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ज़िंदगी बहुत छोटी है – एक सच्चाई जो सोच बदल दे

जीवन यात्रा बहुत छोटी है...

(एक भावुक और प्रेरणादायक कथानक)

सूरज ढल चुका था। काशीपुर बस अड्डे पर धूल और धुएँ का गुबार उठ रहा था। हॉर्न की आवाज़ें, चाय की दुकानों से आती तीखी चाय की महक, और भीड़-भाड़ वाले यात्री, सब कुछ एक-दूसरे में घुलमिल गया था।

रीना ने अपने भारी बैग को कंधे पर लटकाए, पसीने से तर कुरते को ठीक किया और भीड़ में घुस गई। उसकी उम्र पैंतीस के करीब थी। चेहरे पर थकान साफ़ झलक रही थी। ऑफिस की नौकरी, घर की जिम्मेदारियाँ, सास-जेठानी की तीखी बातें और पति की अनदेखी, सब कुछ उसके कंधों पर बोझ की तरह लदा हुआ था।

“काशीपुर से लखनऊ वाली बस... जल्दी चढ़ो!” कंडक्टर चीख रहा था। रीना ने सीट नंबर 12B देखा। विंडो सीट। थोड़ी राहत मिली। लेकिन जब वह बैठी तो उसका बैग अचानक झटके से बगल वाली सीट पर बैठे व्यक्ति के कंधे से टकरा गया। 

“ओह!” हल्की-सी आवाज़ निकली, लेकिन व्यक्ति ने कुछ नहीं कहा। बस हिली, बैग गिरा, फिर रीना ने उसे संभाला। “सॉरी,” उसने जल्दी-जल्दी कहा, लेकिन व्यक्ति मुस्कुराया मात्र। चुप। रीना ने उसे ध्यान से देखा। साठ के आसपास के बुजुर्ग। 

सफ़ेद दाढ़ी, साफ़-सुथरा कुर्ता-पायजामा, आँखों में अजीब-सा सौम्य प्रकाश। उनके पास एक छोटा-सा थैला था, जिसमें शायद कुछ किताबें या दवाइयाँ थीं। वे खिड़की की तरफ़ देखते हुए शांत बैठे थे, जैसे इस दुनिया की किसी भी बात से उन्हें कोई लेना-देना न हो।

बस चल पड़ी। रीना ने अपना फ़ोन निकाला। व्हाट्सएप पर पति का मैसेज  “आज देर हो जाएगी। खाना मत बना।” फिर सास का कॉल, “बहू, दूध लेते आना, भूल न जाना।” रीना ने साँस ली। मन में घबराहट, गुस्सा और थकान का मिश्रण। बैग वाला झटका फिर याद आया।

उसने बुजुर्ग की तरफ़ देखा। “अंकल, मैंने आपको चोट तो नहीं पहुँचाई ? बैग भारी है ना... मैंने ध्यान नहीं दिया।” बुजुर्ग मुस्कुराए। “नहीं बेटी, कोई बात नहीं।”
रीना को अचरज हुआ। आमतौर पर लोग इतनी छोटी-सी बात पर भी चिल्ला उठते हैं। लेकिन यह व्यक्ति ? चुप। शांत। 

उसने फिर पूछा, “फिर भी...आपने कुछ क्यों नहीं कहा, मैंने आपको तकलीफ़ दी।” बुजुर्ग ने धीरे से खिड़की से बाहर देखा। सड़क किनारे के पेड़ तेज़ी से पीछे छूट रहे थे। सूरज की आखिरी किरणें लाल-नारंगी हो चुकी थीं। उन्होंने नरम स्वर में कहा...

“इतनी छोटी-सी बात पर नाराज़ होने की ज़रूरत नहीं, बेटी। हमारी साथ की यात्रा बहुत छोटी है... मैं अगले स्टॉप पर ही उतर रहा हूँ।” रीना स्तब्ध रह गई। बस अभी-अभी चली थी। अगला स्टॉप करीब पंद्रह किलोमीटर दूर था। लेकिन शब्दों में जो गहराई थी, वो उसे छू गई। उसकी आँखें भर आईं।

“अंकल... आपका नाम?”
“बाबू राम शर्मा। लोग मुझे बाबू भईया कहते हैं, लेकिन तुम मुझे बाबू चाचा कह सकती हो” रीना ने अपना भी परिचय दिया। फिर धीरे-धीरे बात बढ़ी। बाबू चाचा ने अपनी जेब से एक छोटी-सी डायरी निकाली। उसमें पुरानी तस्वीरें थीं।

“बेटी, ज़िंदगी बस स्टेशन जैसी है। हर कोई चढ़ता है, उतरता है। कुछ लोग थोड़ी देर साथ चलते हैं, कुछ पूरा सफ़र। लेकिन हर सफ़र छोटा ही होता है।” रीना चुपचाप सुनती रही। बाबू चाचा ने बताना शुरू किया।

