भौतिकतावाद में सिमटती संवेदनाएं
भौतिकतावाद में सिमटती संवेदनाएं
भटकाव का चक्रव्यूह
“जब इंसान अंदर से पूरी तरह खाली और भटका हुआ हो जाता है, तो वह उस भयानक खालीपन को बाहर की निर्जीव वस्तुओं और व्यर्थ के शोर से भरने की कोशिश करता है।”
हां यह सच है कि आज का इंसान इतना ज्यादा व्यस्त रहता है, जितना पहले कभी नहीं था। लेकिन सच यह भी है कि इतनी व्यस्तताओं के बाद भी वह जितना आज अकेला है उतना पहले कभी अकेला और खाली नहीं रहा।
चारों तरफ रोशनी है, स्क्रीन्स चमक रही हैं, आवाजें गूंज रही हैं, लेकिन अंदर एक सन्नाटा है जो दिन-ब-दिन गहरा होता जा रहा है। और इस भयावह सन्नाटे में आज का इंसान भटक गया है। लेकिन यह भटकाव कोई संयोग मात्र नहीं है।
पूरी दुनिया में अधिकांश सत्ता के शासकों द्वारा अपनी सत्ता को लंबे समय निर्बाध रूप से संचालित करने के लिए पर्दे के पीछे ऐसी गुप्त कूटनीति ( मनोरंजन की अफीम का चक्रव्यूह ) बनाई जाती है कि जिससे आम जन मानस, खासकर युवा वर्ग उसमें उलझ कर अपने मूल उद्देश्य से भटक जाए। जिसका उल्लेख इस लेख में विस्तार से आगे है।
इस लेख में हम इन विचारों को विस्तार से समझेंगे, भारतीय संदर्भ में उनके प्रभावों को देखेंगे, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय आयामों पर चर्चा करेंगे, और अंत में उस रास्ते की तलाश करेंगे जो हमें इस चक्र से बाहर निकाल सके। यह लेख सरल शब्दों में लिखा गया है, ताकि हर कोई इसे समझ सके और सोच सके।
भटकाव का चक्रव्यूह:-- सत्ता, स्वार्थ और 'मनोरंजन की अफीम'
इतिहास गवाह है कि किसी भी समाज का पतन अचानक नहीं होता। यह सत्ताधीशों के द्वारा अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए गुप्त रणनीतिक नीतियों को लागू करने से धीरे-धीरे, चरणबद्ध तरीके से होता है। ताकि आम जन मानस अपने मुख्य मुद्दों जैसे शिक्षा, सुरक्षा रोजगार और महंगाई आदि को गौड़ समझने लगे और भटकाव के लिए बनाए गए कृत्रिम मुद्दों में उलझ जाए।
उसी के लिए विशेष रूप से युवा पीढ़ी को लक्ष्य बना कर उन्हें धीरे धीरे असली मुद्दों से दूर रखने के लिए 24 घंटे का एक मनोरंजन वाला कृत्रिम शोर तैयार किया गया है। जिसमें युवा पीढ़ी तो जबरदस्त जकड़ ही चुकी है, दुःख की बात है कि हर आयु वर्ग इस चक्रव्यूह में फँस चुका है।
मोबाइल और सोशल मीडिया के लिए नेटवर्क, टीवी के सैकड़ों चैनल में हर तरह की सामग्री, नुकसानदेह और जानलेवा लत लगाने वाले खेल, फिल्में, धार्मिक और राजनैतिक सहित नाना प्रकार के महोत्सव। इस तरह की वास्तविकताओं की भरमार है और ये सब प्रत्यक्ष रूप में तो हम सब कर रहे हैं, किंतु परोक्ष में सत्ता होती है।
यही भौतिकतावाद की जड़ है, जहां संवेदनाओं की कोई जगह नहीं हो सकती। और ये सब कुछ इस तरह के शोर का हिस्सा हैं, जो बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक, सब के लिए सागर में उत्पन्न होने वाले भँवर में फंसने जैसा है। जिसमें हम सब न चाहते हुए भी धीरे धीरे इसी में फंसते चले जा रहे हैं। जिससे निकलना असंभव सा है।
