घर से संवाद...(लड़कियों की किशोरावस्था--भाग-3)
घर से संवाद...चुप्पी तोड़ने की हिम्मत (लड़कियों की किशोरावस्था--भाग-3) चुप्पी तोड़ने की हिम्मत अपने ही आँगन में अनकही रह जाने वाली बातें परिवार के सभी सदस्यों के लिए घर वह जगह होनी चाहिए जहाँ मन बिना डर के खुल सके, जहाँ सवालों को अपराध न माना जाए, जहाँ गलती करने पर संबंध टूटते नहीं बल्कि समझ बढ़ती है। लेकिन विडंबना ये है कि किशोरावस्था में अक्सर ऐसा होता है कि जिस घर को सबसे सुरक्षित जगह होना चाहिए, वहीं अपनी बात कहने में सबसे अधिक झिझक महसूस होने लगती है। एक किशोरी दिन भर स्कूल, दोस्तों, सोशल मीडिया और समाज के बीच अपनी पहचान सँभालती है, पर जब घर लौटती है तो कई बार अपने ही भावनाओं को छुपा लेती है। वह सोचती है, "मम्मी-पापा समझेंगे नहीं।" "कहूँगी तो डाँट पड़ेगी।" या "मेरी बात को हल्के में ले लिया जाएगा।" धीरे-धीरे यही सोच चुप्पी में बदल जाती है और यह चुप्पी केवल शब्दों की ही नहीं होती बल्कि यह आत्मविश्वास, भरोसे और रिश्तों की भी चुप्पी होती है। यह लेख उसी चुप्पी को समझने, उसकी जड़ों को पहचानने और संवाद की ओर साहसिक कदम बढ़ाने की प्रक्रिया पर केंद्रित है। ...