“मैंने भी एक ज़माने में बहुत कुछ देखा है। मेरी पत्नी सरला... बहुत अच्छी थी। लेकिन बीमारी ने उसे जल्दी छीन लिया। बेटा और बेटी बड़े हो गए। एक दिन बेटे ने कहा ‘पापा, अब शहर में रहो।’ लेकिन मैंने गाँव नहीं छोड़ा। 

फिर एक दिन बेटे ने कहा, ‘पापा, प्रॉपर्टी का बंटवारा कर लो।’ मैंने सब कुछ दे दिया। बेटी की शादी हुई, वह भी दूर चली गई। फिर पिछले साल बेटा आया। कहने लगा, ‘पापा, तुम्हें अब अकेले रहना ठीक नहीं। ओल्ड एज होम चलो।’ 

मैंने मुस्कुराकर कहा, ‘बेटा, मेरी यात्रा अब बहुत छोटी रह गई है। तुम्हें परेशान नहीं करूँगा।’ ये कहते ही उनका गला भारी हो गया। उनके अंदर का दर्द समझ,
रीना की आँखों में आँसू आ गए। “और आपने सब माफ़ कर दिया ?” रीना ने पूछा।

बाबू चाचा हँसे। “माफ़ करने के लिए क्या था बेटी ? आखिर वे भी मेरे बच्चे थे। गुस्सा करके मैं क्या पाता ? सिर्फ़ अपना ही समय बर्बाद करता। ज़िंदगी इतनी छोटी है कि गुस्से में बिताने लायक भी नहीं।”

बस रुकने वाली थी। बाबू चाचा ने बैग संभाला।
रीना ने कहा, “अंकल, एक स्टॉप और चलते हैं ना... मेरी बात सुन लीजिए।” बाबू चाचा रुक गए। रीना ने अपनी मन की बातें शुरू की। “मेरे पति... एक अच्छे इंसान हैं, पहले बहुत अच्छे थे। 

फिर ऑफिस की एक लड़की से दोस्ती हो गई। मुझे पता चला। मैंने झगड़ा किया, रोया, धमकाया। घर में तनाव। सास कहती हैं, ‘बहू, चुप रहो, पुरुषों की आदत होती है।’ जेठानी मुस्कुराती रहती हैं। मैं हर दिन जलती हूँ। रात को नींद नहीं आती।”

बाबू चाचा ने धीरे से उसका हाथ थामा।“बेटी, देख... बस में ही देख।” उस वक्त बस में एक और घटना हो रही थी। आगे वाली सीट पर दो यात्री झगड़ रहे थे। एक ने दूसरे के पैर पर पैर रख दिया था। गाली-गलौज शुरू हो गई। कंडक्टर दौड़ा। 

बाबू चाचा ने धीरे से कहा, “देखो बेटी, ये दोनों भी सोच रहे हैं कि उनकी यात्रा बहुत लंबी है। लेकिन अगले स्टॉप पर एक उतर जाएगा, दूसरा आगे बढ़ेगा। झगड़ा किस बात का ?” रीना ने देखा। झगड़ा कुछ ही मिनटों में शांत हो गया।

बाबू चाचा ने आगे कहा, “ज़िंदगी में भी यही है। किसी ने दिल तोड़ा, किसी ने धोखा दिया, किसी ने अपमान किया... हम सोचते हैं कि ये घाव कभी नहीं भरेंगे। लेकिन सच तो ये है कि कल किसने देखा है ? आज जो हमारे साथ है, वो कल नहीं भी हो सकता।”

बस एक छोटे से कस्बे में रुकी। बाबू चाचा उतरने लगे।
रीना ने उनका हाथ पकड़ लिया। “अंकल... आप उतर रहे हैं, लेकिन आपने मेरे ज़ख्म पर मरहम लगा दिया। मैं क्या करूँ ? मैं माफ़ कैसे करूँ ?” बाबू चाचा ने मुस्कुराते हुए कहा।

“बस इतना करो, आज शाम को घर जाकर पहले अपने पति को गले लगा लेना। फिर सास को चाय बनाकर देना। जेठानी से हँसकर बात करना। और सबसे ज़रूरी खुद से कहना, ‘रीना, यात्रा बहुत छोटी है।’”

वे उतर गए। रीना खिड़की से उन्हें देखती रही। बाबू चाचा ने हाथ हिलाया और भीड़ में गुम हो गए। बस फिर चली। रीना ने आँखें बंद कीं। सारी यादें घूमने लगीं।
पिछले साल पति का वो मैसेज जो उसने पढ़ लिया था। “आई लव यू” किसी और लड़की को। 

उस रात का रोना। सास का ताना, “तुम्हीं में कुछ कमी होगी।” जेठानी का व्यंग्य, “आजकल की बहुएँ थोड़ा सहना नहीं जानतीं।” लेकिन आज पहली बार उसने सोचा, अगर मैं गुस्सा करके, तनाव लेकर, बदला लेने की सोचकर ज़िंदगी बिताती रही तो आखिर में क्या बचेगा? सिर्फ़ पछतावा।

