वर्किंग पेरेंट्स और सिसकता बचपन

एक ग्राफिक जिसमें वर्किंग पेरेंट्स हाथ में बैग और लैपटॉप लिए बाहर आधुनिक शहर की ओर भाग रहे हैं और पीछे घर के दरवाजे पर एक छोटा बच्चा अकेला उदास बैठा है, साथ ही लेखक मनोज कुमार भट्ट और वेबसाइट samajiktanabana.in का नाम लिखा है।


 वर्किंग पेरेंट्स और सिसकता बचपन 

गगनचुंबी इमारतें और खोते हुए आँगन

इक्कीसवीं सदी का वैश्विक समाज विकास के उस शिखर पर है, जहाँ तकनीक, आर्थिक समृद्धि और करियर की ऊँची उड़ान ने इंसानी जीवन को सुगम, तीव्र और वैभवशाली बना दिया है। आज के आधुनिक माता-पिता के पास अपने बच्चों को देने के लिए बेहतरीन अंतरराष्ट्रीय स्कूल हैं, आधुनिकतम इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स हैं, महंगे ब्रांडेड कपड़े हैं और विदेशों में छुट्टियाँ बिताने के असीमित साधन हैं। 

लेकिन इस चौंधिया देने वाली चमक-दमक के पीछे, आधुनिक घरों के बंद आलीशान कमरों से एक खामोश सिसकी भी निरंतर सुनाई दे रही है। यह सिसकी किसी शारीरिक चोट की नहीं, बल्कि एक ऐसे गहरे, अंधकार वाले दमघोंटू अकेलेपन की है जिसमें आज का नौनिहाल बचपन तिल-तिल कर दम तोड़ रहा है।

"वर्किंग पेरेंट्स... घर में सिसकता बचपन और बाहर करियर की ऊँची उड़ान"

यह केवल एक सामान्य सामाजिक विषय नहीं है, बल्कि आधुनिक वैश्विक सभ्यता का सबसे बड़ा और भयावह अंतर्विरोध है। एक तरफ माता-पिता का अपने करियर को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का, समाज में एक विशिष्ट मुकाम हासिल करने का और परिवार को हर भौतिक सुख देने का सपना है, तो दूसरी तरफ घर पर माता-पिता के जीवंत स्पर्श, उनकी ममतामयी लोरी और उनकी सुरक्षित गोदी के लिए तरसता हुआ, सिसकता हुआ बचपन है।

वैश्विक समाज के इस संक्रमण काल में आज हमें ठहरकर यह अनिवार्य सवाल पूछना होगा कि जिस भविष्य यानी हमारे बच्चों को संवारने के लिए आज हम दिन-रात एक कर रहे हैं, कहीं उस भविष्य की बुनियादी दीवारें ही तो खोखली नहीं हो रहीं ? क्या हम सुख-सुविधाओं का एक विशाल अंबार लगाने के चक्कर में मानवीय संस्कारों, पारस्परिक संवेदनाओं और आत्मिक संबंधों का गला तो नहीं घोंट रहे हैं ? 

इस लेख का उद्देश्य इसी वैश्विक संकट के हर उस कोने को टटोलना है जिसे हम अक्सर व्यस्तता के पर्दों के पीछे छिपा देते हैं।

1. करियर की अंतहीन दौड़ और 'गिल्ट' के साए में परवरिश

आधुनिक वैश्विक अर्थशास्त्र ने जीवन जीने की न्यूनतम लागत को इतना बढ़ा दिया है कि एक मध्यमवर्गीय या उच्च-मध्यमवर्गीय परिवार के लिए दोनों साथियों का कमाना अब महज एक शौक या व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं, बल्कि एक अनिवार्य आर्थिक मजबूरी बन चुका है।

वहीं दूसरी ओर, वैश्विक कॉर्पोरेट जगत की बढ़ती महत्वाकांक्षाएं, चौबीस घंटे चालू रहने वाली अर्थव्यवस्था (24/7 Economy) और 'वर्कहोलिक' (ऐसा व्यक्ति जो काम में इतना डूबा रहता है कि उसकी ज़िंदगी का संतुलन बिगड़ जाता है) संस्कृति ने माता-पिता को एक ऐसी भूलभुलैया में धकेल दिया है, जहाँ से बाहर निकलने का रास्ता सीधे उनके बच्चों के मासूम बचपन की बलि मांगता है।

सुबह अलार्म की कर्कश आवाज के साथ शुरू होने वाला दिन, लैपटॉप की नीली स्क्रीन और अंतहीन जूम मीटिंग्स पर जाकर खत्म होता है। इस भागदौड़ के बीच, बच्चा कब सोकर उठा, उसने नाश्ते में क्या खाया, वह स्कूल में किस मानसिक दौर से गुजरा, या आज उसका मन उदास क्यों था, यह जानने-समझने का समय और धैर्य किसी के पास नहीं बचा है। समाज ने प्रगति का जो पैमाना तय किया है, उसमें एक सफल एम्पलाई या बिजनेसमैन बनने की होड़ में एक सफल माता-पिता बनने का दायित्व बहुत पीछे छूट गया है।