सोशल मीडिया ने युवाओं को हिप्नोटाइज कर दिया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, 13-17 साल के किशोर रोजाना औसतन 4 घंटे से ज्यादा समय सोशल मीडिया पर बिताते हैं। जबकि शोध के आंकड़े बताते हैं कि तीन घंटे से ज्यादा इस्तेमाल करने वाले युवाओं में डिप्रेशन और एंग्जायटी का खतरा दोगुना हो जाता है। भारत में भी यही हाल है।
मोबाइल में स्क्रॉल करते-करते रात कट जाती है, फिर सुबह उठकर असली जिंदगी का सामना करने की हिम्मत नहीं बचती, क्योंकि सारी ऊर्जा तो रात तक खत्म हो जाती है। लाइक्स, कमेंट्स और फॉलोअर्स की लत ने असली रिश्तों को कमजोर कर दिया है।
खेल प्रतियोगिताएं अब सिर्फ खेल नहीं रहीं। आईपीएल, वर्ल्ड कप जैसे आयोजन महीनों तक युवाओं को बांधे रखते हैं। स्टेडियम में चीखना-चिल्लाना, टीवी पर चिपके रहना, यह सब एक तरह का नशा बन चुका है। हमारे नीति निर्माता, युवाओं को मानसिक रूप से व्यस्त रखने के लिए इन आयोजनों को भी अपना हथियार बनाते हैं।
अब हर तरह के उत्सवों का राजनीतिकरण हो गया है। दीवाली, होली, गणेश चतुर्थी, हर त्योहार अब वोट बैंक और प्रचार का माध्यम बन गया है। नारे लगते हैं, झंडे फहरते हैं, लेकिन असली संदेश खो जाता है, एकता, प्रेम और सादगी का संदेश। और हम सब इसी में उलझ कर महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और अराजकता जैसे
अपने महत्वपूर्ण मूल मुद्दों को नेपथ्य में रख देते हैं।
व्यवस्था ने युवाओं को 'नागरिक' से 'उपभोक्ता' बना दिया है। एक तरफ नौकरियों की कमी और शिक्षा का बोझ, दूसरी तरफ फोन में अनंत स्क्रॉल। उसका नतीजा यह सामने आने लगा है कि अब युवा सोचने-समझने के बजाय प्रतिक्रिया देने लगे हैं।
इसके बावजूद भी अगर कोई मुद्दा उठता है तो ट्रोलिंग शुरू हो जाती है। जीवन को प्रभावित करने वाली असली बहस तो लगभग गायब सी हो गई है। सत्ता और कॉर्पोरेट दोनों को बस यही चाहिए, व्यस्त, खुश और उनके अनुरूप नियंत्रित जनता।
यह चक्रव्यूह कितना गहरा है ? मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि खालीपन को भरने की यह कोशिश 'डोपामाइन लूप' पैदा करती है। हर नोटिफिकेशन, हर लाइक एक छोटी खुशी देता है, लेकिन लंबे समय में संतुष्टि नहीं। इंसान मशीन की तरह स्क्रॉल करता रहता है, लेकिन अंदर कुछ नहीं बदलता।
रिश्तों का बाजारीकरण और भावनाओं पर 'प्राइस टैग'
इस तरह के भटकाव ने हमें भौतिकतावाद की ओर धकेल दिया है। आज प्यार, सम्मान और दोस्ती का पैमाना पैसा बन गया है। महंगे गिफ्ट्स, लग्जरी डिनर, विदेशी ट्रिप, ये सब रिश्तों की गहराई मापने के साधन हो गए हैं। हम हर रिश्ते को बाजार और भौतिक नियमों के तराजू में तौलने लगे हैं।
