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मुखौटों का बाजार

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                  मुखौटों का बाजार इंसानी समाज में मुखौटों का बाजार  हम सब बाजार जाते हैं, दुकानों पर सामान देखते हैं, पर एक बाजार ऐसा भी है जो दिखता नहीं, पर हर गली, हर मोहल्ले, हर ऑफिस, हर सोशल मीडिया की स्क्रीन पर लगा हुआ है। वह है, इंसान द्वारा पहने गए "मुखौटों का बाजार" और यह बाजार दिन पर दिन महंगा होता जा रहा है। यहां तक कि आज के पूरे विश्व में सबसे बड़ा बाजार यदि किसी चीज का गर्म है, तो वह है "मुखौटों का बाजार"। विभिन्न प्रकार के मुखौटे और उनकी कीमत आज समाज में लगभग हर इंसान तरह तरह के मुखौटे लगाए हुए है। लोगो की असलियत को जो मुखौटा सफलता पूर्वक सबसे ज्यादा और दीर्घकालिक छुपा देता है, उसकी कीमत सबसे अधिक होती है। कुछ मुखौटे ज्यादा दिन तक असलियत नहीं ढक पाते हैं, स्वाभाविक रूप से उसकी कीमत कम होगी। एक मुखौटा पारदर्शी होता है, जिसकी कीमत नकारात्मक में चली जाती है। ऐसे मुखौटे पहले ही दिन से इंसान की असलियत को ढक पाने में असमर्थ होते हैं। इसका अर्थ ये है कि जो इंसान अपनी असलियत को छुपाने के लिए जितना अच्छा मुखौटा लगायेगा, समाज में उसक...

मानवता के भविष्य की खोज

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मानवता के भविष्य की खोज बिखरता ताना-बाना....​ वो सुनहरे धागे , जो अब कहीं खो गए से लगते  हैं... ​ किसी भी समाज का निर्माण ईंट और पत्थरों से नहीं , बल्कि इंसानी भावनाओं , विश्वास और एक - दूसरे के प्रति समर्पण से होता है । एक समय था जब हमारे मानवीय समाज के   ताने - बाने की बुनावट बेहद खूबसूरत और मजबूत हुआ करती थी । अगर हम कुछ दशक   पीछे मुड़कर देखें , तो हमें एक ऐसा समाज नजर आता है , जिसकी नींव में आधुनिकता की चकाचौंध भले ही न हो , लेकिन मानवीय संवेदनाओं की गहराई अथाह थी । ​ कल का वो समाज , जिसे हमने पीछे छोड़ दिया... तब अधिकांश  घरों में ताले नहीं होते थे , बल्कि लोगों के दिलों में एक - दूसरे  की सुरक्षा के प्रति, कर्तव्य वाली सोंच की  जगह हुआ करती थी । जीवन में आज जैसी भागदौड़ और ' गलाकाट प्रतियोगिता ' नहीं थी । सफलता का पैमाना यह नहीं था कि आपने कितने लोगों को पीछे छोड़ा , बल्कि यह था कि आपने कितने लोगों को साथ लेकर चले ।   और ...

रुपया कमाना सरल, खर्च करना कठिन

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रुपया कमाना सरल, खर्च करना कठिन बुद्धिमानी से खर्च, वित्तीय अनुशासन का मार्ग यह वाक्य सुनने में उलटा लगता है। हर कोई कहता है कि पैसा कमाना सबसे कठिन काम है। क्योंकि लोग सुबह से शाम तक पसीना बहाते हैं, तब जाकर दो पैसे हाथ में आते हैं। फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि कमाना सरल है और खर्च करना कठिन है।  पर जीवन को गहराई से देखने पर यह बात बिल्कुल सच निकलती है कि पैसा कमाने का रास्ता सीधा है, मेहनत करो, समय दो, हुनर दिखाओ और बदले में पैसा लो। इसमें नियम साफ हैं। पर पैसा हाथ में आने के बाद जो शुरू होता है, वही असली परीक्षा है क्योंकि खर्च करने के लिए कोई नियम की किताब नहीं है, इसलिय वहाँ आपका मन ही, आपका सबसे बड़ा शत्रु और सबसे बड़ा मित्र बन जाता है। इस बात से सभी भली भांति परिचित हैं कि धन संपत्ति को संभालना, आग को संभालने जैसा है। अगर संभाल लिया तो घर में उजाला होगा, भोजन पकेगा, सर्दी में गरमी मिलेगी। लेकिन अगर उसे बुद्धिमत्ता से नहीं संभाला और खुला छोड़ दिया तो वही धन की आग सब कुछ जला कर राख कर देगी।

कल की कथा, आज की व्यथा (द्वितीय भाग)

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कल की कथा, आज की व्यथा  (द्वितीय भाग) कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई आँसुओं में नहीं, बल्कि मुस्कुराते हुए कहे गए व्यंग्य में छिपी होती है।  यह कविता भी ऐसी ही एक व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति है, जिसमें "पिटना" केवल शारीरिक मार का प्रतीक नहीं, बल्कि उस आम आदमी की रोज़मर्रा की बेबसी, अपमान, संघर्ष और व्यवस्था से लगातार होती टकराहट का रूपक है। बचपन की डाँट से लेकर दफ्तरों की उपेक्षा तक, रिश्तों की उलझनों से लेकर समाज और व्यवस्था की विसंगतियों तक, ज़िंदगी हर मोड़ पर हमें किसी न किसी रूप में "पीटती" रही है। समय बदला, चेहरे बदले, परिस्थितियाँ बदलीं, लेकिन आम आदमी की व्यथा आज भी वैसी ही है। यह कविता किसी व्यक्ति, धर्म, संस्था या वर्ग पर कटाक्ष नहीं, बल्कि उन सामाजिक परिस्थितियों और व्यवस्था पर एक हल्का-फुल्का लेकिन गहरा व्यंग्य है, जहाँ संवेदनशील इंसान कभी व्यवस्था से, कभी हालात से और कभी अपनी ही उम्मीदों से हारता दिखाई देता है। आइए, मुस्कुराते हुए इस व्यथा को महसूस करें और इस व्यंग्य में छिपे उस सच को पहचानें, जो शायद कहीं न कहीं हम सभी की अपनी कहानी है। कविता का मूल भाव हा...

स्वस्थ दिखने वाले वरिष्ठ नागरिकों की अनकही व्यथा

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  बुजुर्गों के प्रति समाज का दोहरा मापदंड देखने में चुस्त, दुरुस्त और स्वस्थ वरिष्ठ नागरिकों की अनकही व्यथा और सामाजिक वास्तविकता.... ​ खोखले आदर्शों और कटु यथार्थ के बीच का अंतर ​ किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बच्चों , महिलाओं और विशेषकर अपने बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है । भारतीय संस्कृति में तो सदियों से " मातृ देवो भव , पितृ देवो भव " की शिक्षा दी जाती रही है । मंचों से , भाषणों में , सरकारी विज्ञापनों में और सामाजिक चर्चाओं में अक्सर यह दावा किया जाता है कि वरिष्ठ नागरिकों को सर्वोच्च सम्मान और विशेष सुविधाएं मिलनी चाहिए ।   यह सुनने में तो  बहुत आदर्श और सुकून देने वाला जुमला   लगता है । किंतु जब हम इस आवरण को हटाकर समाज की व्यावहारिक और जमीनी सच्चाई को देखते हैं , तो एक बेहद ही विचलित करने वाली तस्वीर उभर कर सामने आती है । ​ आज के दौर में बुजुर्गों के प्रति हर क्षेत्र में  दुर्व्यवहार क...