कामकाजी माता-पिता का आंतरिक द्वंद्व (The Parent's Dilemma)

ऐसा बिल्कुल नहीं है कि कामकाजी माता-पिता निष्ठुर हैं या उन्हें अपने बच्चों से प्रेम नहीं है। सच तो यह है कि वे हर पल एक भयानक, अनवरत आंतरिक युद्ध लड़ रहे होते हैं। इसे आधुनिक मनोवैज्ञानिक भाषा में 'पैरेंटिंग गिल्ट' (Parenting Guilt) या अपराधबोध का साया कहा जाता है।

दफ्तर के किसी महत्वपूर्ण प्रेजेंटेशन या बोर्ड मीटिंग में बैठी हुई माँ का ध्यान बार-बार इस चिंता पर जाता है कि उसके बच्चे ने समय पर दूध पिया या नहीं, या वह आया की देखरेख में सुरक्षित है या नहीं। दूसरी ओर, पिता को किसी बिजनेस डील के दौरान अचानक याद आता है कि आज उसके बेटे का स्कूल में एनुअल फंक्शन या खेल प्रतियोगिता थी, जहाँ वह अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करा सका। यह अपराधबोध उनके भीतर एक स्थायी तनाव पैदा करता है।

इस आत्मग्लानि और अपराधबोध को मिटाने के लिए आधुनिक माता-पिता अक्सर एक आत्मघाती और मनोवैज्ञानिक रूप से त्रुटिपूर्ण रास्ता चुनते हैं, वे अपने 'समय' और 'उपस्थिति' के अभाव को 'भौतिक वस्तुओं' और 'महंगे उपहारों' से बदलने की कोशिश करते हैं।
बच्चा जब भी माता-पिता के साथ बैठने या खेलने की जिद करके रोता है, तो उसे एक नया रोबोटिक खिलौना, प्लेस्टेशन या स्मार्टफोन थमा दिया जाता है। 

माता-पिता को लगता है कि उन्होंने बच्चे की इच्छा पूरी कर दी, लेकिन वैश्विक बाल मनोवैज्ञानिकों का स्पष्ट मानना है कि कोई भी मशीन, कोई भी स्क्रीन या कोई भी महंगा खिलौना, माँ के आंचल की ठंडी छांव और पिता की पीठ पर मिलने वाली सुरक्षात्मक थपकी का विकल्प कभी नहीं हो सकता।

2. एकल परिवार (Nuclear Family) का संकट और 'डिजिटल आया' का साम्राज्य

यदि हम इतिहास के पन्नों को पलटें और कुछ दशक पहले के समाज को देखें, तो पाते हैं कि यदि माता-पिता कामकाजी होते भी थे, तो घर में दादा-दादी, चाचा-चाची, बुआ या ताई का एक विस्तृत सामाजिक सुरक्षा कवच मौजूद होता था। बच्चा कभी भी खुद को अकेला या परित्यक्त महसूस नहीं करता था। माँ यदि काम पर जाती थी, तो दादी उसे अपनी पुरानी कहानियाँ सुनाकर, गोद में थपकी देकर सुला देती थी। 

पिता यदि व्यस्त होते थे, तो दादाजी उसे उंगली पकड़कर दुनिया के व्यावहारिक संस्कार सिखाते थे। लेकिन तीव्र शहरीकरण, औद्योगिक विकास और पश्चिमी व्यक्तिवादी संस्कृति के अंधानुकरण ने संयुक्त परिवारों के उस सुदृढ़ सामाजिक ताने-बाने को पूरी तरह से छिन्न-भिन्न कर दिया है।

आज के महानगरों के कंक्रीट के फ्लैट्स 'अकेलेपन के ठंडे टापू' बन चुके हैं। जब माता-पिता सुबह अपनी 9 से रात 9 बजे की कॉर्पोरेट शिफ्ट के लिए चमचमाती गाड़ियों में निकलते हैं, तो उनके पीछे घरों में छूट जाता है एक भारी, डरावना सन्नाटा। और उस सन्नाटे को भरने के लिए, या कहें कि बच्चे को व्यस्त रखने के लिए, कुछ कृत्रिम और यांत्रिक साधनों को काम पर लगा दिया जाता है।

क्रैच (Creche) और डे-केयर की यांत्रिक दुनिया

वैश्विक स्तर पर डे-केयर और कमर्शियल क्रैच का कारोबार आज अरबों डॉलर का रूप ले चुका है। आधुनिक कामकाजी माता-पिता अपनी गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा भारी-भरकम फीस के रूप में चुकाकर अपने छह महीने के मासूम कलेजे के टुकड़े को भी पेशेवर आयाओं के भरोसे छोड़ देते हैं। 

इन डे-केयर सेंटर्स में बच्चे की शारीरिक देखभाल, जैसे उसे समय पर खाना खिलाना, डायपर बदलना या सुला देना, तो व्यावसायिक सटीकता के साथ हो सकती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या ये संस्थान बच्चे को वह आत्मिक और भावनात्मक सुरक्षा दे सकते हैं जो केवल एक परिवार के भीतर ही संभव है?

