इमर्जेंसी नम्बर, आपकी असली कमाई क्या है ?
इमर्जेंसी नम्बर - जीवन की असली पूँजी
इस लेख के पाठकों से पहला प्रश्न ये है कि आपकी असली कमाई क्या है ?
लेखक का विनम्र निवेदन है कि इस लेख को आगे पढ़ने से पहले, उपरोक्त प्रश्न का उत्तर एक पहेली की भांति बड़ी गंभीरता, साहस और ईमानदारी से अपने आप को दें... अपने उत्तर पर मनन करें... फिर आगे लेख पढ़ें।
आज के
इस भाग-दौड़ भरे जीवन में जरा रुक कर सोचिए कि आपकी असली कमाई क्या है, क्या आपकी जिंदगी में कोई ऐसा व्यक्ति
है, जिसे आप आधी रात को, बिना एक पल सोचे, फोन लगा सकें ? जिसे आप कह सकें, "यार, मैं फँस गया हूँ, मदद चाहिए" और वह बिना सवाल पूछे, बिना
हिसाब-किताब लगाए, बस आपके लिए निकल पड़े ?
और
दूसरा, इससे भी बड़ा सवाल ये है कि क्या आप खुद किसी के लिए ऐसे व्यक्ति हैं ? क्या किसी
की फोनबुक में आपका नाम उस "इमर्जेंसी नम्बर" के तौर पर सेव है ?
अगर
इन दोनों सवालों का जवाब 'हाँ' है, तो यकीन मानिए, आप इस दुनिया के सबसे अमीर
लोगों में से एक हैं। यह लेख बैंक बैलेंस की नहीं, दिल के बैलेंस की बात करता है।
उस पूँजी की, जो न लॉकर में रखी जाती है, न सोशल मीडिया पर दिखाई जाती है, बल्कि
मुश्किल वक्त में कंधे पर रखे एक हाथ के रूप में महसूस होती है।
1. हम सफलता को कहाँ खोज रहे हैं ?
हमें ये समझना होगा कि हम एक अजीब से दौर में जी रहे हैं। सुबह से शाम तक हम एक ही दौड़ में लगे हैं, और ज्यादा पैसा, और बड़ा पद, और बड़ी गाड़ी, और सोशल मीडिया पर और अधिक फॉलोअर्स।
दरअसल हमने सफलता के पैमाने बहुत छोटे बना दिए हैं। कौन कितना कमाता है, किसका घर कितना बड़ा है, किसके इंस्टाग्राम पर कितने लाइक्स आते हैं, इसी से हम तय कर लेते हैं कि कौन सफल है और कौन नहीं।
लेकिन
क्या आपने कभी अस्पताल के कॉरिडोर में बैठे हुए, किसी नौकरी के इंटरव्यू में
रिजेक्ट होने के बाद, या जिंदगी के किसी ऐसे मोड़ पर जहाँ सब कुछ खत्म-सा लगता है,
उस वक्त आपने कुछ सोचा या अपने आप से पूछा है कि आपके साथ कौन खड़ा है ?
उस
वक्त आपकी महंगी घड़ी, आपका पद, आपके फॉलोअर्स कोई काम नहीं आते। उस वक्त काम आता
है तो बस एक इंसान, जो कहे, "टेंशन मत ले, मैं हूँ ना।"
यही
फर्क है दिखावटी कमाई और असली कमाई में। बैंक में पड़ा पैसा, बाजार के साथ
घटता-बढ़ता है। पद आज है, कल नहीं रहेगा। फॉलोअर्स एक अफवाह से अनफॉलो कर देंगे।
लेकिन एक सच्चा मानवीय रिश्ता, एक इमर्जेंसी नम्बर जैसा रिश्ता, वह वक्त के साथ
और गहरा होता जाता है।
2. इमर्जेंसी नम्बर का असली अर्थ क्या है ?
जैसे ही हम 'इमर्जेंसी नम्बर' शब्द सुनते हैं, हमारे दिमाग में 112, 102, एम्बुलेंस, पुलिस की तस्वीर आती है। ये वो नम्बर हैं जो सरकार ने हमारी शारीरिक सुरक्षा के लिए बनाए हैं। लेकिन जिंदगी की इमर्जेंसी सिर्फ एक्सीडेंट तक सीमित नहीं होती, जिंदगी की असली इमर्जेंसीज कुछ और होती हैं...
