बिखरते एकल परिवार
बिखरते एकल परिवार .... इस वृहद् आलेख में न केवल सामाजिक ताने-बाने के बिखरने के मनोवैज्ञानिक, नीतिगत और वैश्विक कारणों का गहरा विश्लेषण है, बल्कि इसमें आने वाली पीढ़ी को एक सुदृढ़ व्यवस्था देने के लिए व्यावहारिक (समाधानों की एक मुकम्मल रूपरेखा भी प्रस्तुत की गई है। सामाजिक ताने-बाने के समक्ष वैचारिक विसंगतियाँ यह लेख समाज, परिवार, शिक्षा और नीतिगत मसलों पर गहराई से सोचने के लिए एक वैचारिक दस्तावेज़ के रूप में, वैश्विक चुनौतियाँ और नीतिगत समाधान आपके सामने है । १ आधुनिकता की वेदी पर होम होते रिश्ते मानव सभ्यता के इतिहास में 'परिवार' केवल व्यक्तियों का एक समूह मात्र नहीं रहा है, बल्कि यह वह पहली पाठशाला है जहाँ मनुष्य सामाजिक जीव बनना सीखता है। भारतीय मनीषा ने तो संपूर्ण विश्व को ही एक परिवार मानकर 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का उद्घोष किया था। इस विचार की धुरी, हमारा वह पारंपरिक 'संयुक्त परिवार' (Joint Family) था, जिसने सदियों तक हमारे सामाजिक ताने-बाने को एक अटूट मजबूती प्रदान की। संयुक्त परिवार केवल एक आर्थिक या रहने की व्यवस्था नहीं थ...