वहाँ बच्चा एक जीवित भावना नहीं, बल्कि एक 'टोकन नंबर' या 'कस्टमर' बनकर रह जाता है। उसे रोने पर प्यार से चूमने वाला, उसकी सिसकी को भांपकर उसे सीने से लगाने वाला कोई नहीं होता। वहाँ सब कुछ एक कठोर टाइम-टेबल के हिसाब से संचालित होता है, जो बच्चे के कोमल मानस को भी बचपन में ही यांत्रिक और भावना-शून्य बना देता है।

डिजिटल नैनी (Digital Nanny) का उभरता खतरा

जब बच्चे इन डे-केयर सेंटर्स से थके-हारे घर आते हैं, तब तक उनके माता-पिता भी दफ्तर की राजनीति और काम के बोझ से इतने शारीरिक और मानसिक रूप से टूट चुके होते हैं कि उनमें बच्चे से बात करने, उसकी बातें सुनने या उसके साथ फर्श पर बैठकर खेलने की रत्ती भर भी ऊर्जा नहीं बचती। ऐसे में अपनी शांति और आराम के लिए, वे बच्चे के लिए 'स्क्रीन' (स्मार्टफोन, टैबलेट, यूट्यूब, वीडियो गेम्स) को 'डिजिटल आया' के रूप में नियुक्त कर देते हैं।

वैश्विक मनोवैज्ञानिकों की गंभीर चेतावनी

जब एक दो या तीन साल का बच्चा, जिसके मस्तिष्क के न्यूरॉन्स का विकास हो रहा होता है, अपनी भावनाओं और जिज्ञासाओं को व्यक्त करने के बजाय स्क्रीन पर तेजी से बदलते हुए कृत्रिम रंगों और आवाजों में खो जाता है, तो उसका संज्ञानात्मक (Cognitive) और भावनात्मक विकास पूरी तरह अवरुद्ध हो जाता है। ऐसे बच्चे बोलना बहुत देर से सीखते हैं (Speech Delay), उनमें दूसरों के प्रति सहानुभूति (Empathy) की भारी कमी होने लगती है, और वे एक आभासी, आत्मकेंद्रित और कृत्रिम दुनिया के एकाकी नागरिक बनकर रह जाते हैं।

3. वैश्विक दृष्टिकोण: विभिन्न महाद्वीपों में बचपन का बदलता स्वरूप

यह संकट केवल किसी एक शहर, देश या संस्कृति तक सीमित नहीं है। यह एक वैश्विक महामारी की तरह पूरी दुनिया के बचपन को अपनी चपेट में ले रहा है। हालाँकि, अलग-अलग महाद्वीपों और संस्कृतियों में इसके रूप और सामाजिक दुष्परिणाम भिन्न-भिन्न दिखाई देते हैं:

एशियाई समाज का संक्रमण (The Asian Transition)

भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे एशियाई देशों में पारंपरिक रूप से परिवार को समाज की सबसे पवित्र और मजबूत इकाई माना जाता था। यहाँ संयुक्त परिवार बच्चों के मानसिक विकास के लिए एक अचूक ढाल थे। लेकिन आर्थिक उदारीकरण और वैश्विक कंपनियों के आगमन के बाद इन देशों में एकल परिवारों की एक अनियंत्रित बाढ़ सी आ गई है।
  • जापान का संकट: जापान में कामकाजी दबाव और सामाजिक अकेलेपन का स्तर इतना बढ़ चुका है कि वहाँ के बच्चे और युवा खुद को पूरी तरह से समाज से काट लेते हैं। इस मनोवैज्ञानिक स्थिति को वहाँ 'हिकीकोमोरी' (Hikikomori) कहा जाता है, जहाँ बच्चा महीनों तक अपने कमरे से बाहर नहीं निकलता और किसी से संवाद नहीं करता।
  • भारत की स्थिति: भारत में, कड़ाके की व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा और माता-पिता की महत्वाकांक्षाओं के बीच कामकाजी माता-पिता अपने बच्चों को बहुत कम उम्र में ही घर के स्नेहिल वातावरण से दूर बोर्डिंग स्कूलों या कोटा जैसे बड़े कोचिंग हब की मशीनी दुनिया में झोंक रहे हैं, जहाँ बचपन अवसाद की भेंट चढ़ रहा है।
पश्चिमी देशों का ढांचागत अकेलापन (Western Structural Isolation)

अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के देशों में माता-पिता के कामकाजी होने पर बच्चों का पूरा बचपन 'ऑर्गेनाइज्ड एक्टिविटीज' (संस्थागत और प्रायोजित गतिविधियों) के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गया है। वहाँ बच्चों के पास वह 'फ्री-प्ले' (उन्मुक्त, बेलगाम खेल) का समय ही नहीं है जो भारत के गांवों या कस्बों में गलियों में दिखाई देता था।

पश्चिमी देशों में बच्चों की जिंदगी एक कॉर्पोरेट कैलेंडर की तरह चलती है, उन्हें कब किस दोस्त से मिलना है, इसके लिए माता-पिता पहले आपस में 'प्ले-डेट' तय करते हैं, कब सॉकर प्रैक्टिस पर जाना है, कब क्लास जिम्नास्टिक की है, सब कुछ पूर्वनिर्धारित होता है। 

इस अत्यधिक व्यवस्थित, व्यावसायिक लेकिन भावना-शून्य जीवनशैली ने पश्चिमी बचपन में क्रोनिक एंग्जायटी, अकेलेपन और मानसिक असुरक्षा को इस कदर बढ़ा दिया है कि वहाँ बहुत छोटी उम्र से ही बच्चों को एंटी-डिप्रेसेंट दवाइयाँ दी जा रही हैं।

अति-प्रतिस्पर्धा का चीनी और दक्षिण कोरियाई मॉडल

चीन (विशेषकर शहरी क्षेत्रों में) और दक्षिण कोरिया में वर्किंग पेरेंट्स अपने करियर की दौड़ के साथ-साथ बच्चों के शैक्षणिक करियर को लेकर भी एक सनक और पागलपन की हद तक प्रतिस्पर्धी दौर से गुजर रहे हैं। समय न दे पाने की अपनी कमी और अपराधबोध को ये माता-पिता बच्चों पर चौबीस घंटे पढ़ाई और असाइनमेंट्स का भारी दबाव बनाकर पूरा करते हैं।

दक्षिण कोरिया में रात-रात भर चलने वाले प्राइवेट ट्यूशन सेंटर्स (जिन्हें 'हागवॉन' कहा जाता है) इस बात के गवाह हैं कि कैसे कॉर्पोरेट माता-पिता का बचपन खेल के मैदानों से पूरी तरह गायब होकर एक 'एकेडमिक प्रेशर कुकर' में तब्दील हो चुका है, जिसके कारण वहाँ किशोरों में आत्महत्या की दर वैश्विक स्तर पर सबसे डरावनी है।

4. बचपन का अवसाद (Childhood Depression) और व्यवहारिक विकृतियां

जब घर की चारदीवारी के भीतर सिसकते, तन्हा बचपन की आवाज को सुनने वाला कोई नहीं होता, तो वह दबी हुई सिसकी धीरे-धीरे समय के साथ एक गंभीर, लाइलाज मानसिक बीमारी और व्यवहारिक विकृति का रूप ले लेती है। 

आज वैश्विक स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट्स भी इस बात की तस्दीक करती हैं कि बच्चों में डिप्रेशन, क्लिनिकल एंग्जायटी और व्यवहारिक विकृतियों के मामले अपने ऐतिहासिक रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुके हैं।

सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि कामकाजी माता-पिता अपनी व्यस्तता और थकावट के कारण बच्चों के व्यवहार में आने वाले इन मूक, मनोवैज्ञानिक बदलावों को पहचान नहीं पाते और उनकी गलत सामाजिक या अनुशासनात्मक व्याख्या कर बैठते हैं:

चिड़चिड़ापन और जिद्दीपन बनाम संवाद की पुकार

जब कोई बच्चा छोटी-छोटी बातों पर चीखने-चिल्लाने लगता है, खिलौने फेंकने लगता है या अत्यधिक रोने लगता है, तो अमूमन माता-पिता आपस में या समाज में यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि "बच्चा बहुत जिद्दी, बदतमीज और असंस्कारी हो गया है, इस पर किसी की डांट का असर नहीं होता।" लेकिन मनोवैज्ञानिक गहराई से देखें तो यह बच्चे का जिद्दीपन नहीं, बल्कि उसके भीतर जमा हुआ वह अकेलापन है जो अब गुस्से के ज्वालामुखी बनकर बाहर निकल रहा है।

