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वर्तमान आईना झूठ बोलता है

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वर्तमान आईना झूठ बोलता है यथार्थ, माया और परछाइयों के बीच एक दार्शनिक और व्यंग्यात्मक यात्रा ​मित्रों, मनुष्य और आईने का रिश्ता सदियों पुराना है। एक समय था जब आईना केवल एक परावर्तक सतह हुआ करता था, चाहे वह शांत जल काके तालाब हो या कांसे और कांच का टुकड़ा। उसका एकमात्र धर्म था सत्य बोलना। सामने जो है, जैसा है, उसे उसी रूप में प्रस्तुत कर देना। तब आईना सीधा-सादा होता था। लेकिन आज ? आज का आईना चालाक, कूटनीतिक और एक शातिर मार्केटिंग एक्सपर्ट बन चुका है। अब वह सत्य नहीं दिखाता, बल्कि वह दिखाता है जो हम देखना चाहते हैं। थोड़ा फिल्टर, थोड़ी चमक, थोड़ी परछाईं की भीड़, और बस, सच्चाई पूरी तरह से गायब। ​"वर्तमान आईना झूठ बोलता है" केवल एक वाक्य नहीं है, बल्कि यह हमारे पूरे आधुनिक युग का सबसे कठोर यथार्थ है। सजग हुआ जब आज देख, आईने में जो प्रतिबिंब है... परछाइयों की एक भीड़ है, सत्य कहीं पर लुप्त है.... ​ये पंक्तियां एक गहरी चुभन पैदा करती हैं। आज हम इसी आईने की चालाकी पर एक लंबी, तीखी, विचारशील और हँसते-हँसाते यात्रा करेंगे। इस व्यंग्य-यात्रा में हम देखेंगे कि कैसे हमारा पूरा सामाजिक त...

युवा पीढ़ी और समय की पुकार

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युवा पीढ़ी के लिए, रचनात्मकता और समय की पुकार .... सोशल मीडिया के भंवर से सृजन के शिखर तक... युवा ऊर्जा और वर्तमान परिदृश्य किसी भी राष्ट्र , समाज और पूरी दुनिया का भविष्य उसकी युवा पीढ़ी की ऊर्जा , सोच और उसकी दिशा पर निर्भर करता है । युवावस्था जीवन का वह स्वर्णिम काल है , जिसमें असीम संभावनाएं , असीमित ऊर्जा और कुछ नया कर गुजरने का अद्वितीय जज्बा होता है ।   इस अवस्था में व्यक्ति जो भी बीज बोता है , उसी की फसल उसे और उसके आने वाली पीढ़ियों को काटनी पड़ती है । लेकिन आज जब हम अपने चारों ओर नजर दौड़ाते हैं , तो एक बेहद चिंताजनक तस्वीर उभर कर सामने आती है । हमारी युवा पीढ़ी , जिसके कंधों पर नए युग के निर्माण की जिम्मेदारी है , वह एक ऐसे मायाजाल में उलझ गई है , जिसका न कोई अंत है और न ही कोई सार्थक परिणाम । यह मायाजाल  है,  सोशल मीडिया और डिजिटल दुनिया का । ​ आज के दौर में युवा अपनी अनमोल ऊर्जा और बहुमूल्य समय का ...

स्वस्थ दिखने वाले वरिष्ठ नागरिकों की अनकही व्यथा

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  बुजुर्गों के प्रति समाज का दोहरा मापदंड देखने में चुस्त, दुरुस्त और स्वस्थ वरिष्ठ नागरिकों की अनकही व्यथा और सामाजिक वास्तविकता.... ​ खोखले आदर्शों और कटु यथार्थ के बीच का अंतर ​ किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बच्चों , महिलाओं और विशेषकर अपने बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है । भारतीय संस्कृति में तो सदियों से " मातृ देवो भव , पितृ देवो भव " की शिक्षा दी जाती रही है । मंचों से , भाषणों में , सरकारी विज्ञापनों में और सामाजिक चर्चाओं में अक्सर यह दावा किया जाता है कि वरिष्ठ नागरिकों को सर्वोच्च सम्मान और विशेष सुविधाएं मिलनी चाहिए ।   यह सुनने में तो  बहुत आदर्श और सुकून देने वाला जुमला   लगता है । किंतु जब हम इस आवरण को हटाकर समाज की व्यावहारिक और जमीनी सच्चाई को देखते हैं , तो एक बेहद ही विचलित करने वाली तस्वीर उभर कर सामने आती है । ​ आज के दौर में बुजुर्गों के प्रति हर क्षेत्र में  दुर्व्यवहार क...