स्वस्थ दिखने वाले वरिष्ठ नागरिकों की अनकही व्यथा

एक व्यस्त कानपुर रेलवे स्टेशन का दृश्य, जहाँ युवाओं का व्यवहार कमजोर बुजुर्गों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण और स्वस्थ बुजुर्गों के प्रति उपेक्षापूर्ण है। इसमें हिंदी शीर्षक "बुजुर्गों के प्रति समाज का दोहरा मापदंड" और लेखक "मनोज भट्ट, कानपुर" का नाम है।


 


बुजुर्गों के प्रति समाज का दोहरा मापदंड

देखने में चुस्त, दुरुस्त और स्वस्थ वरिष्ठ नागरिकों की अनकही व्यथा और सामाजिक वास्तविकता....

खोखले आदर्शों और कटु यथार्थ के बीच का अंतर

किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बच्चों, महिलाओं और विशेषकर अपने बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है भारतीय संस्कृति में तो सदियों से "मातृ देवो भव, पितृ देवो भव" की शिक्षा दी जाती रही है मंचों से, भाषणों में, सरकारी विज्ञापनों में और सामाजिक चर्चाओं में अक्सर यह दावा किया जाता है कि वरिष्ठ नागरिकों को सर्वोच्च सम्मान और विशेष सुविधाएं मिलनी चाहिए 

यह सुनने में तो बहुत आदर्श और सुकून देने वाला जुमला लगता है किंतु जब हम इस आवरण को हटाकर समाज की व्यावहारिक और जमीनी सच्चाई को देखते हैं, तो एक बेहद ही विचलित करने वाली तस्वीर उभर कर सामने आती है

आज के दौर में बुजुर्गों के प्रति हर क्षेत्र में दुर्व्यवहार कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस दुर्व्यवहार ने अब एक नया और बेहद अजीबोगरीब रूप ले लिया है आमतौर पर माना जाता है और सच भी है कि जो बुजुर्ग शारीरिक रूप से कमजोर हैं, बीमार हैं, उन्हें समाज में उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है 

लेकिन आज की सबसे बड़ी और कड़वी सच्चाई यह है कि दुर्व्यवहार का शिकार वे बुजुर्ग ज्यादा हो रहे हैं जो देखने मे स्वस्थ हैं, जो अपने पैरों पर चलते-फिरते हैं और जो अपना काम स्वयं करने में सक्षम हैं यह एक ऐसी सामाजिक विडंबना है जिस पर शायद ही कहीं कभी कोई बात की जाती है, लेकिन यह कटु तथ्य, हमारे समाज के दोहरे मापदंडों की पोल खोलकर रख देती है

स्वार्थ की पराकाष्ठा: 'अपने माता-पिता' बनाम 'समाज के बुजुर्ग'

समाज के इस दोहरे रवैये को समझने के लिए हमें आज की युवा पीढ़ी और बच्चों की मानसिकता को गहराई से समझना होगा आज का हर युवा, हर बच्चा यह चाहता है कि उसके अपने माता-पिता हमेशा स्वस्थ रहें, चलते-फिरते रहें और अपना हर काम खुद करें 

इसके पीछे माता-पिता के प्रति उनका प्रेम तो होता ही है, किन्तु प्रेम से ज्यादा एक छिपा हुआ स्वार्थ भी होता है, ताकि बच्चों को आज के व्यस्तता के दौर में उनकी सेवा में अपना समय और ऊर्जा लगानी पड़े वे चाहते हैं कि उनके माता-पिता उन पर किसी भी प्रकार का शारीरिक या आर्थिक बोझ बनें

लेकिन, यहाँ सबसे बड़ा विरोधाभास पैदा होता है जब यही युवा समाज में, सार्वजनिक स्थानों पर, बैंक में, अस्पताल में या किसी सरकारी कार्यालय में किसी ऐसे बुजुर्ग को देखते हैं जो शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ और चुस्त-दुरुस्त है, तो उनका व्यवहार पूरी तरह से बदल जाता है उनके मन में उस स्वस्थ बुजुर्ग के प्रति सम्मान के बजाय एक अजीब सी चिढ़ दिखती है वे यह भूल जाते हैं कि यह व्यक्ति भी उसी उम्र के पड़ाव पर है जिस पर उनके अपने माता-पिता हैं 

