"दिमाग की आंखें खोलना" : पूर्वाग्रहों से मुक्त-सोच की ओर ...
दिमाग की आंखें खोलना, केवल एक रूपक नहीं बल्कि आज के समय की पुकार है। "मन की आंखें खोल रे भैया", यह पुकार आज के भारत की ही नहीं समूचे संसार की सबसे आवश्यक चेतावनी बन चुकी है। इसी गंभीर विषय पर आधारित एक विवेकशील यात्रा...।
आज के दौर में जब सूचना के महासागर की बाढ़ में, सच्चाई पूरी तरह डूब रही हो और "तथाकथित" पढ़ा लिखा वर्ग भी, भ्रम तथा पूर्वाग्रहों का शिकार बन रहा हो, तब केवल शारीरिक आंखें खोलना पर्याप्त नहीं होता। बल्कि हमें दिमाग की आंखें खोलनी होंगी अर्थात विवेक तर्कशक्ति और आत्मनिरीक्षण के माध्यम से हर बात को देखना, समझना और परखना होगा।
यह कोई साधारण रूपक नहीं है बल्कि आज के युग की सबसे गहरी पुकार है, जो हमें भ्रम के अंधकार से बाहर निकालकर सच्चाई की ओर ले जा सकती है। जिस सच्चाई को अपनी इस रचना में उजागर किया है वह आज हर देश हर समाज और हर व्यक्ति के लिए प्रासंगिक है, क्योंकि सूचना का यह महासागर अब किसी एक राष्ट्र तक सीमित नहीं रहा है।
सूचना युग में भ्रम की परतें
आज पूरा विश्व सूचना के एक अथाह महासागर में तैर रहा है। अधिकतर देशो की जनसंख्या करोड़ों में है और लोग विश्वव्यापी सूचना जाल का उपयोग कर रहे हैं। इनमें से अधिकांश लोग हाथ में लिए जाने वाले यंत्रों पर निर्भर हैं और प्रति व्यक्ति औसतन बीस गीगाबाइट से भी अधिक सूचना हर माह ग्रहण कर रहे हैं।
सामाजिक संचार मंचों के उपयोगकर्ता भी करोड़ों की संख्या में पहुंच चुके हैं। यह दृश्य दर्शाता है कि "मानवता" अब सूचना के एक विशाल समुद्र में बदल चुकी है, लेकिन क्या हम इस समुद्र में सही दिशा जानते हैं। पर क्या हम इस सूचना की बाढ़ में तैरते हुए सच्चाई को पहचान पा रहे हैं। नहीं। दरअसल अधिकांशतः हम भ्रम की लहरों में बह जाते हैं।
यह समस्या केवल एक देश की नहीं है। विश्व के विकसित राष्ट्रों में भी यही हाल है जहां लोग दिन भर सूचना के जाल में फंसे रहते हैं। एक ओर जहां विकासशील राष्ट्रों में सूचना जाल तेजी से फैल रहा है, वहीं विकसित राष्ट्रों में यह जाल पहले से ही गहराई तक पहुंच चुका है। परिणाम एक ही है, भ्रम की परतें दर परतें बढ़ती जा रही हैं।
लोग "अपनी पसंदीदा" सूचना स्रोतों तक सीमित होकर रह जाते हैं और सिक्के के दूसरे पहलू की सच्चाई को नजरअंदाज कर देते हैं। इससे समाज में विभेद बढ़ता है, विश्वास टूटता है और सौहार्द का वातावरण नष्ट होता है। यह चेतावनी है कि सूचना की इस बाढ़ में केवल आंखें खोलना पर्याप्त नहीं दिमाग की आंखें खोलनी होंगी।
शिक्षित वर्ग और पूर्वाग्रह अदृश्य बीमारी
यहां जिस "तथाकथित शिक्षित वर्ग" की चर्चा है, वह आज विश्व स्तर पर सबसे अधिक सूचना ग्रहण करता है, लेकिन सबसे कम आत्मनिरीक्षण करता है। यह वर्ग अक्सर अपनी पसंदीदा विचारधारा, अपनी पसंदीदा समाचार स्रोत या सामाजिक संचार मंचों से ही सच्चाई का निर्धारण कर लेता है।
वह सोचता है कि वह पढ़ा लिखा है इसलिए जो उसे सूचित किया जा रहा है वह सत्य ही होगा। परंतु वास्तविकता इससे कतई भिन्न है। विश्व भर में फैली गलत सूचनाओं का "एक बड़ा हिस्सा" राजनीतिक स्वभाव का है, कुछ सामान्य स्वभाव का और कुछ धार्मिक स्वभाव का है।