ईटिंग डिसऑर्डर्स (Eating Disorders) का सच

अकेलेपन और असुरक्षा की भावना के कारण बच्चों में ईटिंग डिसऑर्डर्स बहुत तेजी से पनप रहे हैं। या तो बच्चा खाना पूरी तरह से छोड़ देता है और कुपोषण का शिकार होने लगता है, या फिर वह अपनी उदासी और खालीपन को भरने के लिए अत्यधिक मात्रा में जंक फूड, चॉकलेट्स और कार्बोनेटेड ड्रिंक्स का सेवन करने लगता है (Binge Eating)।

माता-पिता इसे केवल 'आजकल के बच्चों के नखरे और फास्ट फूड के प्रति आकर्षण' मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि यह बच्चे के मानसिक तनाव का एक बड़ा शारीरिक लक्षण होता है।

अलगाव और आक्रामकता

जब कोई बच्चा स्कूल या बाहर से आने के बाद खुद को अपने अंधेरे कमरे में बंद कर लेता है, कंप्यूटर स्क्रीन पर हिंसक वीडियो गेम्स खेलने लगता है और परिवार के सदस्यों के साथ किसी भी प्रकार के सीधे संवाद से बचने लगता है, तो कामकाजी माता-पिता अक्सर इसे यह सोचकर सकारात्मक मान लेते हैं कि "चलो अच्छा है, वह शांति से बैठा है और अपनी पढ़ाई या गैजेट्स में व्यस्त है, हमें परेशान नहीं कर रहा।"

इसी तरह, जब वही बच्चा स्कूल में अपने सहपाठियों के साथ बिना किसी ठोस कारण के मारपीट, गाली-गलौज या अत्यधिक आक्रामक व्यवहार करने लगता है, तो सारा दोष स्कूल के माहौल या 'खराब संगति' पर मढ़ दिया जाता है। 

जबकि हकीकत यह है कि बच्चा इन तमाम नकारात्मक और आक्रामक विकृतियों के माध्यम से केवल और केवल अपने माता-पिता का ध्यान (Attention) अपनी ओर खींचने का एक अंतिम, हताश प्रयास कर रहा होता है। 

वह अपनी हरकतों से चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा होता है, "कृपया अपनी फाइलें बंद कीजिए, अपना फोन रखिए, मुझे देखिए, मुझसे बात कीजिए, मुझे इस वक्त आपकी सबसे ज्यादा जरूरत है!" लेकिन आधुनिक जीवन की अंधी दौड़ में दौड़ते माता-पिता इस मूक, दर्दभरी भाषा को समझ नहीं पाते।

5. 'क्वालिटी टाइम' का भ्रम और अपेक्षाओं का भारी बस्ता

आधुनिक कामकाजी माता-पिता और कॉर्पोरेट जगत ने अपनी आत्मा को संतुष्ट करने और अपने अंतःकरण के अपराधबोध को शांत करने के लिए एक बहुत ही भ्रामक और छद्म जुमले का आविष्कार किया है, "हम बच्चों को क्वांटिटी (समय की मात्रा) नहीं दे पाते तो क्या हुआ, हम उन्हें 'क्वालिटी टाइम' (गुणवत्तापूर्ण समय) देते हैं।"

वे इस मुगालते में जीते हैं कि हफ्ते में छह दिन भले ही वे सुबह बच्चे के जागने से पहले दफ्तर निकल जाएं और रात को उसके सोने के बाद घर लौटें, लेकिन रविवार या किसी छुट्टी के दिन उसे किसी बड़े, चमचमाते मॉल में ले जाना, किसी पांच सितारा मल्टीप्लेक्स में कोई नई एनिमेटेड फिल्म दिखाना, गेमिंग जोन में हजारों रुपये खर्च करना और अंत में किसी महंगे रेस्तरां में पिज्जा-बर्गर खिला देना ही 'क्वालिटी टाइम' की इतिश्री है।

यह पूरी तरह से एक व्यावसायिक और पूंजीवादी भ्रम है। पैरेंटिंग (परवरिश) कोई कॉर्पोरेट प्रोजेक्ट, तिमाही टारगेट या कोई बिजनेस डील नहीं है जिसे हफ्ते में किसी एक दिन कुछ घंटे की 'रिव्यू मीटिंग' या 'आउटिंग' करके सफलतापूर्वक पूरा किया जा सके। 

मानवीय संबंधों और विशेषकर बचपन को विकसित होने के लिए रोज थोड़ी-थोड़ी मात्रा में माता-पिता की निरंतर, सहज और जीवंत उपस्थिति की आवश्यकता होती है। बच्चे को रविवार के महंगे मॉल के बजाय रोज रात को सोते समय अपनी माँ के मुंह से सुनी जाने वाली परियों या राजा-रानी की वह कहानी चाहिए होती है।

जिसमें नैतिक संस्कार छिपे होते हैं। उसे स्कूल से आने के बाद दोपहर में अपनी टूटी हुई पेंसिल, अपने दोस्त से हुए छोटे से झगड़े या अपनी क्लास टीचर की तारीफ को बताने के लिए एक ऐसा कान चाहिए होता है जो बिना किसी फोन कॉल के व्यवधान के सिर्फ उसी की बात सुने।

