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मुखौटों का बाजार

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                  मुखौटों का बाजार इंसानी समाज में मुखौटों का बाजार  हम सब बाजार जाते हैं, दुकानों पर सामान देखते हैं, पर एक बाजार ऐसा भी है जो दिखता नहीं, पर हर गली, हर मोहल्ले, हर ऑफिस, हर सोशल मीडिया की स्क्रीन पर लगा हुआ है। वह है, इंसान द्वारा पहने गए "मुखौटों का बाजार" और यह बाजार दिन पर दिन महंगा होता जा रहा है। यहां तक कि आज के पूरे विश्व में सबसे बड़ा बाजार यदि किसी चीज का गर्म है, तो वह है "मुखौटों का बाजार"। विभिन्न प्रकार के मुखौटे और उनकी कीमत आज समाज में लगभग हर इंसान तरह तरह के मुखौटे लगाए हुए है। लोगो की असलियत को जो मुखौटा सफलता पूर्वक सबसे ज्यादा और दीर्घकालिक छुपा देता है, उसकी कीमत सबसे अधिक होती है। कुछ मुखौटे ज्यादा दिन तक असलियत नहीं ढक पाते हैं, स्वाभाविक रूप से उसकी कीमत कम होगी। एक मुखौटा पारदर्शी होता है, जिसकी कीमत नकारात्मक में चली जाती है। ऐसे मुखौटे पहले ही दिन से इंसान की असलियत को ढक पाने में असमर्थ होते हैं। इसका अर्थ ये है कि जो इंसान अपनी असलियत को छुपाने के लिए जितना अच्छा मुखौटा लगायेगा, समाज में उसक...

गांव का सच और हमारी सोच, पगडंडी से चौपाल तक

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गांव का सच और हमारी सोच  पगडंडी से चौपाल तक,  शोर में दबा हुआ सच गांव की पगडंडी पर जब हम चलते हैं, तो पैर के नीचे सिर्फ मिट्टी नहीं होती, बल्कि पूरी एक कहानी होती है, कई पीढ़ियों का एक इतिहास होता है। यह वही मिट्टी है जिसने हमें चलना सिखाया, जिसने हमारे दादा-परदादा को अन्न दिया। यह खेत, यह बगिया, यह पोखरा, यह बरगद के नीचे की चौपाल, यह सब हमारी पहचान है। शहर में लोग एड्रेस से पहचाने जाते हैं, गांव में लोग मिट्टी से पहचाने जाते हैं। दरअसल इसी मिट्टी के नीचे में हमारी जड़ें हैं। पर आज जब उसी पगडंडी पर चलते हुए मैं लोगों की आंखों में देखता हूं, तो एक अजीब सा बोझ दिखता है। चेहरे पर झुर्रियां तो पहले भी थीं, पर अब उन झुर्रियों में चिंता ज्यादा है। आंखों में थकान ज्यादा है। लोग हंसते तो हैं, पर वह हंसी खुलकर नहीं निकलती। लगता है जैसे भीतर कुछ घुट रहा है। आज का समय बड़ा अजीब है। अब गांव में भी चारों तरफ शोर है। सुबह-सुबह मंदिर में लाउडस्पीकर पर भजन, दोपहर में टीवी पर नेता लोगन की बहस, शाम को मोबाइल में टिक-टिक नोटिफिकेशन, और बाजार में सब्जी वाले की चिल्लाहट। इतना शोर है कि आ...

"गरीब और अमीर", दुनिया में दो ही जाति और धर्म

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"गरीब और अमीर",  दुनिया में दो ही जाति और धर्म.... आज की दुनिया में बस, दो ही जाति और धरम ! नए नजरिए से देखिए, तो दूर हो जाएगा भरम  !! अपना परंपरागत रूढ़िवादी चश्मा उतार कर फेंक दीजिए और नए सिरे से, नए नजरिए का साफ चश्मा पहन कर अपने अगल बगल से लेकर दुनिया भर को देखिए तो आपको मेरी उपरोक्त दो पंक्तियों का संदेश स्पष्ट दिखने लगेगा। यदि अभी भी कुछ धुंधला दिख रहा है, तो पूरा लेख अवश्य पढ़ें... दरअसल दुनिया भर का मानव समाज अनगिनत जातियों, धर्म, भाषाओं और रंगबिरंगी संस्कृतियों से भरा हुआ हैं। लोग अलग-अलग देशों में रहते हैं, अलग-अलग रीति-रिवाजों को मानते हैं। लेकिन अगर हम गहराई से देखें तो सच्चाई यह है कि मानव समाज वास्तव में सिर्फ दो हिस्सों में बंटा हुआ है, गरीब और अमीर। यह विभाजन न किसी देश की सीमा से जुड़ा है, न किसी रंग या भाषा से। यह वह रेखा है जो हर इंसान के जीवन को सबसे गहरे स्तर पर छूती है। यह लेख इसी सच्चाई को सरल शब्दों में समझाने की कोशिश करता है। हम देखेंगे कि यह फर्क क्या है, यह कैसे पैदा होता है, इसका असर क्या है और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न ये है कि इसे कैसे मिटाया जा ...

मानवता के भविष्य की खोज

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मानवता के भविष्य की खोज बिखरता ताना-बाना....​ वो सुनहरे धागे , जो अब कहीं खो गए से लगते  हैं... ​ किसी भी समाज का निर्माण ईंट और पत्थरों से नहीं , बल्कि इंसानी भावनाओं , विश्वास और एक - दूसरे के प्रति समर्पण से होता है । एक समय था जब हमारे मानवीय समाज के   ताने - बाने की बुनावट बेहद खूबसूरत और मजबूत हुआ करती थी । अगर हम कुछ दशक   पीछे मुड़कर देखें , तो हमें एक ऐसा समाज नजर आता है , जिसकी नींव में आधुनिकता की चकाचौंध भले ही न हो , लेकिन मानवीय संवेदनाओं की गहराई अथाह थी । ​ कल का वो समाज , जिसे हमने पीछे छोड़ दिया... तब अधिकांश  घरों में ताले नहीं होते थे , बल्कि लोगों के दिलों में एक - दूसरे  की सुरक्षा के प्रति, कर्तव्य वाली सोंच की  जगह हुआ करती थी । जीवन में आज जैसी भागदौड़ और ' गलाकाट प्रतियोगिता ' नहीं थी । सफलता का पैमाना यह नहीं था कि आपने कितने लोगों को पीछे छोड़ा , बल्कि यह था कि आपने कितने लोगों को साथ लेकर चले ।   और ...