ऐसा प्रतीत होता है कि समाज ने यह तय कर लिया है कि "बुजुर्ग" होने का मतलब केवल और केवल खाट पर पड़ा होना या लाठी के सहारे रेंगना है अगर कोई 60 या 70 साल का व्यक्ति सीधा तनकर चल रहा है, तो समाज उसे बुजुर्ग मानने से ही इनकार कर देता है

सहानुभूति बनाम सम्मान: दया की शर्त पर आदर

हमें यह समझना होगा कि समाज में 'सम्मान' (Respect) और 'सहानुभूति' (Sympathy) के बीच के अंतर की समझ ही मिटती जा रही है आज का समाज बुजुर्गों को "सम्मान" नहीं देता, बल्कि वह उन पर "दया" करता है और दया हमेशा उसी पर की जाती है जो असहाय हो, जो कमजोर हो और जो दयनीय स्थिति में हो

​एक दृश्य की कल्पना कीजिए, एक जीर्ण-शीर्ण, कांपता हुआ, शारीरिक रूप से अत्यंत कमजोर बुजुर्ग किसी लाइन में आता है, तो लोग तरस खाकर उसे आगे कर देते हैं इसे वे अपनी महानता और नैतिकता मान लेते हैं 

लेकिन जब उसी लाइन में एक 65 वर्षीय व्यक्ति आता है, जिसने अपने जीवन भर के अनुशासन, योग और खान-पान से खुद को स्वस्थ रखा है, तो समाज उसे उसकी उम्र का वाजिब सम्मान देने से कतराता है लोग सोचते हैं, "ये तो हट्टे-कट्टे हैं, ये क्यों लाइन में आगे जाना चाहते हैं ? ये क्यों वरिष्ठ नागरिक होने का फायदा उठाना चाहते हैं ?"

यह दृष्टिकोण इस बात का प्रमाण है कि हम, उम्र और अनुभव का सम्मान नहीं कर रहे हैं, बल्कि हम केवल लाचारी पर तरस खा रहे हैं एक स्वस्थ बुजुर्ग ने अपनी फिटनेस से समाज पर कोई एहसान नहीं किया है, बल्कि उसने अपने जीवन के अमूल्य वर्ष इस देश और समाज को दिए हैं उसके बाल धूप में सफेद नहीं हुए हैं उसका अनुभव, उसकी आयु उसे इस बात का अधिकारी बनाती है कि उसके साथ गरिमापूर्ण व्यवहार किया जाए, चाहे वह शारीरिक रूप से कितना भी सक्षम क्यों हो

क्या बदल दी जाए बुजुर्गों की परिभाषा ? (एक वैचारिक चुनौती)

जैसा कि आपने देखा और समझा, उसके पश्चात्, एक अत्यंत प्रासंगिक प्रश्न उठता है कि, "यदि समाज का नजरिया यही है, तो क्या हमें बुजुर्गों की परिभाषा ही नहीं बदल देनी चाहिए ?

वर्तमान में 60 वर्ष की आयु पूरी कर चुके व्यक्ति को 'वरिष्ठ नागरिक' (Senior Citizen) का दर्जा दिया जाता है यह दर्जा उसकी आयु, उसके द्वारा समाज को दिए गए योगदान और जीवन के उस पड़ाव के आधार पर दिया जाता है जहाँ व्यक्ति की शारीरिक कोशिकाएं ढलने लगती हैं, चाहे वह बाहर से कितना भी फिट क्यों दिखे

लेकिन अगर "समाज" का रवैया ऐसा ही रहना है कि वे केवल असहायों को ही विशेष सुविधा और सम्मान देंगे, तो फिर आयु सीमा का यह मानदंड पूरी तरह से बेमानी हो जाता है क्यों सरकार यह नियम बना दे कि 60, 70 या 80 साल का कोई महत्व नहीं है।