सबसे अधिक चिंताजनक बात यह है कि शिक्षित वर्ग भी, बिना किसी सत्यापन के इन सूचनाओं को आगे बढ़ाता है। इससे लोकतंत्र, सामाजिक सौहार्द और जनमत निर्माण पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। विकसित राष्ट्रों में भी यही प्रवृत्ति देखी जाती है, जहां पढ़े लिखे लोग अपनी पसंदीदा समाचार चैनलों या मंचों पर भरोसा करके बड़े बड़े निर्णय ले लेते हैं।
परिणामस्वरूप चुनाव प्रभावित होते हैं, नीतियां गलत दिशा में जाती हैं और समाज में विभेद गहराते हैं। यह एक खतरनाक बीमारी है, क्योंकि यह दिखाई नहीं देती। व्यक्ति खुद को बुद्धिमान समझता है परंतु वास्तव में वह पूर्वाग्रह ग्रस्त कैदी बन जाता है। यह रचना हमें इसी कैद से मुक्ति दिलाने का मार्ग दिखाती है।
आत्मनिरीक्षण सच्चाई की खोज की पहली सीढ़ी, स्वयं को चुनौती देना
जब हम अपने विचारों को चुनौती देना शुरू करते हैं तभी सच्चाई की ओर बढ़ना संभव होता है। आत्मनिरीक्षण का अर्थ है, अपने सूचना स्रोतों की समीक्षा करना, अपने पूर्वाग्रहों को पहचानना और हर सूचना को, तर्क की कसौटी पर कसना। यह प्रक्रिया सरल नहीं है, परंतु यही एकमात्र मार्ग है जो हमें भ्रम से बाहर निकाल सकता है।
आत्मनिरीक्षण की शुरुआत तब होती है, जब हम "स्वयं से प्रश्न" करते हैं कि जो सूचना मेरे सामने है, वह कहां से आई है, इसका स्रोत विश्वसनीय है या नहीं, इसके पीछे कोई छिपा उद्देश्य तो नहीं है। हम अपने मन में उठने वाले पूर्वाग्रहों को चुनौती के रूप में स्वीकार करते हैं और उन्हें दूर करने का प्रयास करते हैं।
हर सूचना को तर्क के साथ जोड़कर देखते हैं। लेकिन इस प्रक्रिया में धैर्य चाहिए, साहस चाहिए और निरंतर अभ्यास भी। विश्व के प्राचीन दर्शन भी,"आत्मनिरीक्षण" पर जोर देते हैं। भारतीय परंपरा में "विवेक" की महत्ता सदैव रही है। जब व्यक्ति अपने अंदर झांकता है, तभी बाहर की सच्चाई स्पष्ट होती है।
आज के युग में यह आत्मनिरीक्षण और भी आवश्यक हो गया है, क्योंकि सूचना जाल ने हमें प्रभावशाली तरीके से, हर क्षण बाहरी उत्तेजनाओं में जकड़ कर रखा है। यदि हम आत्मनिरीक्षण नहीं करेंगे तो हम केवल दूसरों के विचारों के "मानसिक गुलाम" बनकर रह जाएंगे।
सोच की स्वतंत्रता और विवेक की जागरूकता
आज की सबसे बड़ी आवश्यकता, सोच की स्वतंत्रता और विवेक की जागरूकता है। किंतु यह तभी संभव है जब हम हर सूचना को जांचें परखें और समझें। "बहस और संवाद" को खुले मन से स्वीकार करें तथा " सूचना समझ" को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाएं।
अब विश्व भर में सूचना समझ बढ़ाने के लिए अनेक प्रयास हो रहे हैं। कुछ संगठनों ने ग्रामीण क्षेत्रों में सूचना समझ बढ़ाने की पहलें शुरू की हैं। कुछ राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालयों ने सूचना और संचार माध्यमों की समझ पर उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम चलाए हैं। स्कूल स्तर पर भी सूचना शिक्षा के लिए संसाधन विकसित किए जा रहे हैं।
