रुपया कमाना सरल, खर्च करना कठिन

रुपया कमाना सरल, खर्च करना कठिन

यह एक वैचारिक इलस्ट्रेशन है जो 'रुपया कमाना सरल किंतु खर्च करना कठिन' विषय को दर्शाता है। चित्र में एक ओर पैसे कमाने की सरलता को, बीच में व्यक्ति को अपनी जरूरतों (बचत) और इच्छाओं (दिखावे) के बीच संतुलन बनाते हुए, और दूसरी ओर सही वित्तीय निर्णयों से समृद्ध भविष्य के सुखद रास्ते तथा गलत खर्चों से कर्ज और परेशानियों के जाल को दर्शाया गया है।









बुद्धिमानी से खर्च, वित्तीय अनुशासन का मार्ग

यह वाक्य सुनने में उलटा लगता है। हर कोई कहता है कि पैसा कमाना सबसे कठिन काम है। क्योंकि लोग सुबह से शाम तक पसीना बहाते हैं, तब जाकर दो पैसे हाथ में आते हैं। फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि कमाना सरल है और खर्च करना कठिन है। 

पर जीवन को गहराई से देखने पर यह बात बिल्कुल सच निकलती है कि पैसा कमाने का रास्ता सीधा है, मेहनत करो, समय दो, हुनर दिखाओ और बदले में पैसा लो। इसमें नियम साफ हैं। पर पैसा हाथ में आने के बाद जो शुरू होता है, वही असली परीक्षा है क्योंकि खर्च करने के लिए कोई नियम की किताब नहीं है, इसलिय वहाँ आपका मन ही, आपका सबसे बड़ा शत्रु और सबसे बड़ा मित्र बन जाता है।

इस बात से सभी भली भांति परिचित हैं कि धन संपत्ति को संभालना, आग को संभालने जैसा है। अगर संभाल लिया तो घर में उजाला होगा, भोजन पकेगा, सर्दी में गरमी मिलेगी। लेकिन अगर उसे बुद्धिमत्ता से नहीं संभाला और खुला छोड़ दिया तो वही धन की आग सब कुछ जला कर राख कर देगी।

कमाई की सरलता और खर्च की कठिनाई

वैसे तो पैसा कमाना एक बंधी हुई दिनचर्या है। किसान खेत में जाता है, बीज बोता है, फसल काटता है और अनाज बेचता है। नौकरी करने वाला समय पर कार्यालय जाता है और महीने के अंत में वेतन पाता है। दुकानदार दुकान खोलता है, ग्राहक आते हैं और लाभ होता है। इसमें परिश्रम लगता है, पर भ्रम नहीं है।

लेकिन खर्च करना भ्रम का बाजार है। आज का बाजार बहुत चतुर हो गया है। वह आपकी जेब से पैसा निकालने के लिए आपके मन के साथ खेल खेलता है। बड़ी बड़ी तस्वीरें, लुभावने वादे, त्योहारों पर छूट का शोर, उस पर भी अपने साथ वालों की चमक दमक वाली तस्वीरें जब देखो, तब जेब से धन निकलने से रोकना अपने लिए बहुत मुश्किल हो जाता है।

और ये सब मिलकर आपके मन में एक कमी का भाव पैदा करते हैं। लगता है कि सबके पास सब कुछ है, लेकिन मेरे पास ही कुछ भी नहीं है। और इसी कमी की सोंच को पूरा करने के लिए हम वह सब भी खरीद लेते हैं जिसकी हमें कभी कोई जरूरत ही नहीं थी।

"खर्च करना" से मतलब सिर्फ अंधाधुंध खर्च करना ही नहीं है और खर्च करना कठिन इसलिए नहीं है कि हाथ से पैसा निकालना भारी लगता है। कठिन इसलिए है कि उस समय मन को समझाना पड़ता है कि क्या जरूरी है और क्या केवल मन की लहर है।

जरूरत और इच्छा में अंतर

समझदार इंसान वही होता है जो जीवन की पहली सीढ़ी पर सफलतापूर्वक कदम जमा कर भविष्य की ऊंचाइयों की ओर बढ़ चलता है। उसके लिए सबसे पहले उसे अपनी जरूरत और अपनी इच्छा में फर्क करना सीखना होता है। उसे समझना ही होगा कि कोई वस्तु, उसकी जरूरत है या उस वस्तु को पाने की सिर्फ इच्छा है।

