स्वस्थ दिखने वाले वरिष्ठ नागरिकों की अनकही व्यथा
बुजुर्गों के प्रति समाज का दोहरा मापदंड देखने में चुस्त, दुरुस्त और स्वस्थ वरिष्ठ नागरिकों की अनकही व्यथा और सामाजिक वास्तविकता.... खोखले आदर्शों और कटु यथार्थ के बीच का अंतर किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बच्चों , महिलाओं और विशेषकर अपने बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है । भारतीय संस्कृति में तो सदियों से " मातृ देवो भव , पितृ देवो भव " की शिक्षा दी जाती रही है । मंचों से , भाषणों में , सरकारी विज्ञापनों में और सामाजिक चर्चाओं में अक्सर यह दावा किया जाता है कि वरिष्ठ नागरिकों को सर्वोच्च सम्मान और विशेष सुविधाएं मिलनी चाहिए । यह सुनने में तो बहुत आदर्श और सुकून देने वाला जुमला लगता है । किंतु जब हम इस आवरण को हटाकर समाज की व्यावहारिक और जमीनी सच्चाई को देखते हैं , तो एक बेहद ही विचलित करने वाली तस्वीर उभर कर सामने आती है । आज के दौर में बुजुर्गों के प्रति हर क्षेत्र में दुर्व्यवहार क...