उसने फ़ोन निकाला। पति को मैसेज किया, “जल्दी आना। आज मैंने खाना बनाया है। तुम्हारा पसंदीदा राजमा-चावल।” फिर सास को कॉल किया। “मम्मीजी, मैं लखनऊ पहुँच गई हूँ। दूध लेती आ रही हूँ। आपकी दवा भी लाई हूँ।”

जेठानी को व्हाट्सएप पर एक इमोजी भेजा, मुस्कुराहट वाला। बस लखनऊ पहुँचने वाली थी। रीना ने खिड़की से बाहर देखा। सड़क किनारे एक बूढ़ा पेड़ खड़ा था। उसकी टहनियाँ हवा में लहरा रही थीं। रीना ने मन-ही-मन कहा, “यात्रा बहुत छोटी है।”

घर पहुँचते ही उसने पति को गले लगाया। पति हैरान था।“आज क्या बात है ?” रीना मुस्कुराई। “कुछ नहीं... बस याद आ गया कि हमारी साथ की यात्रा बहुत छोटी है।”

उस रात रीना ने डायरी में लिखा:
“आज मैंने एक अजनबी से सीखा कि गुस्सा, जलन, बदला और तनाव, ये सब बेकार हैं। क्योंकि हम सब बस यात्री हैं। कोई चढ़ता है, कोई उतरता है। जो आज हमारे साथ है, उसे कल नहीं पता। इसलिए आज ही माफ़ कर दो। आज ही गले लगा लो। आज ही मुस्कुरा दो।”

अगले कुछ महीनों में रीना का जीवन बदल गया।
पति की वो ऑफिस वाली लड़की खुद ही दूर चली गई। पति ने माफी माँगी। सास ने कहा, “बहू, तू तो पहले से अलग है।” जेठानी भी अब उससे सलाह लेने लगी।
एक दिन रीना ने अपने ब्लॉग “सामाजिक ताना-बाना” पर लिखा:

“दोस्तों, आज मैं आपको एक सच्ची कहानी सुनाना चाहती हूँ। बस में हुई एक छोटी-सी घटना ने मेरी पूरी ज़िंदगी बदल दी। रामू काका नाम के एक बुजुर्ग ने मुझे सिखाया कि ‘यात्रा बहुत छोटी है’।

हम रोज़ सोशल मीडिया पर लड़ते हैं, परिवार में बोलते हैं, ऑफिस में जलते हैं, ट्रैफिक में गाली देते हैं। लेकिन क्या पता, आज शाम को जो हमारा सबसे ज़्यादा प्रिय है, वो कल हमारे पास न हो। किसी ने दिल तोड़ा ? शांत रहो। 

किसी ने धोखा दिया ? आराम करो। किसी ने अपमान किया ? नज़रअंदाज़ कर दो।क्योंकि हमारी साथ की यात्रा बहुत छोटी है।” रीना की ये पोस्ट वायरल हो गई। हजारों लोग कमेंट करने लगे।

एक महिला ने लिखा, “मेरे पति ने मुझे छोड़ दिया था। आज मैंने उन्हें फोन करके माफ़ कर दिया।” एक युवक ने लिखा, “मेरे बॉस ने मुझे बेवजह डाँटा। मैंने इस्तीफा देने की सोची थी। अब मैंने सोचा, यात्रा बहुत छोटी है।”
एक बुजुर्ग ने लिखा, “मैं अपने बेटे से बीस साल से बात नहीं कर रहा था। आज मैंने उन्हें फोन किया।”

रीना रो पड़ी। उसने सोचा बाबू राम शर्मा जी, बाबू चाचा, शायद आज भी किसी बस में किसी और को ये संदेश दे रहे होंगे। काशीपुर बस अड्डे पर फिर शाम ढल रही थी। एक नई बस खड़ी थी। लखनऊ से काशीपुर।
भीड़ में एक और महिला चढ़ रही थी। 

उसके बैग से किसी की कोहनी टकराई। वो मुस्कुराई और बोली, “सॉरी।” उसके बगल में बैठे युवक ने कहा, “कोई बात नहीं बहन... यात्रा तो बहुत छोटी है।”

रीना की कहानी अब हर बस में, हर घर में, हर दिल में फैल रही थी। क्योंकि सचमुच...यात्रा बहुत छोटी है।

अंत में मेरा ये पत्र पढ़ने वालों के लिए एक छोटी-सी  बात, दोस्तों, आज शाम को अपने सबसे प्रिय इंसान को एक मैसेज ज़रूर कर देना, “मैं तुम्हें बहुत प्यार करता/करती हूँ। यात्रा बहुत छोटी है... चलो, आज से ज़्यादा मुस्कुराते हैं।”

आपकी ज़िंदगी भी प्यार, क्षमा और आनंद से भरी रहे।
मुस्कुराते रहिए। 🙏  

(मेरा संदेश, सामाजिक ताना-बाना ब्लॉग मेरे पाठकों के लिए)

आपकी रीना
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लेखक - मनोज कुमार भट्ट, कानपुर 
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एक प्रासंगिक लेख,"स्वार्थ और लालच से बिखरता सामाजिक ताना-बाना..."पढ़ने के लिए शीर्षक पर क्लिक करें 🙏

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