ये आज की कटु सच्चाई है कि एक 60 साल का "असहाय" व्यक्ति जब समाज के सामने आता है तो उसे थोड़ी बहुत सहानुभूति मिल जाती है, लेकिन एक 60 साल का "चुस्त-दुरुस्त" व्यक्ति जब अपने अधिकारों की बात करता है तो उसे दुर्व्यवहार, तानों और उपेक्षा का सामना करना पड़ता है 

इसलिए अब से होना ये चाहिए कि कोई "वरिष्ठ नागरिक" की श्रेणी नहीं होगी, जो व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से असहाय होगा, सिर्फ उसी के लिए एक नई श्रेणी होगी, और उसे "विशेष नागरिक" माना जाएगा। यह विचार सुनने में अजीब, अटपटा सा व्यंग्यात्मक लग सकता है, लेकिन यह समाज के चेहरे पर एक करारा तमाचा होगा।

यह भेदभाव करने वाला समाज कौन होता है। आखिर इस भेदभाव का जिम्मेदार कौन है ? वरिष्ठ नागरिक को जो, सरकारी नीतिगत स्तर पर सुविधाएं और अधिकार प्राप्त हैं, वे उसे समाज के हर क्षेत्र से स्वाभाविक, आधिकारिक और व्यावहारिक रूप से मिलना ही चाहिए। समाज को यह तय करने और समझने का कोई अधिकार नहीं है कि वरिष्ठ नागरिक होने की पहली शर्त 'बीमार और कमजोर होनाहै ?

समाज के हर आयु वर्ग को ये सार्वभौमिक तथ्य समझना ही होगा कि सामने जिस धरातल पर "वरिष्ठ नागरिक" खड़ा है, उसी धरातल पर एक दिन उसके अपने प्रियजन या स्वयं उसे भी खड़ा होना है। यदि अभी नहीं चेते, तो फिर वह धरातल, तमाम तरह के काँटो भरा हो जाएगा।

सार्वजनिक स्थानों और सरकारी तंत्र का संवेदनहीन रवैया

यह भेदभाव केवल सड़कों या गली-मोहल्लों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सबसे भद्दा रूप सरकारी विभागों, बैंकों, रेलवे स्टेशनों और अस्पतालों में देखने को मिलता है

  • बैंक और कार्यालय की लाइनों में.... जब कोई स्वस्थ बुजुर्ग बैंक की लाइन में वरिष्ठ नागरिक काउंटर पर जाता है, तो अक्सर पीछे खड़े युवा, यहाँ तक कि काउंटर के कर्मचारी भी व्यंग्य कस देते है. "अरे अंकल जी, आप तो बिल्कुल जवान लग रहे हैं, आप "आम लाइन" में क्यों नहीं लग जाते ?" यह वाक्य भले ही मजाक में कहा गया हो, लेकिन यह उस बुजुर्ग के स्वाभिमान को गहरी ठेस पहुँचाता है
  • सार्वजनिक परिवहन (Public Transport)....  बसों या मेट्रो में जब कोई स्वस्थ बुजुर्ग अपनी आरक्षित सीट पर बैठता है या किसी युवा को उठने के लिए कहता है, तो युवा वर्ग अत्यंत असंतोष और चिढ़ के साथ प्रतिक्रिया देता है उनका बॉडी लैंग्वेज यह चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा होता है कि "ये तो बिल्कुल ठीक हैं, फिर भी इन्हें सीट चाहिए"
  • सरकारी नीतियां और उनका क्रियान्वयन.... सरकारी स्तर पर वरिष्ठ नागरिकों के लिए नियम तो बना दिए जाते हैं, लेकिन उन नियमों का पालन करवाने वाले अधिकारी और कर्मचारी भी उसी समाज का हिस्सा हैं उनका रवैया भी अक्सर "स्वस्थ बुजुर्गों" के प्रति टालमटोल वाला होता है