'सुपरचाइल्ड' बनाने का जानलेवा वैश्विक दबाव

इस समस्या का एक और अत्यंत चिंताजनक और भयावह पहलू यह है कि जो माता-पिता बच्चों को अपना समय और भावनात्मक संबल नहीं दे पाते, वे अनजाने में बच्चों पर अपनी अधूरी आकांक्षाओं या महत्वाकांक्षाओं का एक भारी, जानलेवा बोझ लाद देते हैं। 

उनके भीतर एक अघोषित व्यावसायिक गणित काम करने लगता है, "चूंकि हम दिन-रात हाड़-तोड़ मेहनत करके बच्चे की हर आर्थिक जरूरत पूरी कर रहे हैं, उसे शहर के सबसे महंगे स्कूल में पढ़ा रहे हैं, उसे हर सुख-सुविधा दे रहे हैं, इसलिए यह बच्चे का फर्ज है कि वह क्लास में हमेशा 'टॉप' आए, वह पियानो बजाने में भी उस्ताद हो, वह स्केटिंग और कराटे में भी गोल्ड मेडलिस्ट हो, और वह हर क्षेत्र में एक 'सुपरचाइल्ड' बनकर दिखाए।"

इस प्रकार, समय और स्नेह न दे पाने की अपनी कमी को पेरेंट्स बच्चों से 'परफेक्ट' और 'सर्वगुण संपन्न' होने की उम्मीद करके वसूलना चाहते हैं। आधुनिक बचपन इस दोहरे, जानलेवा दबाव के पाटों के बीच पूरी तरह से पिस जाता है, एक तरफ अकेलेपन की वो मूक सिसकी जो अंदर ही अंदर उसे खोखला करती है, और दूसरी तरफ माता-पिता की उम्मीदों का वो पहाड़ जो उसे खुलकर सांस भी नहीं लेने देता।

6. वैश्विक नीतियां, कॉर्पोरेट संस्कृति और समाधान की व्यावहारिक रूपरेखा

यह अत्यंत गंभीर सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संकट अब केवल किसी एक व्यक्ति, एक परिवार या एक शहर की निजी समस्या नहीं रह गया है। यह समूचे वैश्विक मानव समाज के अस्तित्व, उसकी संवेदनशीलता और उसकी आने वाली नस्लों के भविष्य से जुड़ा एक व्यापक संकट है। इसलिए, इसके स्थायी और प्रभावी समाधान के लिए हमें भी व्यक्तिगत पारिवारिक स्तर से लेकर वैश्विक कॉर्पोरेट और संस्थागत स्तरों पर क्रांतिकारी प्रयास करने होंगे।

कॉर्पोरेट जगत और सरकारों की नीतियां

यदि हम वैश्विक पटल पर देखें, तो स्कैंडिनेवियाई और नॉर्डिक देशों (जैसे स्वीडन, नॉर्वे, फिनलैंड) ने इस दिशा में पूरे विश्व के सामने एक बेहद अनुकरणीय और मानवीय मिसाल पेश की है। इन देशों की सरकारें और कॉर्पोरेट घराने 'वर्क-लाइफ बैलेंस' (कार्य और व्यक्तिगत जीवन के बीच संतुलन) को लेकर बेहद सख्त और संवेदनशील कानून अपनाते हैं। 

