शिक्षा बनाम अंधविश्वास... एक वैचारिक युद्ध

शिक्षा बनाम अंधविश्वास" के वैचारिक युद्ध को दर्शाता एक रंगीन पोस्टर, जिसमें खुली किताबों से निकलती विज्ञान की रोशनी अंधविश्वास और काले जादू के अंधेरे को दूर भगा रही है। नीचे लेखक का नाम "मनोज भट्ट, कानपुर" अंकित है।



आधुनिक युग में शिक्षा, विज्ञान और अंधविश्वास का द्वंद्व...

उजाले में पसरता अंधेरा

मानव सभ्यता के इतिहास का यदि सूक्ष्म अवलोकन किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि आदिम काल से लेकर आज के इक्कीसवीं सदी के इस दौर तक, मनुष्य ने वैचारिक और भौतिक रूप से एक लंबी दूरी तय की हैकभी पत्थरों को आपस में रगड़कर आग जलाने वाला इंसान आज अंतरिक्ष की गहराइयों को नाप रहा है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के सहारे भविष्य की रूपरेखा तैयार कर रहा है, और सूक्ष्म से सूक्ष्म जीवाणुओं की संरचना को समझकर असाध्य रोगों पर विजय प्राप्त कर रहा है। 

शिक्षा का प्रसार समाज के उस अंतिम छोर तक पहुँच चुका है जिसे कभी मुख्यधारा से पूरी तरह अलग मान लिया गया थाचाहे वह सुदूर गाँवों के प्राथमिक विद्यालय हों या महानगरों के तकनीकी संस्थान, ज्ञान की गंगा हर दिशा में बह रही है

परंतु, इस चमकते हुए तकनीकी और शैक्षिक परिदृश्य के समानांतर एक ऐसा स्याह सच भी मौजूद है जो हमें भीतर तक झकझोर देता हैवह सच है, अंधविश्वास का बढ़ता दायरायह अत्यंत विस्मयकारी और विरोधाभासी स्थिति है कि जिस युग को 'विज्ञान और तर्क का युग' कहा जाना चाहिए, उसी युग में समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी चमत्कारों, तंत्र-मंत्र, काले जादू, टोटकों और अलौकिक शक्तियों के दावों के जाल में बुरी तरह फंसा हुआ है

सबसे अधिक चिंताजनक पहलू यह है कि इस मानसिक दासता का शिकार केवल अशिक्षित या समाज का पिछड़ा वर्ग ही नहीं हो रहा है, बल्कि देश और दुनिया की वह आधुनिक, पढ़ी-लिखी युवा पीढ़ी भी इसकी चपेट में रही है जो कंप्यूटर, कोडिंग, और उन्नत विज्ञान की भाषा समझती है। 

विज्ञान की प्रयोगशालाओं से निकलकर युवा जब जीवन के व्यावहारिक धरातल पर कदम रखते हैं, तो वे अक्सर किसी किसी तथाकथित चमत्कार या भ्रामक आस्था के सामने नतमस्तक दिखाई देते हैंयह विडंबना केवल समाज के 'सामाजिक ताने-बाने' को छिन्न-भिन्न कर रही है, बल्कि उस भविष्य को भी संकट में डाल रही है जिसके कंधों पर एक स्वस्थ और विवेकशील राष्ट्र के निर्माण का दारोमदार है

. शिक्षा और वैज्ञानिक समझ के बीच की गहरी खाई

हम अक्सर यह मान लेते हैं कि जो व्यक्ति शिक्षित है, वह अनिवार्य रूप से तार्किक भी होगापरंतु आज की शिक्षा व्यवस्था को देखकर यह धारणा पूरी तरह ध्वस्त हो जाती हैवर्तमान समय में शिक्षा का स्वरूप व्यापक और जीवन-मूल्यों पर आधारित होने के बजाय 'सूचनात्मक' और 'आजीविका-उन्मुख' (Job-oriented) होकर रह गया है