- जब आप अचानक नौकरी खो देते हैं और समझ नहीं आता कि घर कैसे चलेगा।
- जब आपका कोई अपना अस्पताल में है और आपको हिम्मत देने वाला कोई चाहिए।
- जब आप अंदर से टूट रहे होते हैं, डिप्रेशन में होते हैं, और आपको बिना जज किए सुनने वाला कोई चाहिए।
- जब आप एक नए शहर में बिल्कुल अकेले हैं और आपको कोई रास्ता नहीं सूझ रहा।
- जब आपने कोई गलती कर दी है और आपको डांटने वाला नहीं, बल्कि संभालने वाला कोई चाहिए।
इन
इमर्जेंसी के लिए 112 काम नहीं आता। इनके लिए काम आता है आपका अपना बनाया हुआ
इमर्जेंसी नम्बर। एक दोस्त, एक पड़ोसी, एक पुराना क्लासमेट, एक गुरु, एक ऐसा
इंसान जो खून के रिश्ते से आपका नहीं है, पर दिल के रिश्ते से आपसे ज्यादा आपका
है।
इस तरह के रिश्तों की तीन पहचान होती हैं:--
1.
निस्वार्थता:-- वह आपसे मदद के बदले कुछ नहीं चाहता। उसका हिसाब-किताब नहीं होता कि
"मैंने पिछले महीने तेरी मदद की थी, अब तू कर।"
2.
बिना औपचारिकता के उपलब्धता:-- उसे फोन करने से पहले आपको सोचना नहीं पड़ता कि
"क्या कहूँगा, बुरा तो नहीं मानेगा, सही टाइम है भी या नहीं।" आप बस फोन लगा
देते हैं।
3.
भरोसा:-- आपको पता होता है कि यह बात यहीं रहेगी। वह आपकी कमजोरी का मजाक नहीं
उड़ाएगा, आपकी कहानी को दूसरों के सामने तमाशा नहीं बनाएगा।
3. जीवन की सबसे बड़ी अमीरी
कल्पना
कीजिए, आपके पास एक डायरी है। उसमें एक पन्ने पर आप अपनी सारी संपत्ति लिखते हैं -
घर, गाड़ी, सेविंग्स। और दूसरे पन्ने पर आप उन लोगों के नाम लिखते हैं जो आपके
इमर्जेंसी नम्बर हैं।
कौन
सा पन्ना ज्यादा कीमती है ?
सोच
कर देखिए, अगर आपके पास सिर्फ एक भी ऐसा इंसान है, जो सच में आपके लिए खड़ा होता
है, तो आपने जीवन में कुछ कमाया है। यह कमाई किसी भी मंदी के दौर में कम नहीं होती। इस पर
कोई जीएसटी नहीं लगता। इसे कोई चोर चुरा नहीं सकता। यह आत्मा की तिजोरी में जमा
होती है।
और
अगर ऐसे 2-3 लोग भी आपकी जिंदगी की लिस्ट में हैं, तो आप अरबपति हैं, भावनाओं के अरबपति। आप वाकई में बहुत हैसियत वाले हैं। क्योंकि विषम परिस्थितियों में न तो नेटवर्क काम आता है और न ही नेटवर्थ....
आज के
समय में लोग अकेले होते जा रहे हैं। भीड़ में भी "अकेलापन", और यह कड़वी असलियत ही आज की सबसे बड़ी बीमारी
है। हजारों कॉन्टैक्ट्स फोन में सेव हैं, लेकिन एक भी ऐसा नाम नहीं जिसे दिल से
फोन लगाया जा सके। हम व्हाट्सएप ग्रुप्स में तो हैं, पर किसी के दुख के ग्रुप में
शामिल नहीं हैं।
इसलिए
यह सवाल खुद से पूछना बहुत जरूरी है कि क्या मैंने अपने जीवन में सिर्फ नेटवर्क
बनाया है या रिश्ते भी बनाए हैं ? नेटवर्क सिर्फ काम निकालता है, जबकि रिश्ता काम आने से पहले
ही पहुँच जाता है।
4. सिक्के का दूसरा पहलू, क्या आप किसी के इमर्जेंसी नम्बर हैं ?