पहले प्यार में समय देना, ध्यान देना, सुनना महत्वपूर्ण था। धीरे धीरे जब समय बदला तो हम भी बदले। अब 'क्या गिफ्ट किया' यह पूछा जाता है। जन्मदिन हो, शादी हो या किसी भी प्रयोजन का उत्सव, हर मौके पर महंगा प्रदर्शन। इससे रिश्तों की आत्मा निकल गई है। वे अब ट्रांजेक्शन (लेन-देन) बन गए हैं।
कभी भारतीय समाज में उपहार देना एक निःस्वार्थ प्रेम का प्रतीक था। मां के हाथ का बना खाना, पिता की कहानी, दोस्त का साझा वक्त, ये सब सस्ते तो थे लेकिन अमूल्य थे। आज 'रिटर्न गिफ्ट' की परंपरा ने सब बदल दिया। शादी में दुल्हन पक्ष गिफ्ट देता है तो दूल्हा पक्ष तुरंत रिटर्न गिफ्ट। इससे संदेश जाता है, “कर्ज चुका दिया।”
खुशी की जगह तनाव आ गया। लोग बजट बनाते हैं, लिस्ट बनाते हैं, और कोई भी आयोजन एक बिजनेस इवेंट जैसा हो जाता है। यह दिखावा समाज को दो हिस्सों में बांट रहा है। अमीर तो चमक-दमक दिखाते हैं, मध्यम वर्ग कर्ज लेकर मुकाबला करता है, और गरीब बाहर से देखता रह जाता है। नतीजा यह निकलता है कि लोग ईर्ष्या, तनाव और टूटे रिश्तों का अदृश्य बोझ ढोते रहते हैं।
उधार की जिंदगी, 'दिखावे' के लिए कर्ज (EMI Culture) का जाल
आज इंसान अपनी चादर देखकर पैर नहीं पसारता, पड़ोसी की चादर देखकर कर्ज ले लेता है। यही कारण है कि आज समाज में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक में क्रेडिट कार्ड, पर्सनल लोन, EMI, ये शब्द आम हो गए हैं। कर्ज लेकर घी पीने वाली एक पुरानी कहावत, वास्तविकता का रूप लेती दिख रही है।
भारत में घरेलू कर्ज जीडीपी का 40% से ज्यादा पहुंच गया है। स्मार्टफोन, कार, घर, छुट्टियां, सब EMI पर।
70% आईफोन भारत में EMI पर बिकते हैं। लोग ये पूछते नहीं हैं कि “क्या मैं इसे खरीद सकता हूं ?”, बल्कि यह पूछते हैं कि “EMI कितनी आएगी ?” और यही आदत हमें बैंक की किस्त चुकाने वाली मशीन बना रही है। हर महीने सैलरी आती है तो पहले EMI कटती है, फिर बचा हुआ पैसा खर्च होता है। बचत ? भविष्य ? ये शब्द गायब हो गए।
खतरनाक दिखावे का दबाव और उसका परिणाम
सोशल मीडिया पर विज्ञापन और फोटो देखकर पहले तो लोग प्रभावित होते हैं फिर कर्ज लेकर शादी, देश विदेश घूमने का ट्रिप या महंगे गैजेट खरीदते हैं। फिर शुरू होता है तनाव, आपसी झगड़े और कभी-कभी आत्महत्या तक। इस चक्रव्यूह में मध्यम वर्ग सबसे ज्यादा फंस रहा है। सपनों की पूर्ति उधार पर हो रही है, पर वास्तविकता में नींद उड़ गई है।
यह सब कृत्रिम बनाई गई संस्कृति, लोगों को व्यक्तिगत स्तर पर ही नहीं, बल्कि पूरे समाज को प्रभावित कर रही है। लोगों को लुभावने वाला आर्थिक माहौल बनाया गया, जिससे लोग जोखिम लेने लगे हैं, शेयर मार्केट में कर्ज लेकर निवेश, फैंटसी गेमिंग पर सट्टा। लेकिन जब EMI नहीं चुक पाएंगे तो क्या होगा ? बैंक नीलामी, परिवार का टूटना और सामाजिक बदनामी अलग से।
सिमटता समय और मृत होती संवेदनाएं