उदाहरण के तौर पर, स्वीडन में बच्चे के जन्म पर माता-पिता को मिलाकर कुल 480 दिनों की लंबी सवैतनिक पैरेंटल लीव (Paid Parental Leave) मिलती है, जिसे माँ और पिता अपनी सुविधा के अनुसार आपस में साझा कर सकते हैं। वैश्विक समाज को, विशेषकर विकासशील देशों को, इसी तर्ज पर अपनी श्रम नीतियों (Labor Laws) पर व्यापक पुनर्विचार करना होगा:
  • लचीले कार्य घंटे और हाइब्रिड मॉडल (Flexible & Hybrid Work): कॉर्पोरेट जगत को अब केवल मुनाफे की अंधी दौड़ से बाहर निकलकर 'वर्क फ्रॉम होम' या हाइब्रिड कार्यप्रणाली को एक स्थायी संस्कृति के रूप में बढ़ावा देना चाहिए। इससे माता-पिता अपने पेशेवर दायित्वों को पूरा करने के साथ-साथ घर पर शारीरिक रूप से उपस्थित रहकर बच्चों की गतिविधियों पर नजर रख सकते हैं और उन्हें एक सुरक्षित माहौल दे सकते हैं।
  • पैटर्निटी लीव (Paternity Leave) की अनिवार्यता: समाज में सदियों से चली आ रही इस रूढ़िवादी धारणा को बदलना होगा कि बच्चे की परवरिश और उसके भावनात्मक विकास की पूरी जिम्मेदारी केवल माँ की है। पिताओं को भी शुरुआती और विकासात्मक दिनों में बच्चे के साथ जुड़ने, उसकी देखभाल करने के लिए अनिवार्य और पर्याप्त पैटर्निटी लीव मिलनी चाहिए, ताकि 'फादर-चाइल्ड बॉन्डिंग' की नींव मजबू होसकेके।
  • कार्यस्थल पर ऑन-साइट चाइल्ड केयर और क्रैच: हर बड़े कॉर्पोरेट दफ्तर, सरकारी कार्यालय, कारखाने या व्यावसायिक परिसर के भीतर ही एक अत्यधिक सुरक्षित, आधुनिक, स्वच्छ और संवेदनशील डे-केयर सेंटर या क्रैच का होना कानूनी रूप से अनिवार्य किया जाना चाहिए। इससे यह फायदा होगा कि कामकाजी माता-पिता (विशेषकर माताओं) का तनाव कम होगा, वे अपने लंच ब्रेक या खाली समय में जाकर अपने बच्चे से मिल सकेंगी, उसे अपना दूध पिला सकेंगी और बच्चा भी अपनी माँ की धड़कनों और सांसों के करीब रहकर बिना किसी डर के बड़ा हो सकेगा।
व्यक्तिगत स्तर पर पांच सूत्रीय पारिवारिक संकल्प (The 5-Step Resolution)

संस्थागत नीतियों से इतर, यदि हम वास्तव में चाहते हैं कि हमारे अपने घरों से अकेलेपन की सिसकियों की जगह बचपन की निश्चल और मधुर खिलखिलाहट दोबारा गूंजे, तो हर कामकाजी माता-पिता को अपने दैनिक जीवन में इन पांच व्यावहारिक बदलावों को तुरंत और दृढ़ता के साथ लागू करना होगा:

1. दैनिक डिजिटल डिटॉक्स (Digital Detox):

 दफ्तर से घर लौटने के बाद, घर के दरवाजे पर कदम रखते ही कम से कम पहले दो से तीन घंटों के लिए अपने स्मार्टफोन, टैबलेट और लैपटॉप को पूरी तरह से साइलेंट करके एक अलग कमरे या अलमारी में बंद कर दें। वह समय आपके दफ्तर का, आपके क्लाइंट्स का या सोशल मीडिया के वर्चुअल दोस्तों का नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ आपके उस बच्चे का होना चाहिए जो दिनभर से आपकी राह तक रहा था।

2. सक्रिय और गहन श्रवण (Active Listening):

 जब आपका बच्चा स्कूल से आने के बाद या शाम को आपको अपनी कोई छोटी सी कहानी, अपने किसी दोस्त की बात या कोई शिकायत बताए, तो हाथ में फोन लेकर या टीवी देखते हुए केवल औपचारिक रूप से सिर हिलाना बंद करें। 

उसके पास, उसकी ऊंचाई के बराबर घुटनों के बल बैठें, उसकी आँखों में आँखें डालें, उसकी मासूमियत को महसूस करें और उसकी बात को पूरी तन्मयता से सुनें। उसके छोटे-छोटे सुख-दुख, उसकी टूटी हुई कार या खोई हुई इरेज़र आपके लिए भले ही बेहद मामूली और हास्यास्पद चीजें हों, लेकिन उसके कोमल मानस के लिए वही उसकी पूरी कायनात हैं।

3. अनिवार्य पारिवारिक रस्में (Family Rituals)

अपने घर में कुछ ऐसे नियम और रस्में बनाएं जो अपरिवर्तनीय हों। उदाहरण के लिए, दिन में कम से कम एक बार का भोजन, अधिकांशतः रात का खाना, पूरा परिवार एक साथ डाइनिंग टेबल या जमीन पर बैठकर खाएगा। इस दौरान घर का टीवी, स्मार्टफोन या कोई भी इलेक्ट्रॉनिक गैजेट पूरी तरह से बंद रहेगा। इस समय केवल और केवल दिनभर के खट्टे-मीठे अनुभवों और पारिवारिक गपशप का आदान-प्रदान होना चाहिए।

4. पारस्परिक दोषारोपण का अंत (No Blame Game): 

कामकाजी माता और पिता, दोनों अक्सर काम के तनाव में बच्चे की किसी भी समस्या या व्यवहारिक विकृति के लिए एक-दूसरे पर लापरवाही का आरोप लगाने लगते हैं। माँ कहती है कि "तुम्हारे पास बिजनेस से फुर्सत नहीं है", तो पिता कहता है कि "तुम अपने करियर के चक्कर में घर पर ध्यान नहीं देतीं"। 