"जरूरत" वह है जिसके बिना जीवन चल नहीं सकता। जैसे पेट के लिए भोजन, तन के लिए कपड़ा, रहने के लिए छोटा सा घर, बच्चों के लिए पढ़ाई, परिवार के लिए दवा और बुढ़ापे के लिए थोड़ी सुरक्षा।

जबकि"इच्छा" वह है जिसके बिना भी जीवन चल जाता है, लेकिन मन कहता है कि अगर हो तो और भी अच्छा लगेगा। जैसे नया मोबाइल फोन, चमकदार महंगे ब्रांडेड कपड़े, बड़ी गाड़ी, महंगे भोजनालय में खाना, दिखावे की वस्तुएँ।

और तब दुख वहीं से शुरू होता है जब हम उस इच्छा को जरूरत समझने लगते हैं। हमें लगने लगता है कि बिना इस वस्तु के हमारी इज्जत कम हो जाएगी। लोग हमें गरीब समझेंगे। यही सोच धीरे धीरे हमें कर्ज की खाई में धकेल देती है। और जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं को पहचान कर उन पर लगाम लगाना सीख गया, वही असल में धनी है।

दिखावे की दौड़ और खोखला समाज

सच पूछो तो आज कल दिखावे ने भयंकर बीमारी का रूप ले लिया है। हर आदमी एक दूसरे से आगे निकलना चाहता है और उसके लिए वह अनजाने में ही गला काट प्रतियोगिता में शामिल हो जाता है। और जिसके पास चकाचौंध से भरी बेमतलब की कोई चीज नहीं होती है, वह भी उधार लेकर अमीर दिखना चाहता है।

आम शादियों में भी भोजन की बर्बादी, जन्मदिन पर महंगे उपहारों की होड़, त्योहारो पर अपनी हैसियत की चादर से बाहर जाकर खरीददारी। ये सब समृद्धि के नहीं, बल्कि डर के लक्षण हैं। हमें डर है कि समाज हमें स्वीकार नहीं करेगा। हमें कमजोर समझेगा।

इस दौड़ में आदमी बाहर से चमकदार दिखता है, पर भीतर से खाली हो जाता है। रात को नींद नहीं आती, घर में झगड़े बढ़ते हैं, मन में चिंता बनी रहती है। जबकि सच्ची इज्जत महंगी वस्तुओं से नहीं आती, सच्ची इज्जत इस बात से आती है कि आदमी कितनी शांति से, कितनी योजना से अपना जीवन जी रहा है। जो अपनी चादर देखकर पैर पसारता है, वही सुखी रहता है।

आय व्यय की योजना ही असली स्वतंत्रता है

बिना योजना के जीवन वैसा ही है जैसे बिना पतवार की नाव। हवा जिधर ले जाए, नाव उधर ही बहती जाएगी और आखिर में किसी चट्टान से टकरा कर टूट जाएगी। आय व्यय की योजना बनाना कंजूसी नहीं है, बल्कि यह अपने पैसे को उचित रास्ता दिखाना है। पैसे खर्च करने की योजना बनाने के कुछ नियम हैं, जैसे...

पहला नियम - पहले बचत, फिर खर्च

अधिकतर लोग पहले खर्च करते हैं और सोचते हैं कि जो बचेगा, वह बचा लेंगे। पर बचता कभी कुछ नहीं। समझदार लोग पहले बचाते हैं। जैसे ही हाथ में पैसा आए, उसका एक हिस्सा अलग रख दो। जैसे अनाज में से बीज अलग रखा जाता है, वैसे ही आय में से भविष्य का बीज अलग रखो। जो आँख से दूर हो जाता है, वह खर्च भी नहीं होता।

दूसरा नियम - आय को तीन भागों में बाँटो

अपनी पूरी आय को मन में तीन हिस्सों में बाँट लो। एक बड़ा हिस्सा घर की जरूरी जरूरतों के लिए। जैसे घर का किराया, अनाज, पानी, बिजली, बच्चों की पढ़ाई, आने जाने का खर्च आदि। दूसरा हिस्सा मन की खुशी के लिए। कभी बाहर घूमना, कोई शौक पूरा करना, मित्रों के साथ समय बिताना। इसमें अपराध का भाव मत रखो। जीवन केवल बचत के लिए नहीं है। तीसरा हिस्सा, जो सबसे पवित्र है, वह भविष्य के लिए। यह हिस्सा हर हाल में बचाना है, चाहे कुछ भी हो जाए।

