प्रार्थना और सपना – एक स्वचिंतन
"हे मानव!"
एक गूंजती हुई दिव्य वाणी मेरे अंतर्मन में प्रतिध्वनित हुई....
"तू प्रतिदिन मुझसे प्रार्थना करता है,... एक ऐसे तेजस्वी बालक की याचना करता है, जो तेरे देश को गौरव की ऊँचाइयों तक ले जाए। परंतु सुन, हे मानव! मैं तो हर दिन तेरे समाज में एक 'सूर्यपुत्र' भेजता हूँ... ऐसा बालक जो ऊर्जा, संभावनाओं और दिव्य प्रतिभा से ओतप्रोत होता है... किन्तु तेरा समाज उसे बचा नहीं पाता।"
मैं स्तब्ध था। वाणी पुनः गूंजी....
"हे मानव! उस बालक के लिए तेरा 'समाज' ही वह प्रथम परीक्षा है, जहाँ वह बालक असफल हो जाता है..."
"शैशव काल में उसे भूख और उपेक्षा का स्वाद चखना पड़ता है..."
"बाल्यकाल में उसे शिक्षा के स्थान पर अराजकता मिलती है..."
"किशोर होते ही तेरे समाज की कुरीतियाँ, नशे और दिशाहीनता उसके मार्ग को अंधकारमय कर देती हैं..."
"और यदि किसी चमत्कार से वह युवावस्था तक पहुँच भी गया, तो अवसरों की कमी उसकी आभा को धीमा कर देती है..."
"फिर भी तू मुझसे प्रश्न करता है कि मैंने ऐसा बालक क्यों नहीं भेजा...?"
अब मेरी आँखें नम थीं। ईश्वर बोले –
"यदि तू सचमुच ऐसा बालक चाहता है, तो पहले अपना समाज बदल। उसके लिए एक ऐसी भूमि तैयार कर, जहाँ वह पनप सके, खिल सके, और देश को नई ऊँचाइयों तक ले जा सके।"
उस दिन की अनुभूति आज भी मेरी आत्मा को आंदोलित करती है। क्या आप और मैं मिलकर उस भूमि को तैयार कर सकते हैं...?
लेखक -- मनोज भट्ट, कानपुर
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