  • डिग्री बनाम विवेक: आज के युवाओं के पास बड़ी-बड़ी डिग्रियां हैं, वे जटिल गणितीय सूत्रों को हल कर सकते हैं, सॉफ्टवेयर बना सकते हैं, और व्यावसायिक प्रबंधन के नए तौर-तरीके सीख सकते हैंलेकिन इस पूरी प्रक्रिया में उन्हें 'क्या सोचना है' (What to think) तो सिखाया जाता है, पर 'कैसे सोचना है' (How to think) यह नहीं सिखाया जाताजब तक शिक्षा, मनुष्य में प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति, यानी जिज्ञासा और संशयवाद (Skepticism) को जाग्रत नहीं करती, तब तक वह केवल एक कौशल (Skill) बनकर रह जाती है, जो विवेक कभी नहीं बनती
  • परीक्षा पास करने का विज्ञान: विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में विज्ञान को एक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है, कि एक जीवन-शैली या दृष्टिकोण के रूप मेंविद्यार्थी भौतिकी, रसायन शास्त्र और जीव विज्ञान के सिद्धांतों को रटकर परीक्षा में शत-प्रतिशत अंक तो ले आते हैं, लेकिन जैसे ही वे परीक्षा भवन से बाहर निकलते हैं, वे अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में उन्हीं वैज्ञानिक सिद्धांतों को लागू करना भूल जाते हैंयही कारण है कि प्रयोगशाला में ग्रहों और तारों की गति का अध्ययन करने वाला वैज्ञानिक भी कभी-कभी निजी जीवन में ग्रहों के तथाकथित 'दोष' को दूर करने के लिए अंगूठियों और ताबीजों का सहारा लेता हुआ दिखाई देता है
  • सामाजिक शिक्षा का अभाव: हमारी शिक्षा में केवल साक्षरता पर जोर है, सामाजिक और नैतिक चेतना पर नहींबचपन से ही बच्चों को समाज में प्रचलित रूढ़ियों को बिना सवाल किए स्वीकार करने की सीख दी जाती हैबड़ों का आदर करने के नाम पर अक्सर उनके भीतर छिपे अंधविश्वासों को भी बिना किसी तर्क के स्वीकार कर लेने का दबाव बनाया जाता हैयही मानसिक अनुकूलन (Conditioning) आगे चलकर युवावस्था में अंधविश्वास की नींव बनता है

. युवा पीढ़ी का अंधविश्वास की ओर झुकाव: मनोवैज्ञानिक कारण

यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जो युवा पीढ़ी इंटरनेट के माध्यम से दुनिया भर की जानकारी अपनी उंगलियों पर रखती है, वह अंधविश्वास के चंगुल में क्यों फंस रही है ? इसके पीछे कुछ गहरे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण काम कर रहे हैं

. आधुनिक जीवन का तनाव और अनिश्चितता

आज का युग अत्यधिक प्रतिस्पर्धा का युग हैहर युवा आगे बढ़ने की होड़ में शामिल हैकरियर की चिंता, नौकरी की असुरक्षा, आर्थिक दबाव और रिश्तों की उलझन ने युवाओं के मानसिक तनाव को चरम पर पहुँचा दिया हैजब कड़ी मेहनत के बाद भी मनमुताबिक परिणाम नहीं मिलते, तो मनुष्य के भीतर एक असुरक्षा की भावना पैदा होती हैइस मानसिक कमजोरी के क्षणों में तार्किक सोच शिथिल पड़ जाती है और व्यक्ति किसी ऐसे 'शॉर्टकट' या 'चमत्कार' की तलाश करने लगता है जो उसकी सभी समस्याओं को चुटकी में हल कर देअंधविश्वास, इसी मानसिक कमजोरी का फायदा उठाता है

. नियंत्रण की चाह (Illusion of Control)

जब जीवन में परिस्थितियां नियंत्रण से बाहर होने लगती हैं, तो मानव मस्तिष्क घबराने लगता हैटोटके, विशेष प्रकार के अनुष्ठान या किसी ज्योतिषी के पास जाना व्यक्ति को एक झूठी तसल्ली देता है कि अब सब कुछ उसके नियंत्रण में जाएगायह एक तरह का मनोवैज्ञानिक सहारा (Psychological Crutch) बन जाता है, जिसके सहारे युवा अपनी चिंताओं को कुछ समय के लिए भूल जाना चाहते हैं

. पीयर प्रेशर और डिजिटल भेड़चाल

आजकल सोशल मीडिया के इस दौर में अंधविश्वास का एक नया रूप सामने आया है जिसे 'डिजिटल अंधविश्वास' कहा जा सकता है। "इस संदेश को ग्यारह लोगों को भेजें, शाम तक अच्छी खबर मिलेगी",  जैसे संदेश केवल अशिक्षित लोग नहीं, बल्कि स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले युवा भी आगे बढ़ाते हैंइसके पीछे एक डर काम करता है कि 'कहीं ऐसा करने से कुछ बुरा हो जाए'। दोस्तों के समूह में किसी विशेष बाबा, हीलर या चमत्कारी स्थान की चर्चा सुनकर युवा कौतूहलवश या समूह का हिस्सा बने रहने के लिए वहां खिंचे चले जाते हैं