तीसरा नियम - ठहर कर खरीदो

जब भी कोई महंगी और गैर जरूरी चीज मन को बहुत लुभाए, तो तुरंत मत खरीदो। दो दिन रुक जाओ। फिर अपने आप से पूछो, क्या इसके बिना मेरा काम रुक जाएगा। क्या दो दिन बाद भी मुझे इसकी इतनी ही चाह रहेगी। अधिकतर बार उत्तर नहीं में आता है। मन की लहर बहुत देर तक नहीं टिकती। ठहरने से लहर शांत हो जाती है और बुद्धि लौट आती है। यह छोटा सा नियम लाखों रुपये बचा सकता है।

चौथा नियम - बुरे समय के लिए गठरी बाँध कर रखो

जीवन एक सा नहीं रहता। कभी धूप है, कभी छाया। कभी बीमारी आती है, कभी काम छूट जाता है, कभी घर में अचानक कोई बड़ी जरूरत आ जाती है। उस समय किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े, इसके लिए पहले से तैयारी चाहिए। कम से कम अपने कुछ महीनों के खर्चे के बराबर जितना धन ऐसी जगह रखो जहाँ से जरूरत पर तुरंत निकाला जा सके। यह धन नहीं, यह आपकी नींद है, यह आपके परिवार की मुस्कान है, आत्मबल है।

युवाओं के लिए विशेष बात

आज के समय में नौजवानों के लिए पैसा उधार लेना बहुत आसान हो गया है। हर जगह से आवाज आती है, अभी ले लो, बाद में चुका देना। छोटी छोटी किस्तों में बड़ी चीजें मिल रही हैं। सुनने में यह बहुत मीठा लगता है। पर यह मीठा जहर है। 

जब आप किस्तों पर कोई ऐसी चीज लेते हैं जिसकी आपको सख्त जरूरत नहीं, तो आप उस चीज की कीमत से कहीं ज्यादा चुकाते हैं। आप अपनी आने वाली कमाई को आज ही बेच देते हैं। आप भविष्य को आज की दिखावे की खातिर गिरवी रख देते हैं।

उधार के धन से खरीदी गई वस्तु का सुख बहुत कम समय रहता है, पर उसका बोझ बहुत लंबा चलता है। हर महीने किस्त चुकाने की चिंता आपके मन की स्वतंत्रता छीन लेती है।

युवा साथियों को कुछ बातें गांठ बाँध लेनी चाहिए। 

पहली बात, हमेशा ध्यान रखें कि उधार का धन अपना धन नहीं होता है। वह एक जिम्मेदारी है, जिस पर भारी ब्याज देना पड़ता है। उसका उपयोग केवल बहुत जरूरी कामों के लिए करो और समय पर लौटा दो। क्योंकि वह 
एक बोझ है।

दूसरी बात, ऐसी चीजों पर पैसा लगाओ जिनकी कीमत समय के साथ बढ़ती है। अपने हुनर पर, अपनी सेहत पर, अच्छी किताबों पर, अच्छे अनुभवों पर। गाड़ी घिसती है, कपड़ा पुराना होता है, यंत्र पुराने हो जाते हैं। पर विद्या, स्वास्थ्य और अच्छे संस्कार कभी पुराने नहीं होते, वे रोज बढ़ते हैं।

तीसरी बात, समय की ताकत को समझो। जवानी में बचाया गया छोटा सा धन भी बुढ़ापे में विशाल पेड़ बन जाता है। जैसे छोटा सा बीज समय पाकर बड़ा बरगद बन जाता है, वैसे ही नियमित बचत भी। जो बात आज छोटी लगती है, वही कल पहाड़ बनकर आपकी रक्षा करती है। इसके लिए मंत्र की तरह एक वाक्य हमेशा अमल करो कि,"छोटी बचत, लंबी बचत", जो भविष्य में परिवार के लिए एक मजबूत धरातल बनेगा।

सही खर्च क्या है

कंजूसी और कम खर्च में बहुत अंतर है। किसी हीन भावना से बचने के लिए यहां दोनों शब्दों के मतलब समझना बहुत जरूरी है कि कंजूस वह है, जो जरूरत पर भी पैसा नहीं निकालता। वह खुद भी दुखी रहता है और परिवार को भी दुखी रखता है। जबकि कम खर्च करने वाला वह है जो मूल्य को समझता है। 