एक चुस्त-दुरुस्त बुजुर्ग बाहर से भले ही मजबूत दिखे, लेकिन 60-65 की उम्र के बाद शरीर के अंदरूनी अंग, हड्डियां और मानसिक सहनशक्ति पहले जैसी नहीं रहती उन्हें भी खड़े रहने में थकान होती है, उन्हें भी रक्तचाप या मधुमेह जैसी छिपी हुई बीमारियां हो सकती हैं क्या समाज यह चाहता है कि वे अपनी मेडिकल रिपोर्ट गले में लटका कर घूमें ताकि लोग उन पर विश्वास कर सकें ?

मनोवैज्ञानिक विश्लेषण: समाज की इस 'चिढ़' का असली कारण....

आखिर स्वस्थ बुजुर्गों से समाज, खासकर युवाओं को इतनी चिढ़ क्यों है ? इसके पीछे गहरा मनोवैज्ञानिक कारण है। जिसे समझना अत्यन्त आवश्यक है...

  1. अधिकार बोध पर प्रहार: आज की युवा पीढ़ी अत्यंत आत्मकेंद्रित (Self-centered) हो चुकी है उन्हें लगता है कि सार्वजनिक संसाधनों (जैसे सीट, लाइन में जगह) पर पहला अधिकार उनका है जब कोई कमजोर व्यक्ति आता है, तो वे अपना 'अधिकार' दान कर देते हैं, जिससे उनके अहंकार (Ego) को संतुष्टि मिलती है कि उन्होंने कोई महान कार्य किया है लेकिन जब एक स्वस्थ बुजुर्ग अधिकारपूर्वक अपनी जगह मांगता है, तो युवा को लगता है कि कोई उनके अधिकारों का हनन कर रहा है यहाँ अहंकार को चोट पहुँचती है, जो चिढ़ में बदल जाती है
  2. प्रतिस्पर्धा का भ्रम: जब एक बुजुर्ग स्वस्थ और चुस्त होता है, तो युवा अवचेतन मन में उसे एक प्रतिस्पर्धी (Competitor) के रूप में देखने लगते हैं उन्हें लगता है कि यह व्यक्ति तो हमारे जितना ही मजबूत है, फिर इसे 'विशेष छूट' (Privilege) क्यों दी जाए ?
  3. समय की कमी और धैर्य का अभाव: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में किसी के पास समय नहीं है सबको हर काम जल्दी करना है युवाओं को लगता है कि स्वस्थ बुजुर्गों को सुविधाएं देने से उनके खुद के काम में देरी होगी

नैतिकता का पतन और मूल्यों का क्षरण

यह कटु सच्चाई है कि हमने अपने बच्चों को मशीनें बनाना तो सिखा दिया, लेकिन इंसान बनाना भूल गए शिक्षा प्रणाली और पारिवारिक परिवेश में कहीं कहीं बहुत बड़ी चूक हुई है हमने बच्चों को यह तो सिखाया कि "कमजोर की मदद करो," लेकिन हमने सिर्फ उन्हें यह बताया है कि "बड़ों का सम्मान करो, चाहे वे किसी भी स्थिति में हों।" लेकिन यह "सिखाया" नहीं है। 

सम्मान (Respect) एक बिना शर्त वाली भावना होती है और होनी भी चाहिए इसलिए जब हम किसी बुजुर्ग को देखे, तो हमारे मन में पहला विचार उनकी शारीरिक स्थिति का नहीं, बल्कि उनके द्वारा जिए गए जीवन के अनुभव का आना चाहिए उन्होंने इस समाज को बनाने में अपना योगदान दिया है उन्होंने कर (Tax) चुकाए हैं, उन्होंने परिवारों को पाला है, उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था में अपना जीवन खपाया है उनके प्रति हमारा सम्मान उनके बुढ़ापे का इनाम है, कोई खैरात नहीं