यह
लेख का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
अपने
लिए इमर्जेंसी नम्बर की बात करना या इमर्जेंसी नम्बर को खोजना तो स्वार्थ है, लेकिन किसी और के लिए इमर्जेंसी नम्बर
बनना, वह परमार्थ है। वह इंसानियत है।
जरा
आँख बंद करके सोचिए, क्या कोई ऐसा है जो संकट में सबसे पहले आपको याद करता है ?
कोई ऐसा जिसे लगता है कि "अगर सब ने मना भी कर दिया, तो यह इंसान मना नहीं
करेगा ?"
अगर
जवाब हाँ है, तो आप बहुत बड़ी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। आप सिर्फ एक व्यक्ति नहीं
हैं, आप किसी की हिम्मत हैं। आप किसी की उस दीवार की तरह हैं जिस पर टिक कर वह
अपने टूटे हुए घर को फिर से बना सकता है।
किसी
का इमर्जेंसी नम्बर बनना आसान नहीं है। इसके लिए आपको चार चीजें देनी पड़ती हैं,
जो आज के समय में सबसे महंगी हैं:--
- समय:-- घड़ी में बिना समय देखे, किसी की बात सुनने का समय।
- धैर्य:-- बिना बीच में टोके, बिना ज्ञान दिए, बस सुनने का धैर्य।
- संवेदनशीलता:-- दूसरे के दर्द को अपना दर्द समझने की संवेदनशीलता।
- साहस:-- यह कहने का साहस कि "तू गलत भी है तो भी मैं तेरे साथ हूँ, पर तुझे सही रास्ते पर लाऊँगा।"
आजकल
हम कहते हैं, "मेरे पास टाइम नहीं है।" ठीक है, हम सच में बहुत बिजी हो गए हैं।
लेकिन बिजी होने का मतलब यह तो नहीं होना चाहिए कि हम इंसान होना ही भूल जाएं। किसी को एक फोन
कॉल जो हमारे लिए कुछ मिनटों का हो सकता है, वो किसी की पूरी रात की बेचैनी खत्म कर सकता है।
5. यह रिश्ते खत्म क्यों हो रहे हैं ?
यह एक
कड़वा सच है कि इमर्जेंसी नम्बर जैसे रिश्ते आज लुप्त होते जा रहे हैं। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि ऐसा क्यों हो रहा है ?
- पहला कारण है -- आत्मकेंद्रित सोच... हम, 'मैं' और 'मेरा परिवार' तक सिमट गए हैं। अब हम सोचते हैं कि मेरी दुनिया, मेरे घर की चार दीवारों तक ही है। पड़ोस में कौन रहता है, दफ्तर में कौन परेशान है, हमें फर्क नहीं पड़ता।
- दूसरा कारण है -- लेन-देन की सोच... हमने हर रिश्ते को बिजनेस बना दिया है। हम मदद भी नाप-तौल कर करते हैं, इससे मुझे क्या फायदा होगा ? यह मेरे कितने काम आएगा ? इसी लिए जहाँ फायदा खत्म, वहाँ रिश्ता खत्म।
- तीसरा कारण है -- दिखावे की दुनिया... सोशल मीडिया ने हमें सिखाया है कि खुश दिखना ज्यादा जरूरी है, खुश होना नहीं। हम अपनी अच्छी फोटो डालते हैं, पर अंदर का दर्द छुपा लेते हैं। जब हम अपना दर्द ही नहीं बताएंगे, तो कोई इमर्जेंसी नम्बर कैसे बनेगा ?