वर्तमान दौर में हम तत्काल संतुष्टि (instant gratification) की दौड़ में अंधाधुंध प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर दोहन कर रहे हैं। हर क्षेत्र में प्लास्टिक, फास्ट फैशन, फास्ट फूड, सब कुछ 'अभी और यहीं' का नारा लेकर आया है। उसके दुष्परिणाम भी हमारे सामने आने लगे हैं। विकास के नाम पर भी सिर्फ विनाश देखने को मिल रहा है।
समय भी सिमट गया है। परिवार साथ बैठकर खाना नहीं खाते। सबके हाथ में फोन। बच्चे मां-बाप से ज्यादा स्क्रीन से जुड़े हैं। संवेदनाएं मर रही हैं। किसी की पीड़ा देखकर मदद करने की बजाय वीडियो बनाकर वायरल करने की होड़ है। empathy (संवेदना) घट रही है। अध्ययनों से पता चलता है कि भौतिकवादी लोग दूसरों की कम परवाह करते हैं।
भटकाव के चक्रव्यूह में फँसने के बाद हम सभी को समझ आ जानी चाहिए कि हम सबको चक्रव्यूह में फंसाने वाले तो दूसरे स्वार्थी तत्व होते हैं किंतु रिश्तों में गहराई हमारी आपस में कम हुई है। बुजुर्ग अकेले हैं, बच्चे स्क्रीन्स में खोए हैं। पड़ोसी से बातचीत बंद। समाज में अलगाव बढ़ रहा है।
बहुआयामी प्रभाव, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक
मनोवैज्ञानिक प्रभाव: लगातार भटकाव की दुनिया में रहने से हमारी ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम हो रही है। युवा छोटी-छोटी बातों पर उत्तेजित हो जाते हैं। अब डिप्रेशन, एंग्जायटी, नींद की समस्या आम बीमारी का रूप ले चुकी है, कारण स्पष्ट है, हमारी निर्भरता गिफ्ट्स और लाइक्स की गिरफ्त में हो गई है।
सामाजिक प्रभाव: परिवार टूट रहे हैं। तलाक बढ़ रहे हैं। दोस्ती सतही हो गई है। आपसी सामंजस्य और सामुदायिकता की भावना खत्म सी है। राजनीति में वैमनस्यता पूर्ण ध्रुवीकरण बढ़ा क्योंकि लोग सोचने के बजाय भावनाओं में बह जाते हैं।
आर्थिक प्रभाव: कर्ज का जाल अर्थव्यवस्था को कमजोर कर है। जब लोग EMI में फंसेंगे तो खपत घटेगी, निवेश कम होगा। बैंकिंग सिस्टम पर दबाव बढ़ेगा। हर तरफ असमानता बढ़ रही है, अमीर और गरीब के बीच खाई चौड़ीभोटी जा रही है।
सांस्कृतिक प्रभाव: विश्व भर में हमारी भारतीय संस्कृति की सादगी, संतोष और निःस्वार्थ सेवा की परंपरा खतरे में है। आज का इंसान वसुधैव कुटुम्बकम का विचार भूल गया है। हम ग्लोबल कल्चर की नकल करते जा रहे हैं, उसके नुकसान का बिना विश्लेषण किये या समझे।
पर्यावरणीय प्रभाव: भौतिकतावाद ने सभी उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों को लूटा है। जिसके दुष्परिणाम स्वरूप जल संकट, वायु प्रदूषण, जैव विविधता का नुकसान हमारे सामने मुंह फैलाए खड़ा। आने वाली पीढ़ियां हमें क्या कहेंगी ? हम ये सब सोचते ही नहीं हैं कि आगामी पीढ़ी को उनके भविष्य के धरातल हेतु हम विरासत में क्या छोड़ कर जाएंगे।
कहानियां, जो हमें बहुत कुछ सिखाती हैं
कल्पना कीजिए एक ऐसे युवक की जिसकी अच्छी नौकरी है, लेकिन फोन पर हर दिन उसका कम से कम 5 घंटे बीतता है। दोस्तों के साथ सिर्फ पार्टी। शादी समारोह में महंगे गिफ्ट्स को महत्व देता है, कार, घर जैसी अधिकांश संपत्ति EMI पर । फिर अचानक एक दिन उसकी नौकरी चली जाती है, EMI नहीं चुक पाई।