. तकनीकी युग में अंधविश्वास का आधुनिकीकरण (Cyber-Superstition)

एक समय था जब अंधविश्वास केवल ग्रामीण अंचलों, अंधेरी गुफाओं या पुराने ढर्रे के पूजा स्थलों तक सीमित माना जाता थालेकिन आज के तथाकथित 'हाई-टेक' युग में अंधविश्वास ने अपना चोला बदल लिया हैउसने खुद को आधुनिक तकनीक और कॉर्पोरेट संस्कृति के अनुरूप ढाल लिया है

  • भ्रामक वैज्ञानिक शब्दावली (Pseudo-Science): आज के ढोंगी और तथाकथित गुरु अपने अंधविश्वास के धंधे को चलाने के लिए विज्ञान की शब्दावली का दुरुपयोग करते हैंवे सीधे तौर पर जादू-टोना नहीं कहते, बल्कि उसे "क्वांटम हीलिंग", "कॉस्मिक एनर्जी", "ऑरा क्लींजिंग", "वाइब्रेशनल थेरेपी" या "मैग्नेटिक हीलिंग" जैसे भारी-भरकम और वैज्ञानिक लगने वाले शब्दों के जाल में लपेटकर परोसते हैंपढ़ा-लिखा युवा इन शब्दों से प्रभावित हो जाता है क्योंकि उसे लगता है कि इसके पीछे कोई वैज्ञानिक आधार है, जबकि वास्तव में वह शुद्ध रूप से अंधविश्वास ही होता है
  • सोशल मीडिया और इन्फ्लुएंसर्स का जाल: यूट्यूब, इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स पर आज ऐसे 'आधुनिक बाबा' और 'मोटिवेशनल गुरु' सक्रिय हैं जो सूट-बूट पहनकर, फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हुए अंधविश्वास और अतार्किक बातों का प्रचार करते हैंवे रील्स और शॉर्ट वीडियो के माध्यम से युवाओं के मनोविज्ञान को प्रभावित करते हैंउनके लाखों फॉलोअर्स होते हैं, जिन्हें देखकर भ्रम और गहरा हो जाता है कि यदि "इतने सारे लोग इन्हें मान रहे हैं, तो कुछ तो बात होगी ही।" 
  • ऑनलाइन अंधविश्वास का कारोबार: अब कुंडली दोष निवारण, काले जादू का असर खत्म करने के दावे, और चमत्कारी रत्न बेचने का काम ऑनलाइन वेबसाइट्स और ऐप्स के जरिए खूब हो रहा हैएक क्लिक पर आपकी समस्याओं का समाधान करने का दावा करने वाले ये डिजिटल तांत्रिक आज के युवाओं की जेबें बड़ी चालाकी से खाली कर रहे हैं

. तथाकथित संगठनों और पाखंडियों द्वारा आर्थिक शारीरिक शोषण

​"अंधविश्वास कभी भी निरापद नहीं होता, इसका अंत हमेशा किसी किसी रूप में शोषण के साथ ही होता है।" समाज में फैला इस मानसिक अंधेरे का लाभ उठाने के लिए कई संगठित गिरोह, तथाकथित धार्मिक संस्थाएं और ढोंगी बाबा सक्रिय रहते हैं

आर्थिक लूट का सुनियोजित तंत्र

चमत्कार के नाम पर लोगों को मानसिक रूप से पंगु बनाने के बाद शुरू होता है आर्थिक दोहन का खेलदुखों और परेशानियों से घिरे इंसान को यह विश्वास दिलाया जाता है कि उसकी समस्या का समाधान किसी विशेष अनुष्ठान, यज्ञ, या चमत्कारी लॉकेट से ही संभव है, जिसकी कीमत हजारों-लाखों में होती है। 

बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमने वाले और आलीशान आश्रमों में रहने वाले ये ढोंगी लोग आम जनता और विशेषकर युवाओं की गाढ़ी कमाई को अंधविश्वास के नाम पर लूट लेते हैंनौकरियों और व्यापार में सफलता पाने की चाहत में युवा अपनी जमा-पूंजी इन पाखंडियों के चरणों में अर्पित कर देते हैं