साथ ही सरकारें भी ग्रामीण ओर शहरी क्षेत्रों में "सूचना साक्षरता" को बढ़ावा देने वाली नीतियों के साथ, योजनाएं चला रही हैं। इन प्रयासों से स्पष्ट है कि पूरा विश्व, सूचना समझ की ओर बढ़ रहा है। परंतु इनका विस्तार और प्रभाव अभी पर्याप्त नहीं है।
इन प्रयासों को और भी मजबूत बनाने की जरूरत है, ताकि हर व्यक्ति, हर वर्ग तक यह पहुंच सके। तभी सोच की स्वतंत्रता सार्थक होगी और विवेक की जागरूकता फैल सकेगी।
वर्तमान उदाहरण, भ्रम बनाम सच्चाई
पिछली वैश्विक महामारी के दौरान, अफवाहों ने टीके के विरोध, घरेलू उपचारों और सामाजिक तनाव को बढ़ावा दिया। राजनीतिक प्रचार में बदल दिए गए वीडियो, झूठे बयान और हमले आम हो गए।
धार्मिक मुद्दों पर, बिना संदर्भ के, वायरल संदेशों ने कई बार हिंसा को जन्म दिया। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि केवल शारीरिक आंखों से देखना पर्याप्त नहीं, हमें विवेक से देखना होगा। तभी वैश्विक सामाजिक ताना-बाना का आधार सुदृढ़ बनेगा।
ये उदाहरण केवल एक देश तक सीमित नहीं हैं। विश्व के अनेक राष्ट्रों में ऐसी घटनाएं हुई हैं, जहां सूचना की गलत व्याख्या ने बड़े बड़े संकट पैदा किए। जैसे आम चुनावों में झूठी सूचनाएं फैलाकर जनमत बदला जा सकता है। उसी तरह स्वास्थ्य संबंधी गलत सूचनाओं ने लाखों लोगों को प्रभावित किया।
दुनिया भर में धार्मिक और सामाजिक मुद्दों पर फैली अफवाहों ने शांति भंग की। यह सब दर्शाता है कि भ्रम की परतें कितनी गहरी और खतरनाक हैं। इन उदाहरणों को देखते हुए ये तथ्य और भी प्रासंगिक है कि सच्चाई की खोज, बिना विवेक के अधूरी है।
शिक्षण व्यवस्था में सुधार से नई दिशा की ओर
एक शोध में पाया गया कि सैकड़ों गांवों में हजारों छात्रों को "सूचना समझ" सिखाने के बाद, वे गलत सूचनाओं को पहचानने में अधिक सक्षम हुए और उनके माता पिता पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा। यह दर्शाता है कि सही शिक्षा से पूर्वाग्रहों को चुनौती दी जा सकती है।
विश्व स्तर पर भी ऐसे अनेक शोध हुए हैं, जो बताते हैं कि सूचना शिक्षा से समाज में सकारात्मक परिवर्तन आता है। छात्रों में तर्कशक्ति बढ़ती है, वे स्वतंत्र सोचने लगते हैं और परिवार तथा समुदाय पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। इसलिए शिक्षा प्रणाली में सूचना समझ को अनिवार्य विषय बनाना चाहिए।
समाधान की दिशा, विवेकशील समाज की ओर
यहां हम कुछ ठोस कदम सुझा सकते हैं।
- सूचना समझ को स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए।
- सामाजिक संचार मंचों पर तथ्य जांच के उपकरण अनिवार्य किए जाएं।
- संवाद और बहस को प्रोत्साहित किया जाए जहां विरोध भी सम्मानपूर्वक हो।
- आत्मचिंतन और ध्यान को जीवनशैली का हिस्सा बनाया जाए।
ये कदम केवल एक देश तक सीमित नहीं होने चाहिए। विश्व स्तर पर सहयोग की जरूरत है। राष्ट्र एक दूसरे से "सूचना समझ" सीख कर, कार्यक्रमों का आदान प्रदान करें और संयुक्त प्रयासों से भ्रम का मुकाबला करें। सरकारें, तकनीकी कंपनियां और नागरिक समाज मिलकर काम करें ताकि विवेकशील समाज का निर्माण हो सके।