किंतु, आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमने नैतिकता को पीछे छोड़ दिया है हम पश्चिमी संस्कृति की अंधाधुंध नकल तो कर रहे हैं, जहाँ 'स्पेस' और 'प्राइवेसी' महत्वपूर्ण है, लेकिन हम अपने उन संस्कारों को भूल गए हैं जहाँ घर के या पड़ोस के किसी भी बुजुर्ग को देखते ही हाथ जुड़ जाते थे

जीर्ण-शीर्ण बुजुर्गों के प्रति हमारा नैतिक दायित्व

इस लेख का यह अर्थ कतई नहीं है कि जो बुजुर्ग शारीरिक रूप से अक्षम हैं या असहाय हैं, उनके प्रति समाज का ध्यान कम होना चाहिए बिल्कुल नहीं

जो बुजुर्ग लाठी के सहारे चलते हैं, जिन्हें दिखाई या सुनाई कम देता है, जो अल्जाइमर जैसी बीमारियों से पीड़ित हैं, उन्हें निश्चित रूप से अतिरिक्त देखभाल, अत्यधिक सहयोग और प्राथमिकता मिलनी चाहिए

उनके लिए समाज का व्यवहार केवल सम्मानजनक बल्कि रक्षक (Protective) की तरह होना चाहिए जब वे किसी सार्वजनिक स्थान पर हों, तो बिना उनके मांगे समाज को उनकी सहायता के लिए आगे आना चाहिए

लेकिन यहाँ मुद्दा तुलना का नहीं है मुद्दा यह है कि एक का अधिकार दूसरे का अपमान नहीं बन सकता असहाय बुजुर्गों की मदद करना हमारा मानवीय कर्तव्य है, और स्वस्थ बुजुर्गों का सम्मान करना हमारा नैतिक और सामाजिक दायित्व है

समाधान की दिशा: एक नई सोच की आवश्यकता

इस गंभीर और उपेक्षित समस्या का समाधान केवल कानून या सरकारी नियमों से नहीं हो सकता इसके लिए सामाजिक चेतना और मानसिकता में बुनियादी बदलाव की जरूरत है। जिसे समझना चाहिए...

  1. पारिवारिक स्तर पर शिक्षा: माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों को यह सिखाएं कि सम्मान केवल शारीरिक कमजोरी देखकर नहीं दिया जाता बड़ों का आदर इसलिए करना है क्योंकि वे बड़े हैं बच्चों को यह समझना होगा कि जो बुजुर्ग आज स्वस्थ होकर अपना काम खुद कर रहे हैं, वे वास्तव में समाज के लिए एक प्रेरणा हैं, कि कोई बोझ या अवांछित व्यक्ति
  2. स्कूल और पाठ्यक्रम में बदलाव: नैतिक शिक्षा (Moral Education) को केवल कहानियों तक सीमित नहीं रखना चाहिए उसमें व्यावहारिक जीवन की स्थितियों (Case Studies) को शामिल किया जाना चाहिए कि सार्वजनिक स्थानों पर वरिष्ठ नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार किया जाए
  3. 'स्वस्थ वृद्धावस्था' (Healthy Ageing) का जश्न मनाना: समाज को यह सीखना होगा कि अगर कोई बुजुर्ग 65 या 70 की उम्र में भी जॉगिंग कर रहा है, खुद बैंक का काम कर रहा है, या अपनी कार चला रहा है, तो उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए उनसे चिढ़ने के बजाय उनसे यह सीखना चाहिए कि उन्होंने खुद को इतना फिट कैसे रखा उन्हें समाज के लिए एक 'आदर्श' माना जाना चाहिए
  4. सरकारी तंत्र का संवेदीकरण (Sensitization): सरकारी कर्मचारियों, बैंक कर्मियों और सार्वजनिक परिवहन के कर्मचारियों को विशेष ट्रेनिंग दी जानी चाहिए कि वे वरिष्ठ नागरिकों के साथ, चाहे वे कितने भी स्वस्थ क्यों दिखें, अत्यंत गरिमा और सम्मान के साथ व्यवहार करें उनके अधिकारों पर व्यंग्य करना या उन्हें आम नागरिक की तरह ट्रीट करना एक प्रकार का मानसिक उत्पीड़न है
  5. स्वयं बुजुर्गों का सशक्तिकरण: जो बुजुर्ग स्वस्थ हैं, उन्हें भी अपने अधिकारों के प्रति मुखर होना पड़ेगा यदि कोई उन्हें उनके स्वस्थ होने का ताना देकर उनका अधिकार छीनने की कोशिश करता है, तो उन्हें चुप रहने या शर्मिंदा होने के बजाय विनम्रता से लेकिन दृढ़ता के साथ अपना पक्ष रखना चाहिए उन्हें यह बताना चाहिए कि "मैं स्वस्थ हूँ, यह मेरी मेहनत है, लेकिन मैं 65 वर्ष का हूँ, यह मेरा अनुभव है, और सम्मान मेरा अधिकार है"