शारीरिक और मानसिक शोषण की विभीषिका

इससे भी अधिक दुखद पहलू है, शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना, जो अंधविश्वास की आड़ में दी जाती हैबीमारी ठीक करने के नाम पर तांत्रिकों द्वारा महिलाओं और बच्चों को शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने, उन्हें भूखा रखने या गंभीर बीमारियों में चिकित्सीय इलाज से रोकने के अनगिनत मामले सामने आते हैं। 

हम सब अक्सर देखते हैं कि कई बार गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति को डॉक्टर के पास ले जाने के बजाय किसी झाड़-फूंक करने वाले के पास ले जाया जाता है, जिससे समय पर इलाज मिलने के कारण उसकी जान तक चली जाती हैयुवाओं, विशेषकर युवतियों का, इन आश्रमों और गुप्त ठिकानों पर जो मानसिक और शारीरिक शोषण होता है, वह आये दिन समाचारों की सुर्खियां बनता रहता है, फिर भी लोग अपनी आंखें मूंद कर इन पर भरोसा करते रहते हैं

. सामाजिक ताने-बाने और देश के भविष्य पर मंडराता खतरा

जब किसी समाज में विवेक और तर्क का स्थान अंधविश्वास ले लेता है, तो उस समाज का पतन अवश्यंभावी हो जाता हैअंधविश्वास केवल व्यक्तिगत नुकसान नहीं पहुँचाता, बल्कि यह पूरे सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर देता है

  • आपसी अविश्वास और घृणा का माहौल: काले जादू, टोन-टोटके और डायन जैसी कुप्रथाओं के कारण अक्सर समाज में आपसी दुश्मनी और नफरत फैलती हैकिसी निर्दोष व्यक्ति या पड़ोसी को अपनी बदहाली या बीमारी का कारण मानकर उसे प्रताड़ित किया जाता हैइससे गांवों और मोहल्लों में भाईचारे की भावना समाप्त हो जाती है और पूरा समाज भय तथा शंका के माहौल में जीने को मजबूर हो जाता है
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temper) की हत्या: भारत के संविधान में भी यह स्पष्ट रूप से उल्लिखित है कि प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करेलेकिन जब पढ़ी-लिखी आबादी ही अंधविश्वास के जाल में फँसने लगती है, तो देश की सामूहिक सोच भी पिछड़ेपन का शिकार (Backward-looking) हो जाती हैहम नई खोजें करने, नए आविष्कार करने और दुनिया के सामने बौद्धिक नेतृत्व पेश करने के बजाय पुरानी रूढ़ियों को सही ठहराने में ही अपनी ऊर्जा नष्ट करने लगते हैं
  • वैश्विक मंच पर छवि को धक्का: आज जब भारत और अन्य विकासशील देश वैश्विक मंच पर एक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर हैं, तब इस तरह की खबरें कि अमुक स्थान पर चमत्कार के नाम पर सामूहिक ठगी हुई या किसी बच्चे की बलि दे दी गई, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि को गहरा आघात पहुँचाती हैं। ध्यान रहे कि दुनिया हमारे तकनीकी विकास को तो देखती है, लेकिन साथ ही हमारी इस वैचारिक संकीर्णता पर चकित और दुखी भी होती है
  • मानव संसाधन की बर्बादी: युवा पीढ़ी किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी संपत्ति होती हैयदि देश का युवा वर्ग ही अपनी ऊर्जा, समय और बुद्धिमत्ता का उपयोग रचनात्मक कार्यों, शोध और राष्ट्र निर्माण में करने के बजाय बाबाओं के चक्कर काटने, भाग्य के भरोसे बैठे रहने और चमत्कारों की उम्मीद में गंवाने लगेगा, तो उस देश का भविष्य अंधकारमय होना निश्चित हैहम अंततः एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे होंगे जो तकनीकी रूप से तो सक्षम होगी, लेकिन मानसिक रूप से गुलाम होगी

. अछूते और महत्वपूर्ण पहलू (वे बिंदु जिन पर अमूमन ध्यान नहीं जाता )

अंधविश्वास के इस ताने-बाने को पूरी तरह समझने के लिए कुछ ऐसे अंतर्निहित कारकों पर भी चर्चा करना अत्यंत आवश्यक है जो सामान्यतः बहसों से छूट जाते हैं