व्यक्तिगत स्तर पर हर एक को अपनी ये जिम्मेदारी समझनी होगी कि जब हम रोज सूचना ग्रहण करते हैं, तो रोज उसे परखें भी। अपने बच्चों को विवेक सिखाएं। परिवार में संवाद बढ़ाएं। जब हम सब मिलकर यह यात्रा शुरू करेंगे तभी बदलाव संभव होगा।
इसके अलावा विश्व स्तर पर एक बड़ा आंदोलन शुरू करने की जरूरत है, हर देश "विवेक व सूचना-समझ" को अपनी शिक्षा नीति में प्राथमिकता दे। तकनीकी कंपनियां अपनी एल्गोरिदम को ऐसे बनाएं कि सच्चाई को बढ़ावा मिले न कि भ्रम को।
समस्त मीडिया संस्थान अपनी जिम्मेदारी समझें और संतुलित समाचार एवं जानकारियां दें। नागरिक खुद को "सूचना का उपभोक्ता" न समझें बल्कि सूचना का विवेकपूर्ण उपयोगकर्ता बनें।
यह यात्रा कठिन है, परंतु यही एकमात्र मार्ग है, जो हमें "भ्रम से मुक्ति" दिला सकता है। जब हम अपनी "सोच को चुनौती" देना शुरू करेंगे तभी सच्चाई हमारे सामने आने लगेगी।
अंत में निष्कर्ष यही निकलता है कि "दिमाग की आंखें खोलना" केवल एक रूपक नहीं बल्कि आज के समय की पुकार है। जब हम अपनी सोच को चुनौती देना शुरू करेंगे, तभी हम सच्चाई की ओर बढ़ेंगे। यह यात्रा कठिन हो सकती है परंतु असंभव नहीं।
ये रचना हमें बार बार याद दिलाती है कि यही वह मार्ग है जो हमें एक विवेकशील स्वतंत्र और न्यायपूर्ण समाज की ओर ले जाएगा। क्योंकि "सच्चाई बाहर नहीं, अंदर होती है"।
हमारी आंखें भले ही खुली हों परंतु यदि "दिमाग की आंखें" बंद हों तो हम अंधे ही रहेंगे। इसलिए आज हर व्यक्ति, हर समाज और हर राष्ट्र को इस पुकार को सुनना चाहिए और दिमाग की आंखें खोलनी चाहिए।
यह विवेकशील यात्रा न केवल व्यक्तिगत विकास लाएगी बल्कि समूचे विश्व को एक बेहतर स्थान बनाएगी, जहां सच्चाई का सम्मान हो, भ्रम का अंत हो और मानवता एक होकर आगे बढ़े। हम सब मिलकर यह संकल्प करें कि हम भ्रम के शिकार नहीं बनेंगे, बल्कि विवेक के दीपक बनकर अंधकार को दूर करेंगे।
इस यात्रा में हर कदम महत्वपूर्ण है। आज से शुरू करें, अपने आस पास की सूचना को परखना शुरू करें। परिवार में चर्चा करें, स्कूलों में सिखाएं और समाज में फैलाएं। जब करोड़ों लोग इस दिशा में बढ़ेंगे तो विश्व बदल जाएगा। भ्रम की दीवारें गिर जाएंगी और सच्चाई का प्रकाश फैल जाएगा।
लेखक की ये रचना इसी प्रकाश को जगाती है। हम सब उस प्रकाश को और फैलाएं ताकि आने वाली पीढ़ियां भ्रम मुक्त, विवेकपूर्ण जीवन जी सकें। यह हमारा दायित्व है और यही हमारी सफलता होगी।
दिमाग की आंखें खोलना अब केवल शब्द नहीं बल्कि जीवन का मंत्र बन जाना चाहिए।
यह मंत्र हर देश हर भाषा और हर संस्कृति में एक समान अर्थ रखता है क्योंकि सच्चाई सार्वभौमिक है। विवेक सार्वभौमिक है और मानवता की प्रगति भी इसी पर निर्भर है।
इस प्रकार हम एक विवेकशील विश्व का निर्माण कर सकते हैं, जहां हर व्यक्ति स्वतंत्र सोच रखे और सच्चाई की राह पर चले। यही आज की सबसे बड़ी पुकार है और यही हमारा संकल्प होना चाहिए।
यह रचना न केवल एक चेतावनी है, बल्कि एक आह्वान भी, कि हम सब मिलकर अपने भीतर की आंखें खोलें और अपने समय की सच्ची तस्वीर देखें।
लेखक - मनोज कुमार भट्ट, कानपुर
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