​अंत में निष्कर्ष: एक कटु सच्चाई जिसे स्वीकारना ही होगा

अंत में, यह बात पूरी तरह से सत्य और अकाट्य है कि वर्तमान समाज में वरिष्ठ नागरिकों के प्रति व्यवहार ठीक नहीं है चाहे वह सरकारी विभाग हो, बैंक की कोई लाइन हो, बस की सीट हो या फिर गली-मोहल्ले का चौक, हर जगह यह अदृश्य भेदभाव साफ दिखाई देता है

हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जो हिप्पोक्रेसी (पाखंड) से भरा हुआ है हम अपने घर में एक स्वस्थ और आत्मनिर्भर बुजुर्ग चाहते हैं ताकि हमें उनकी सेवा में अपना सुख त्यागना पड़े, लेकिन हम समाज में स्वस्थ बुजुर्गों को देखकर मुंह बनाते हैं क्योंकि हम उन्हें उनका अधिकार नहीं देना चाहते

जब तक हम यह नहीं समझेंगे कि 'वरिष्ठ नागरिक' होने का अर्थ केवल बीमारी का प्रमाण पत्र होना नहीं है, तब तक हम एक सभ्य समाज कहलाने के लायक नहीं हैं आयु सीमा हटाकर शारीरिक स्थिति के मानदंड स्थापित करने का विचार भले ही व्यंग्य हो, लेकिन यह समाज की उस सड़ी हुई मानसिकता पर एक बहुत बड़ा तमाचा है जो केवल लाचारी को ही सम्मान के लायक मानती है

वक्त गया है कि समाज अपनी इस संकीर्ण मानसिकता से बाहर निकले जो असहाय हैं, उन्हें प्रेम और सहायता दें, लेकिन जो स्वस्थ और चुस्त-दुरुस्त बुजुर्ग हैं, उनके प्रति भी नैतिकता के आधार पर सच्चा सम्मान प्रदर्शित करें 

आखिर, युवावस्था स्थायी नहीं है जो आज युवा है और किसी स्वस्थ बुजुर्ग से चिढ़ रहा है, कल वह भी उसी उम्र के पड़ाव पर होगा यदि आज वह इस दोहरे मापदंड को नहीं तोड़ेगा, तो कल यही समाज उसके स्वस्थ होने पर उससे भी वैसा ही दुर्व्यवहार करेगा

बुजुर्ग समाज की जड़ें होते हैं यदि जड़ें मजबूत और स्वस्थ हैं, तो पेड़ को उन पर गर्व होना चाहिए, कि उन्हें बोझ समझकर उन पर चिढ़ना चाहिए यह सच्चाई कड़वी जरूर है, लेकिन हर व्यक्ति, हर युवा और हर व्यवस्था को इसे समझना और स्वीकारना ही होगा।

लेखक - मनोज भट्ट, कानपुर "सामाजिक ताना-बाना"

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ब्लॉग वेबसाइट: www.samajiktanabana.in ईमेल: manojbhatt@samajiktanabana.in

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