. मीडिया और मनोरंजन उद्योग की गैर-जिम्मेदाराना भूमिका

माने या न माने, ​टेलीविजन चैनलों और सिनेमा ने अंधविश्वास को ग्लैमरस बनाकर पेश करने में बड़ी भूमिका निभाई हैधारावाहिकों में इच्छाधारी नाग-नागिन, भूत-प्रेत, जादू-टोना और अतार्किक चमत्कारों को इस तरह दिखाया जाता है जैसे वे हमारे जीवन का एक सामान्य हिस्सा होंइसके अलावा कुछ धार्मिक और समाचार चैनलों पर ज्योतिष के नाम पर रोज सुबह-शाम अंधविश्वास परोसा जाता हैजब चौबीसों घंटे मीडिया इस तरह की सामग्री दिखाएगा, तो कोमल और विकासशील मस्तिष्कों पर इसका गहरा और स्थायी प्रभाव पड़ना तय है

. मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) के प्रति जागरूकता की कमी

हमारे समाज में आज भी मानसिक बीमारियों (जैसे अवसाद, एंग्जायटी, सिज़ोफ्रेनिया आदि) को एक बीमारी के रूप में स्वीकार नहीं किया जाताजब कोई युवा या परिवार का सदस्य मानसिक रूप से अस्वस्थ होता है, तो उसे मनोचिकित्सक के पास ले जाने के बजाय "ऊपरी हवा का चक्कर", "भूत-प्रेत का साया" या "किसी का किया-कराया" मान लिया जाता है

उचित चिकित्सा के अभाव में मरीज की स्थिति और बिगड़ जाती है, और पूरा परिवार तांत्रिकों के चंगुल में फँसकर आर्थिक रूप से बर्बाद हो जाता हैमानसिक स्वास्थ्य के प्रति यह अज्ञानता अंधविश्वास के फलने-फूलने की सबसे उर्वर भूमि है

. व्यवस्थागत कमियाँ और न्याय की धीमी प्रक्रिया

कई बार लोग अंधविश्वास का सहारा तब लेते हैं जब उन्हें कानून, न्याय व्यवस्था या स्वास्थ्य सुविधाओं पर भरोसा नहीं रह जाताजब किसी गरीब या लाचार व्यक्ति को अदालतों से समय पर न्याय नहीं मिलता या सरकारी अस्पतालों में उचित इलाज नहीं मिलता, तो वह निराश होकर किसी 'दैवीय चमत्कार' या बाबा की शरण में जाता है कि शायद यहीं से उसकी पुकार सुन ली जाएव्यवस्थागत विफलताएं मनुष्य को लाचार बनाती हैं और यही लाचारी उसे अंधविश्वासी बनाती है

. इस संकट से उबरने के उपाय और समाधान की दिशा

अंधविश्वास की इस गहरी जड़ जमा चुकी समस्या से निपटने के लिए किसी जादुई छड़ी की नहीं, बल्कि समाज के हर स्तर पर व्यापक, गंभीर और निरंतर प्रयासों की आवश्यकता हैयह लड़ाई बहुआयामी है, जिसे जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में एक साथ लड़ना होगा

