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शांति का मार्ग: एक नए युग की शुरुआत अपने घर से

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शांति का मार्ग (घर से विश्व तक एक नए युग की शुरुआत.... एक आह्वान) अशांति के युग में शांति की पुकार हम इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में खड़े हैं। एक ओर विज्ञान चाँद पर घर बसाने की योजना बना रहा है, दूसरी ओर मनुष्य का मन सबसे अधिक बेचैन है। विश्व संस्था की दो हजार पच्चीस की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में हर चालीस सेकंड में एक व्यक्ति अपना जीवन समाप्त कर लेता है। हर दिन चार हजार चार सौ से अधिक लोग हिंसा में मारे जाते हैं। सत्तानवे करोड़ लोग मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं। भारत में अपराध आंकड़ा विभाग के आंकड़े कहते हैं कि दो हजार चौबीस में एक लाख पैंतीस हजार घरेलू हिंसा के मामले दर्ज हुए। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में पंद्रह प्रतिशत से अधिक युवा चिंता और अवसाद के शिकार हैं। तकनीक ने दूरियों को मिटाया, पर दिलों में दीवारें खड़ी कर दीं। संचार माध्यमों ने आवाज़ दी, पर सुनने का धैर्य छीन लिया। होड़ ने तरक्की दी, पर चैन छीन लिया। ऐसे में सवाल उठता है: क्या शांति केवल बड़ी-बड़ी बैठकों का विषय है ? क्या सरकारें और कानून ही शांति ला सकते हैं ?  जवाब है - नहीं।  शांति की पहली ईंट आपक...