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फौजी: जीते जी उपेक्षा, शहादत पर श्रद्धांजलि

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फौजी: जीते जी उपेक्षा, शहादत पर श्रद्धांजलि   एक कठोर सत्य और चिंतन जब कोई फौजी शहीद होता है, तो पूरा देश एक स्वर में उसकी वीरगति पर श्रद्धांजलि अर्पित करता है। तिरंगे में लिपटी उसकी देह पर फूल बरसाए जाते हैं, सड़कें बंद हो जाती हैं, सोशल मीडिया पर भावुक पोस्ट्स वायरल होते हैं, नेता मंच से भाषण देते हैं, और स्कूलों में बच्चे “सैनिक हमारा गौरव है”,"जय जवान जय किसान" जैसे नारे लगाते हैं।  लेकिन असलियत ये है कि किसान और जवान के अपने परिवार के अंदर चल रही रोजमर्रा के जीवन की परेशानियों से समाज में किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता और ऐसे में उनकी कितनी जय है, ये भी सब जानते हैं। क्या हमने कभी ठहरकर यह सोचा है कि जब वही फौजी अपनी वर्दी में सांस लेता हुआ, अपने परिवार के साथ होता है, तब समाज उसके साथ क्या व्यवहार करता है ? क्या उसे या उसके परिवार को वह सम्मान, वह सहानुभूति और वह सहयोग मिलता है, जिसका वह वाकई हकदार है ? लेकिन वहीं उसकी शहादत की खबर सुनते ही क्षणिक भीड़ अचानक उमड़ पड़ती है। क्यों...? यह प्रश्न दुखद है, लेकिन जरूरी है। यह हमारी सामाजिक चेतना की परीक्षा है। यह लेख केवल ए...

मानवता के भविष्य की खोज

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मानवता के भविष्य की खोज बिखरता ताना-बाना....​ वो सुनहरे धागे , जो अब कहीं खो गए से लगते  हैं... ​ किसी भी समाज का निर्माण ईंट और पत्थरों से नहीं , बल्कि इंसानी भावनाओं , विश्वास और एक - दूसरे के प्रति समर्पण से होता है । एक समय था जब हमारे मानवीय समाज के   ताने - बाने की बुनावट बेहद खूबसूरत और मजबूत हुआ करती थी । अगर हम कुछ दशक   पीछे मुड़कर देखें , तो हमें एक ऐसा समाज नजर आता है , जिसकी नींव में आधुनिकता की चकाचौंध भले ही न हो , लेकिन मानवीय संवेदनाओं की गहराई अथाह थी । ​ कल का वो समाज , जिसे हमने पीछे छोड़ दिया... तब अधिकांश  घरों में ताले नहीं होते थे , बल्कि लोगों के दिलों में एक - दूसरे  की सुरक्षा के प्रति, कर्तव्य वाली सोंच की  जगह हुआ करती थी । जीवन में आज जैसी भागदौड़ और ' गलाकाट प्रतियोगिता ' नहीं थी । सफलता का पैमाना यह नहीं था कि आपने कितने लोगों को पीछे छोड़ा , बल्कि यह था कि आपने कितने लोगों को साथ लेकर चले ।   और ...

रुपया कमाना सरल, खर्च करना कठिन

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रुपया कमाना सरल, खर्च करना कठिन बुद्धिमानी से खर्च, वित्तीय अनुशासन का मार्ग यह वाक्य सुनने में उलटा लगता है। हर कोई कहता है कि पैसा कमाना सबसे कठिन काम है। क्योंकि लोग सुबह से शाम तक पसीना बहाते हैं, तब जाकर दो पैसे हाथ में आते हैं। फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि कमाना सरल है और खर्च करना कठिन है।  पर जीवन को गहराई से देखने पर यह बात बिल्कुल सच निकलती है कि पैसा कमाने का रास्ता सीधा है, मेहनत करो, समय दो, हुनर दिखाओ और बदले में पैसा लो। इसमें नियम साफ हैं। पर पैसा हाथ में आने के बाद जो शुरू होता है, वही असली परीक्षा है क्योंकि खर्च करने के लिए कोई नियम की किताब नहीं है, इसलिय वहाँ आपका मन ही, आपका सबसे बड़ा शत्रु और सबसे बड़ा मित्र बन जाता है। इस बात से सभी भली भांति परिचित हैं कि धन संपत्ति को संभालना, आग को संभालने जैसा है। अगर संभाल लिया तो घर में उजाला होगा, भोजन पकेगा, सर्दी में गरमी मिलेगी। लेकिन अगर उसे बुद्धिमत्ता से नहीं संभाला और खुला छोड़ दिया तो वही धन की आग सब कुछ जला कर राख कर देगी।

एक वर्ष का सफर: 'सामाजिक ताना-बाना', मेरे संघर्ष और आपका स्नेह

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एक वर्ष का सफर: 'सामाजिक ताना-बाना', तकनीकी उलझनें और आपका साथ .... प्रिय पाठकों, नमस्कार! आज का दिन मेरे लिए बहुत ही खास और भावुक कर देने वाला है। ठीक एक वर्ष पहले, आज ही की तारीख में मैंने 'सामाजिक ताना-बाना' ब्लॉग की शुरुआत की थी। जब मैंने इस यात्रा का पहला कदम उठाया था, तो मेरे पास केवल शब्द थे और समाज के यथार्थ को उकेरने की एक प्रबल इच्छा। एक लेखक के लिए पन्नों पर भावनाएं उकेरना शायद आसान होता है, लेकिन एक डिजिटल प्लेटफॉर्म को स्थापित करना मेरे लिए किसी चुनौती से कम नहीं था। मुझे आज भी याद है कि कैसे मैंने बिना किसी बाहरी तकनीकी सहायता के, अकेले ही इस ब्लॉग की रूपरेखा तैयार की।  इसके लेआउट को संवारने से लेकर 'पब्लिश' बटन दबाने तक की उलझनें, थीम सेट करने की जद्दोजहद और कई रातों की तकनीकी माथापच्ची, ये सब मेरे लिए बिल्कुल नया था। कई बार झल्लाहट भी हुई, लेकिन मेरे भीतर मौजूद समाज के विभिन्न पहलुओं पर बात करने की तड़प मुझे रुकने नहीं दे रही थी। इस एक साल के सफर में, हमने और आपने मिलकर हमारे समाज के कई अनछुए और संवेदनशील पहलुओं पर गहरा संवाद किया है। चाहे बात.......