  1. सबसे पहला और अनिवार्य बदलाव शैक्षणिक स्तर पर आना चाहिएवर्तमान पाठ्यक्रम में विज्ञान के सिद्धांतों को केवल रटाने की परिपाटी को बदलकर, विद्यार्थियों के भीतर 'वैज्ञानिक दृष्टिकोण' विकसित करने वाले व्यावहारिक प्रयोगों और तार्किक बहसों को अनिवार्य स्थान दिया जाना चाहिएजब बच्चों को बचपन से ही सवाल पूछने, शंका प्रकट करने और हर घटना के पीछे छिपे वास्तविक 'कार्य-कारण संबंध' (Cause and Effect) को तलाशने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा, तो उनका मस्तिष्क किसी भी पाखंड को आसानी से स्वीकार नहीं करेगा
  2. शैक्षणिक संस्थानों के बाद इस दिशा में दूसरा सबसे बड़ा दायित्व पारिवारिक स्तर पर आता हैमाता-पिता को सजग होकर अपने बच्चों के सामने स्वयं एक तार्किक और विवेकशील उदाहरण प्रस्तुत करना होगाघरों के भीतर अनजाने में ही बच्चों को डराने या भाग्य के भरोसे छोड़ने की जो रूढ़िवादी बातें सिखाई जाती हैं, उन्हें बंद करना होगायदि परिवार का माहौल भयमुक्त, पारदर्शी और आपसी संवाद-उन्मुख होगा, तो नई पीढ़ी का मानसिक विकास भी स्वस्थ और अंधविश्वास-मुक्त होगा
  3. इसके साथ ही, प्रशासनिक कानूनी स्तर पर राज्य को अपनी भूमिका अत्यंत कड़ाई से निभानी होगीअंधविश्वास, जादू-टोना और इसके नाम पर आम जनता को ठगने वाले तांत्रिकों पाखंडियों के खिलाफ बने कानूनों को और सख्त करने तथा उन्हें बिना किसी सामाजिक या राजनीतिक दबाव के लागू करने की आवश्यकता हैजो लोग चमत्कार के नाम पर आर्थिक या शारीरिक शोषण करते हैं, उन्हें त्वरित और अनुकरणीय सजा मिलनी चाहिए ताकि समाज में एक कड़ा संदेश जाए
  4. अंततः, मीडिया और आधुनिक संचार माध्यमों को भी अपनी व्यावसायिक सीमाओं से ऊपर उठकर नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगीटेलीविजन चैनलों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाले भ्रामक विज्ञापनों और कार्यक्रमों के प्रसारण पर खुद ही रोक लगानी होगीइसके विपरीत, उन्हें विज्ञान, नवाचार और तार्किक सोच को लोकप्रिय बनाने वाली सामग्री को अधिक से अधिक प्रसारित करना चाहिए, ताकि डिजिटल युग का उपयोग अंधकार फैलाने के बजाय प्रकाश फैलाने में हो सके

​अंत में निष्कर्ष: भीतर के दीये को जलाना होगा

अंधविश्वास की यह समस्या जितनी प्राचीन है, उतनी ही वर्तमान समय में विकराल भी हो चुकी हैयह देखना सचमुच पीड़ादायक है कि जिस नई पीढ़ी से हमें यह उम्मीद थी कि वह समाज को रूढ़ियों के अंधे कुएं से बाहर निकालकर एक आधुनिक, प्रगतिशील और न्यायसंगत दिशा देगी, वह खुद ही इस दलदल में धंसती जा रही है। 

हम चाहे कितने भी ऊंचे भवनों का निर्माण कर लें, कितनी भी उन्नत गाड़ियां चला लें या दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएं, लेकिन यदि हमारी मानसिक सोच आज भी आदिम युग के अंधविश्वासों में जकड़ी हुई है, तो हमारा सारा विकास केवल एक छलावा है

दिन के अंत में, जब कोई युवा या परिवार अंधविश्वास के इस जाल में फँसकर अपना सब कुछ गंवा बैठता है, तो वह खुद को अत्यंत 'ठगा सा' महसूस करता हैवह ठगी केवल आर्थिक नहीं होती, वह आत्मा की, विश्वास की और मनुष्यता की ठगी होती है

इस अंधकार से बाहर निकलने का केवल एक ही मार्ग है, सच्ची शिक्षा और सजग चेतनाहमें यह समझना होगा कि विज्ञान कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे केवल प्रयोगशालाओं में बंद रखा जाए, यह जीवन जीने का एक सलीका है। 

जब तक समाज का हर नागरिक, विशेषकर हमारी युवा पीढ़ी, किसी भी बात को केवल इसलिए मानने से इनकार नहीं करेगी कि वह सालों से चली रही है, और जब तक वह हर दावे को तर्क, प्रमाण और विवेक की कसौटी पर कसना शुरू नहीं करेगी, तब तक अंधविश्वास के ये सौदागर समाज का शोषण करते रहेंगे

भविष्य को बचाने के लिए, समाज के इस ताने-बाने को सुरक्षित रखने के लिए, और देश को वैचारिक रूप से समृद्ध बनाने के लिए हमें अपने भीतर छिपे अज्ञान के अंधेरे को तर्क और विवेक के उजाले से मिटाना ही होगायही समय की मांग है और यही हमारी आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारा सबसे बड़ा दायित्व भी है।

लेखक, मनोज भट्ट, कानपुर "सामाजिक ताना-बाना"

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ब्लॉग वेबसाइट: www.samajiktanabana.in ईमेल: manojbhatt@samajiktanabana.in

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