- चौथा कारण है -- डर... हमें डर लगता है कि अगर मैं किसी की ज्यादा मदद करूँगा तो लोग मेरा फायदा उठाएंगे। और यह डर ही हमें सबसे अच्छा इंसान बनने से रोक देता है।
6. डिजिटल भीड़ में अकेला इंसान
आजकल लोग सोशल मीडिया से बहुत प्रभावित हैं और वे उसमें बहुत ही ज्यादा व्यस्त भी हो गए हैं, क्योंकि उनका मानना है कि सोशल मीडिया हमें आपस में जोड़ रहा है। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है, नहीं... ये सच नहीं है। नाम जरूर सोशल मीडिया है पर ये एक अलग तरह का समाज बना रहा है, जो लोगों को आपस में जोड़ने से ज्यादा, तोड़ने वाला परिणाम सामने ला रहा है।
रही बात इमरजेंसी नंबर की तो आपके क्यों न 5000 फेसबुक फ्रेंड्स हों या 2000 इंस्टाग्राम फॉलोअर्स हों। अगर आपने एक स्टोरी डाली, 300 लोगों ने देखी और पसंद करी, लेकिन जिस दिन आप सच में उदास होते हैं या जिस दिन आप अस्पताल में होते हैं, तब क्या उन 5000 ,2000 या 300 में से 5 लोग भी पूछने आते हैं ? अक्सर नहीं।
आज डिजिटल
दुनिया में हम 'कनेक्टेड' तो हैं, पर आपस में'जुड़े' हुए नहीं हैं। क्योंकि कनेक्ट होना, एक बटन दबाने
से होता है, जबकि असलियत यह है कि जुड़ना, दिल से होता है।
एक
रिसर्च कहती है कि आज डिप्रेशन और अकेलेपन के केस इसलिए बढ़ रहे हैं क्योंकि हमारे
पास सुनने वाले कान कम हो गए हैं और बोलने वाले मुंह ज्यादा। हम सब बोलना चाहते
हैं, लेकिन कोई किसी की सुनना नहीं चाहता। यह आज की विडंबना नहीं तो क्या है ?
जब उपरोक्त जैसी स्थितियां हों तब ऐसे
में एक इमर्जेंसी नम्बर वाला इंसान, किसी मनोचिकित्सक से भी ज्यादा बड़ा मरहम बन
सकता है। वह दवा नहीं देता, वह दुआ देता है। वह सलाह नहीं देता, वह साथ देता है।
और कई बार, इस वक्त उसका साथ ही सबसे बड़ी दवा होती है।
हमें समझना होगा और तय करना होगा कि हमें 1000 लाइक्स चाहिए या एक ऐसा इंसान चाहिए जो हमारे रोने पर हमारे पास
आकर बैठ जाए।
7. हम इस संस्कृति को वापस कैसे लाएं ?
यह
सिर्फ एक भावुक लेख नहीं है, यह एक सामाजिक जरूरत है। हमें इस "इमर्जेंसी
नम्बर" की संस्कृति को फिर से जिंदा करना ही होगा ताकि हमारे सामाजिक ताना-बाना का मजबूत आधार एक नए प्रभावशाली रूप में नई पीढ़ी के सामने आए। लेकिन इसकी शुरुआत कहाँ से होगी ?
- घर से:-- अपने बच्चों को सिर्फ अच्छे मार्क्स लाने के लिए मत कहिए। उन्हें सिखाइए कि दोस्त का टिफिन शेयर करना क्या होता है। उन्हें सिखाइए कि क्लास में अगर कोई बच्चा अकेला बैठा है तो उसके पास जाकर बैठना क्या होता है। उन्हें रिश्तों की अहमियत सिखाइए, सिर्फ प्रतियोगिता की नहीं।
- स्कूल, कॉलेज से:-- स्कूलों में एक पीरियड ऐसा भी होना चाहिए जहाँ बच्चे अपने दिल की बात कह सकें। जहाँ उन्हें सिखाया जाए कि दोस्ती का मतलब सिर्फ साथ घूमना नहीं, बल्कि मुश्किल में साथ निभाना है।
- खुद से: आज से एक छोटा सा नियम बनाइए। हफ्ते में एक बार, बिना किसी काम के, किसी पुराने दोस्त, किसी रिश्तेदार, किसी पड़ोसी को फोन कीजिए। बस पूछिए - "कैसे हो ? सब ठीक है ?" यकीन मानिए, आपका यह छोटा सा फोन किसी के लिए बहुत बड़ी हिम्मत बन सकता है।