जल्द ही परिवार टूटने लगता है, अंदर खालीपन बढ़ने लगता है और देखते ही देखते एक दिन उसका सब कुछ चला जाता है ये कहानियां रोज हो रही हैं।
बाहर निकलने का रास्ता
निहित स्वार्थ वाला यह भटकाव का चक्रव्यूह जो हमारे लिए बनाया गया है, वह हमेशा के लिए अजेय नहीं है। उसके लिए हमें कुछ बदलाव के उपाय करने ही होंगे, जो अंदर से शुरू होता है, उसे अपनाना ही होगा, तभी हम सब इस चक्रव्यूह को तोड़ सकते हैं।
- डिजिटल डिटॉक्स: रोज कुछ घंटे फोन दूर रखें और उसी दौरान प्रकृति में समय बिताएं।
- संतोष की संस्कृति: "जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है", के इस सिद्धांत पर खुश और संतुष्ट रहना सीखें। जरूरत और चाहत में फर्क समझें।
- रिश्तों में समय लगाएं: रिश्तों में गिफ्ट के महत्व की बजाय आपसी रिश्तों में ध्यान दें। एक दूसरे से बातें करें और एक दूसरे को ध्यान से सुने।
- कर्ज से बचें: अत्यंत महत्वपूर्ण बात, जहाँ तक हो सके, मासिक के साथ साथ भविष्यगत खर्चों का बजट बनाएं, "छोटी बचत, लंबी बचत" के सिद्धांत पर आज ही से बचत की शुरुआत करें, छोटी छोटी खुशियां, जी भर कर जी लें।
- संवेदनाएं जगाएं: "संवेदना", मानव होने का पहल मूल तत्व है। संवेदनशील बनिये और वक्त पर दूसरों की मदद करें। स्वयंसेवा करें।
- शिक्षा और जागरूकता: स्कूलों में सिर्फ पास होने का प्रमाण पत्र ही शिक्षित होना नहीं होता मूल्य आधारित शिक्षा प्राप्त करिए। आज कल मीडिया के प्रति सजगता भी साक्षरता का ही एक रूप है।
- समुदाय बनाएं: आस पड़ोस के लोगों को साथ लेकर परिवार, समाज और देश की स्थिति पर चर्चा हेतु नियमित बैठकें आयोजित करें। इससे सामूहिकता की ताकत का एहसास होता है, सब मिल कर साझा त्योहार, बिना दिखावे के मनाएं।
" व्यक्तिगत" स्तर पर बदलाव "सामूहिक क्रांति" ला सकता है। सरकारें नीतियां बना सकती हैं और सोशल मीडिया रेगुलेशन, कर्ज पर नियंत्रण, पर्यावरण शिक्षा। लेकिन असली बदलाव हममें है।
अंत में निष्कर्ष: जागो, क्योंकि समय कम है
स्वार्थी सत्ता का भटकाव वाला यह चक्रव्यूह हमें अंधा बना रहा है। भौतिकतावाद ने हमारी संवेदनाओं को सिकोड़ दिया है। लेकिन इंसान की असली ताकत उसके अंदर है, प्रेम, करुणा, सोचने की क्षमता।
हम अगर इस खालीपन को बाहर की चीजों से भरने की बजाय अंदर की रोशनी से भरें, तो बदलाव संभव है। त्योहार मनाएं सादगी से, रिश्ते निभाएं निःस्वार्थ भाव से, समय बिताएं प्रियजनों के साथ, और संसाधनों का सदुपयोग करें।
“खालीपन को भरने की कोशिश मत करो। उसे समझो।” जब हम अपने भटकाव को पहचान लेंगे, तभी हम सही रास्ते पर चल सकेंगे। जागरूकता ही पहला कदम है। साझा करें, सोचें, और बदलाव शुरू करें। 🙏
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वेबसाइट: www.samajiktanabana.in
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