और गलत खर्च वह है जो केवल थोड़ी देर की खुशी दे, फिर लंबा पछतावा दे। जो दिखावे के लिए किया जाए। और जिसके कारण अक्सर उधार लेना पड़े। वहीं सही खर्च वह है जो जीवन को बेहतर बनाए। बच्चों की अच्छी पढ़ाई पर खर्च, घर में सात्विक भोजन पर खर्च, परिवार की सेहत पर खर्च, माता पिता की सेवा पर खर्च, अपने घर को सुरक्षित बनाने पर खर्च। 

और सबसे सुंदर खर्च वह है जो किसी और के चेहरे पर मुस्कान लाए। जैसे किसी जरूरतमंद की मदद, किसी भूखे को भोजन। ऐसा खर्च कभी खाली नहीं जाता, वह मन को आत्मिक शांति देता है।

दो जीवन शैली की कहानी

एक ही गली में दो व्यक्ति रहते थे। एक खूब कमाता था। हाथ में पैसा आते ही बाजार भागता। नया यंत्र, नया वाहन, हर सप्ताह बाहर खाना। घर भरा हुआ लगता, पर तिजोरी खाली रहती। महीने के अंत में वह अगले महीने का इंतजार करता। बाहर से धनी दिखता, भीतर से चिंता से घिरा रहता।

दूसरा कम कमाता था। पर वह हिसाब किताब से चलता था। हर महीने नियमित थोड़ा बचाता, सादा जीवन जीता और जरूरत पर ही खर्च करता। उसके पास दिखावे के लिए कुछ न था, पर मन में शांति थी। क्योंकि उसने अपने परिवार के लिए आर्थिक सुरक्षा की मजबूत गठरी बाँध रखी थी।

बरसों बाद जब दोनों उम्र की ढलान पर आपस में मिले, तो पहला व्यक्ति थका हुआ था, कर्ज में डूबा था, उसे बुढ़ापे का डर सता रहा था। जबकि दूसरा व्यक्ति निश्चिंत था, उसके चेहरे में आत्मबल था। उसके पास कमाया हुआ धन तो था ही, साथ में संतोष भी था। वह अपने बच्चों के साथ बिना डर के जीवन जी रहा था। क्योंकि यह अंतर कमाई का नहीं था, अंतर खर्च करने की समझ का था।

अंत में एक ही सार

पैसा कमाना परिश्रम है, पर पैसा खर्च करना विवेक है। परिश्रम से हाथ में पैसा आता है और विवेक से जीवन में सुख आता है। धन की तीन ही गति होती है। 
  • पहली, सही जगह खर्च होकर वह धर्म बनता है
  • दूसरी, बचकर वह भविष्य की सुरक्षा बनता है।
  • तीसरी, गलत जगह खर्च होकर वह दुख बन जाता है।                                                
इसलिए अगली बार जब हाथ में पैसा आए और मन कुछ खरीदने को ललचाए, तो पल भर रुक जाना। आँख बंद करके अपने आप से तीन प्रश्न पूछना। 
  1. क्या यह सच में जरूरी है। 
  2. क्या यह मेरे परिवार की शांति बढ़ाएगा। 
  3. क्या यह मेरे आने वाले कल को सुरक्षित करेगा।
यदि उत्तर हाँ में है, तो निसंकोच खर्च करो। तब वही लक्ष्मी जी का सही सम्मान भी है। और यदि उत्तर नहीं में है, तो मुस्कुरा कर उस इच्छा को जाने दो।

जो अपने पैसों को खर्च करने का स्वामी बन गया, समझो वह अपने सफल जीवन का स्वामी बन गया। वित्तीय अनुशासन कोई बंधन नहीं है। यह वह छोटी सी कीमत है जो हम आज चुकाते हैं ताकि कल हम स्वतंत्रता, शांति, मजबूती और आनंद से जी सकें।

लेखक - मनोज कुमार भट्ट, कानपुर 
--------------------------------------------------------
ब्लॉग वेबसाइट: www.samajiktanabana.in
ईमेल: manojbhatt@samajiktanabana.in

"सामाजिक ताना-बाना" हम और आप ही हैं। मेरे इन विचारों पर आपकी क्या राय है ? कृपया अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर साझा करें। यदि यह लेख आपको सार्थक लगा हो, तो इसे अपनों के साथ साझा करना न भूलें।धन्यवाद। 🙏

टिप्पणियाँ