जब
कोई आपको अपनी परेशानी बताए, तो तुरंत ज्ञान मत दीजिए। बस सुन लीजिए। कई बार लोगों
को समाधान नहीं, सिर्फ एक सुनने वाला चाहिए होता है।
8. अंतिम आत्ममंथन, एक छोटा सा अभ्यास
इस
लेख को यहीं खत्म करने से पहले, मैं चाहता हूँ आप 2 मिनट के लिए सब कुछ छोड़ दें।
फोन को साइलेंट पर रख दें और खुद से ये 5 सवाल पूछें। ईमानदारी से।
(1) क्या मेरे पास कोई इमर्जेंसी नम्बर है ? उस व्यक्ति का नाम अपनी डायरी में लिखिए और
आज ही उसे एक मैसेज कीजिए - "थैंक यू, मेरे जीवन में होने के लिए।"
(2) क्या मैं किसी का इमर्जेंसी नम्बर हूँ ? अगर हाँ, तो उस जिम्मेदारी को और अच्छे से
निभाने का प्रण लीजिए। अगर नहीं, तो आज से किसी एक व्यक्ति के लिए वो बनने की
कोशिश शुरू कीजिए।
(3) क्या मेरे रिश्ते लेन-देन पर टिके हैं या किसी भावना पर ? क्या मैं मदद करने से पहले अपना सिर्फ़ फायदा-नुकसान सोचता हूँ ?
(4) क्या मैं अपने बच्चों को असली अमीरी सिखा रहा हूँ ? क्या मैं उन्हें बता रहा हूँ कि
एक सच्चा दोस्त 100 महंगी चीजों से बेहतर है ?
(5) अगर आज रात को मुझे जरूरत पड़े, तो मैं किसे फोन करूँगा ? इस सवाल का जवाब ही आपकी
असली कमाई की लिस्ट है।
एक जीवन दर्शन
अंत
में, एक बात याद रखिए।
जब हम
इस दुनिया से जाएंगे, तो लोग यह याद नहीं रखेंगे कि हमारे पास कितना बड़ा घर था,
हमारी सैलरी कितनी थी, हमारी गाड़ी कौन सी थी। लोग सिर्फ एक ही बात, न सिर्फ याद रखेंगे बल्कि आम चर्चा करेंगे कि हम कैसे इंसान थे। क्या हम किसी के मुश्किल वक्त में काम आए थे ?
"इमर्जेंसी
नम्बर" सिर्फ एक शब्द नहीं है, यह एक जीवन जीने का तरीका है। यह हमें सिखाता
है कि जीवन का लक्ष्य सिर्फ खुद को ऊँचा उठाना नहीं है, बल्कि दूसरों को गिरने से
बचाना भी है।
असली
सफलता इस बात में नहीं है कि कितने लोग आपको जानते हैं, असली सफलता इस बात में है
कि कितने लोग आपको अपना मानते हैं।
तो आज
से, पैसा कमाने के साथ-साथ, रिश्ते भी कमाइए। प्रमोशन के साथ-साथ, भरोसा भी कमाइए।
फॉलोअर्स के साथ-साथ, कुछ ऐसे लोग भी कमाइए जो आपके लिए, और जिनके लिए आप, किसी भी
इमर्जेंसी में सबसे पहला नम्बर हों।
क्योंकि
आखिर में, यही एकमात्र पूँजी है जो आपके साथ जाएगी, और आपके बाद भी यहीं रह जाएगी, किसी के दिल में, किसी की दुआ में।
आइए, हम सब किसी न किसी के इमर्जेंसी नम्बर बनें। यही हमारी असली कमाई होगी, यही हमारी मानवता होगी,...
लेखक - मनोज कुमार भट्ट, कानपुर
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ईमेल: manojbhatt@samajiktanabana.in
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प्रिय भट्ट जी, आपके सारगर्भित लेख के लिए साधुवाद
जवाब देंहटाएंश्रीमान चंचल जी, बहुत अच्छा लगा, आपकी एक पंक्ति की टिप्पणी का प्रभाव मेरे आगे के लेख के लिए एक नई शक्ति प्रवाह का संकेत है...🌹🙏🌹
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