सीख लिया जब, तब मन से हम पिटते थे
कल भी हम पिटते थे, आज भी हम पिटते हैं..
ईमानदारी अपनाई तो , बेईमानों से हम पिटते थे
समझौता जब न करते, तो दुनियादारी से पिटते थे
कल भी हम पिटते थे, आज भी हम पिटते हैं..
समय बदलता जाता है, किस्से लेकिन वही रहे
चेहरे तो नए नए मिले, दर्द मगर सब वही रहे।
कल भी हम पिटते थे, आज भी हम पिटते हैं...
कल भी हिम्मत हारे न थे, आज भी हम हंसते हैं,
हर ठोकर को गीत बनाकर, जीवन को आगे रचते हैं।
पिटते पिटते जीते थे, और जीते जीते पिटते थे...
चाहे कल भी हम पिटते थे....
लेकिन फिर भी हम जीते थे...
हर हाल में अब हम जीतेंगे...
आज भी हम जीतेंगे,
फिर कल भी हम जीतेंगे...
अब हम ही हम जीतेंगे...
हर बार हम जीतेंगे...
बार बार हम जीतेंगे...
रचना - मनोज भट्ट, कानपुर
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