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"दिमाग की आंखें खोलना: पूर्वाग्रहों से मुक्त सोच की ओर

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"दिमाग की आंखें खोलना" : पूर्वाग्रहों से मुक्त-सोच की ओर ... दिमाग की आंखें खोलना, केवल एक रूपक नहीं बल्कि आज के समय की पुकार है।  " मन की आंखें खोल रे भैया", यह पुकार आज के भारत की ही नहीं समूचे संसार की सबसे आवश्यक चेतावनी बन चुकी है। इसी गंभीर विषय पर आधारित  एक विवेकशील यात्रा...। आज के दौर में जब सूचना के महासागर की बाढ़ में, सच्चाई पूरी तरह डूब रही हो और "तथाकथित" पढ़ा लिखा वर्ग भी, भ्रम तथा पूर्वाग्रहों का शिकार बन रहा हो, तब केवल शारीरिक आंखें खोलना पर्याप्त नहीं होता। बल्कि हमें दिमाग की आंखें खोलनी होंगी अर्थात विवेक तर्कशक्ति और आत्मनिरीक्षण के माध्यम से हर बात को देखना, समझना और परखना होगा।  यह कोई साधारण रूपक नहीं है बल्कि आज के युग की सबसे गहरी पुकार है, जो हमें भ्रम के अंधकार से बाहर निकालकर सच्चाई की ओर ले जा सकती है। जिस सच्चाई को अपनी इस रचना में उजागर किया है वह आज हर देश हर समाज और हर व्यक्ति के लिए प्रासंगिक है, क्योंकि सूचना का यह महासागर अब किसी एक राष्ट्र तक सीमित नहीं रहा है। सूचना युग में भ्रम की परतें आज पूरा विश्व सूचना के एक अथ...