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स्वस्थ दिखने वाले वरिष्ठ नागरिकों की अनकही व्यथा

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  बुजुर्गों के प्रति समाज का दोहरा मापदंड देखने में चुस्त, दुरुस्त और स्वस्थ वरिष्ठ नागरिकों की अनकही व्यथा और सामाजिक वास्तविकता.... ​ खोखले आदर्शों और कटु यथार्थ के बीच का अंतर ​ किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बच्चों , महिलाओं और विशेषकर अपने बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है । भारतीय संस्कृति में तो सदियों से " मातृ देवो भव , पितृ देवो भव " की शिक्षा दी जाती रही है । मंचों से , भाषणों में , सरकारी विज्ञापनों में और सामाजिक चर्चाओं में अक्सर यह दावा किया जाता है कि वरिष्ठ नागरिकों को सर्वोच्च सम्मान और विशेष सुविधाएं मिलनी चाहिए ।   यह सुनने में तो  बहुत आदर्श और सुकून देने वाला जुमला   लगता है । किंतु जब हम इस आवरण को हटाकर समाज की व्यावहारिक और जमीनी सच्चाई को देखते हैं , तो एक बेहद ही विचलित करने वाली तस्वीर उभर कर सामने आती है । ​ आज के दौर में बुजुर्गों के प्रति हर क्षेत्र में  दुर्व्यवहार क...

शिक्षा बनाम अंधविश्वास... एक वैचारिक युद्ध

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आधुनिक युग में शिक्षा , विज्ञान और अंधविश्वास का द्वंद्व... ​ उजाले में पसरता अंधेरा ​ मानव सभ्यता के इतिहास का यदि सूक्ष्म अवलोकन किया जाए , तो यह स्पष्ट होता है कि आदिम काल से लेकर आज के इक्कीसवीं सदी के इस दौर तक , मनुष्य ने वैचारिक और भौतिक रूप से एक लंबी दूरी तय की है । कभी पत्थरों को आपस में रगड़कर आग जलाने वाला इंसान आज अंतरिक्ष की गहराइयों को नाप रहा है , कृत्रिम बुद्धिमत्ता ( आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ) के सहारे भविष्य की रूपरेखा तैयार कर रहा है , और सूक्ष्म से सूक्ष्म जीवाणुओं की संरचना को समझकर असाध्य रोगों पर विजय प्राप्त कर रहा है ।  शिक्षा का प्रसार समाज के उस अंतिम छोर तक पहुँच चुका है जिसे कभी मुख्यधारा से पूरी तरह अलग मान लिया गया था । चाहे वह सुदूर गाँवों के प्राथमिक विद्यालय हों या महानगरों के तकनीकी संस्थान , ज्ञान की गंगा हर दिशा में बह रही है । ​ परंतु , इस चमकते हुए तकनीकी और शैक्षिक परिदृश्य के समानांतर एक ऐसा स...