इस अंतहीन कलह को तुरंत बंद करना होगा। यह समझना होगा कि पैरेंटिंग कोई एकल दौड़ नहीं, बल्कि एक मुस्तैद टीम वर्क (Team Work) है, जहाँ दोनों को मिलकर जिम्मेदारियों और समय का सूझबूझ से बंटवारा करना होता है।

5. प्राथमिकताओं का गंभीर पुनर्मूल्यांकन: 

जीवन के किसी न किसी मोड़ पर आकर हर महत्वाकांक्षी व्यक्ति को बहुत ठंडे दिमाग से यह तय करना ही होगा कि करियर की वो कौन सी ऊँची उड़ान है जो आपके अपने बच्चे के मासूम बचपन की कीमत पर आपको मिल रही है। 

हमेशा याद रखिए कि कॉरपोरेट जगत में आपका पद, आपका इंक्रीमेंट, आपका प्रमोशन या आपकी नई व्यावसायिक डील आपको जीवन में दोबारा या कुछ समय बाद भी मिल सकती है, लेकिन आपके बच्चे का वो मासूम, सिसकता हुआ बीता हुआ बचपन, उसकी वो तोतली जुबान और उसका वो भोलापन दुनिया की तमाम दौलत लुटाने के बाद भी कभी किसी बाजार से लौटकर वापस नहीं आ सकेगा।

अंततः निष्कर्ष: एक सजग, संवेदनशील और जीवंत समाज का आह्वान

"बदलते कदमों की दिशा" को यदि हमने आज वैश्विक और पारिवारिक स्तर पर नहीं संभाला, यदि हमने आज अपनी प्राथमिकताओं के रुख को नहीं बदला, तो आने वाली इंसानी पीढ़ियां तकनीक के मामले में अत्यंत आधुनिक, आर्थिक रूप से बेहद संपन्न और बौद्धिक रूप से बहुत मजबूत तो जरूर होंगी।

लेकिन वे आत्मिक, नैतिक और भावनात्मक रूप से पूरी तरह से दिवालिया, संवेदनशून्य और खोखली हो जाएंगी। हम एक ऐसा समाज कतई नहीं बनाना चाहते जहाँ हाड़-मांस के रोबोटिक इंसानों की एक ऐसी अंधी फौज खड़ी हो, जिनके पास बड़ी-बड़ी डिग्रियां और तीक्ष्ण बुद्धि तो हो, लेकिन दूसरों के दर्द को महसूस करने वाला एक संवेदनशील हृदय न हो।

करियर की ऊँची उड़ान जरूर भरिए, आकाश की असीम ऊंचाइयों को छूना और सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित करना हर जागरूक इंसान का बुनियादी अधिकार है और समाज की प्रगति के लिए यह आवश्यक भी है। लेकिन इस उड़ान के बीच अपने घोंसले के आधार को मत भूलिए। 

हमेशा याद रखिए कि प्रकृति का एक छोटा सा परिंदा भी जब दिनभर आसमान नापने और दाने की खोज में भटकने के बाद शाम को ढलते सूरज के साथ अपने छोटे से घोंसले की तरफ वापस लौटता है, तो उसके नन्हे-मुन्ने बच्चे उसकी चोंच में मौजूद दाने से ज्यादा, उसकी पंखों की गर्माहट, उसकी ममतामयी छुअन और उसकी उपस्थिति का बेसब्री से इंतजार कर रहे होते हैं।

आइए, हम सब मिलकर इस आधुनिक दौर की अंधी दौड़ से खुद को कुछ पलों के लिए खींचें, अपने व्यस्ततम और व्यस्त समय से कुछ अनमोल पल चुराकर उस बंद कमरों में अकेले सिसकते, खामोश बचपन के पास जाकर बैठें, उसके माथे को चूमकर उसके बहते आंसुओं को अपने हाथों से पोंछें और उसे यह अटूट विश्वास दिलाएं कि इस पूरी विशाल कायनात में उसके लिए सबसे कीमती, सबसे सुरक्षित और सबसे सुंदर चीज उसके माता-पिता का साथ, उनका समय और उनका असीम स्नेह है।

जब हमारे घरों से सिसकियों का ये दौर खत्म होगा और बचपन दोबारा अपनी सहज मुस्कान के साथ चहकेगा, तभी हमारा सामाजिक ताना-बाना सचमुच सुरक्षित, सुदृढ़ और जीवंत रह सकेगा, और तभी हमारे बच्चे एक स्वस्थ, खुशहाल, मानवीय और संवेदनशील वैश्विक कल का निर्माण करने में समर्थ हो सकेंगे।

लेखक - मनोज कुमार भट्ट
कानपुर, उत्तर प्रदेश
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 मनोज भट्ट, कानपुर "सामाजिक ताना-बाना" ब्लॉग वेबसाइट: www.samajiktanabana.in ईमेल: manojbhatt@samajiktanabana.in
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