मुखौटों का बाजार
मुखौटों का बाजार
इंसानी समाज में मुखौटों का बाजार
हम सब बाजार जाते हैं, दुकानों पर सामान देखते हैं, पर एक बाजार ऐसा भी है जो दिखता नहीं, पर हर गली, हर मोहल्ले, हर ऑफिस, हर सोशल मीडिया की स्क्रीन पर लगा हुआ है। वह है, इंसान द्वारा पहने गए "मुखौटों का बाजार" और यह बाजार दिन पर दिन महंगा होता जा रहा है। यहां तक कि आज के पूरे विश्व में सबसे बड़ा बाजार यदि किसी चीज का गर्म है, तो वह है "मुखौटों का बाजार"।
विभिन्न प्रकार के मुखौटे और उनकी कीमत
आज समाज में लगभग हर इंसान तरह तरह के मुखौटे लगाए हुए है। लोगो की असलियत को जो मुखौटा सफलता पूर्वक सबसे ज्यादा और दीर्घकालिक छुपा देता है, उसकी कीमत सबसे अधिक होती है। कुछ मुखौटे ज्यादा दिन तक असलियत नहीं ढक पाते हैं, स्वाभाविक रूप से उसकी कीमत कम होगी। एक मुखौटा पारदर्शी होता है, जिसकी कीमत नकारात्मक में चली जाती है। ऐसे मुखौटे पहले ही दिन से इंसान की असलियत को ढक पाने में असमर्थ होते हैं।
इसका अर्थ ये है कि जो इंसान अपनी असलियत को छुपाने के लिए जितना अच्छा मुखौटा लगायेगा, समाज में उसकी गुडविल उतनी ही ज्यादा होगी। और वो उतना ही प्रभावशाली बनकर परिवार में, समाज में और देश में अपना स्थान ऊँचे पायदान पर स्थापित करने में सफल होकर अपनी कई पीढ़ियों के लिए एक मजबूत धरातल तैयार कर देता है।
कंपनी की बैलेंस शीट के मुखौटे
आपने कभी किसी कंपनी की बैलेंस शीट देखी है ? उसमें एक शब्द आता है, गुडविल। गुडविल का मतलब होता है कंपनी की साख, उसकी इज्जत और बाजार में उसका नाम। यह कोई मशीन नहीं है, कोई इमारत नहीं है, इसे हाथ से छू नहीं सकते, यह अदृश्य है। पर फिर भी कंपनी अपनी बैलेंस शीट में इसे एक संपत्ति के रूप में दिखाती है, जिसकी एक बड़ी कीमत होती है।
इस तरह की गुडविल की कीमत बढ़ाने के लिए कपनियां क्या नहीं करती हैं, आम जन मानस को प्रभावित करने के लिए चकाचौंध कर देने वाले विज्ञापन तैयार करती है और कई बार भ्रामक भी। बड़े-बड़े वादे करती है, अपनी पैकेजिंग चमकदार बनाती है, जिससे उसके उपभोक्ता आसानी से उसके ग्राहक सूची में शामिल हो जाएं।
ठीक यही हाल आज हमारे समाज का हो गया है। कुछ अपवाद छोड़ दें तो आज लगभग समाज का हर इंसान अपनी खुद की एक कंपनी बन गया है और उसका नाम है, "मैं" और इस "मैं" नाम की कंपनी की बैलेंस शीट में एक अदृश्य संपत्ति, गुडविल जुड़ गई है, जिसे हम सब मुखौटा के नाम से समझ सकते हैं।
पहले इंसान की कीमत उसके चरित्र से तय होती थी, उसकी सच्चाई से, उसके कर्म से। आज इंसान की कीमत उसके मुखौटे से तय हो रही है। और जैसे कंपनी चाहती है कि उसकी गुडविल की कीमत रोज बढ़े, वैसे ही आज का इंसान भी चाहता है कि उसके मुखौटे की कीमत रोज बढ़ती रहे। उसके लिए वह तरह तरह के स्वाँग करता है।
वह चाहता है कि लोग उसके लिए तालियां बजाएं, लोग उसकी वाह-वाही करें, लोग उसे अपने से बड़ा समझें, सफल समझें, अपने से अधिक ज्ञानी समझें, धार्मिक समझें, भले ही वह अंदर से वैसा हो ही नहीं। और इसी कोशिश में इंसान सुबह से शाम तक अपने मुखौटों को पॉलिश करके चमकाता रहता है।
ये मुखौटे हैं कैसे ?
ये मुखौटे कई तरह के हैं, और हम सबने इन्हें देखा भी है और कभी पहना भी है।
पहला मुखौटा -- सफलता का मुखौटा है। अंदर से व्यक्ति टूटा हुआ है, कर्ज में है, परेशान है, पर बाहर दिखाएगा कि वह सबसे ज्यादा सुखी है। महंगी घड़ी, महंगी गाड़ी, बड़ी-बड़ी बातें, सोशल मीडिया पर हँसते हुए फोटो। उसे लगता है कि अगर उसने अपनी परेशानी दिखा दी तो समाज में उसकी कीमत कम हो जाएगी।
दूसरा मुखौटा -- ज्ञान का मुखौटा है। कुछ पढ़ा नहीं, समझा नहीं, पर हर विषय पर ऐसे बोलेगा जैसे उसी ने दुनिया बनाई हो। दो किताबों के नाम सुनकर चार लोगों को ज्ञान देगा। उसे ज्ञानी बनना नहीं है, ज्ञानी दिखना है।
तीसरा मुखौटा -- अच्छाई और समाजसेवा का मुखौटा है। यह सबसे महंगा मुखौटा है। अंदर स्वार्थ भरा है, पर बाहर दान, धर्म, सेवा का बोर्ड लगा रखा है। कैमरे के सामने गरीब को रोटी देगा, और कैमरा बंद होते ही उसी गरीब को धक्का दे देगा। मदद इसलिए नहीं करता कि सामने वाले का भला हो, मदद इसलिए करता है ताकि उसकी फोटो खिंच जाए और चार लोग उसे अच्छा कहें।
चौथा मुखौटा -- धर्म और संस्कार का मुखौटा है। मुँह पर बड़ी-बड़ी धार्मिक बातें, माथे पर तिलक, हाथ में माला, पर मन में नफरत, जुबान पर गाली और कर्म में बेईमानी। धर्म को जीवन में उतारना नहीं है, धर्म को कपड़े की तरह पहनना है ताकि लोग इज्जत करें।
पाँचवाँ मुखौटा -- रिश्तों का मुखौटा है। यह सबसे खतरनाक है। दोस्ती का मुखौटा पहनकर दुश्मनी निभाना, अपनापन दिखाकर धोखा देना, अंदर ही अंदर जलना। सामने मीठा बोलना और पीठ पीछे जहर उगलना। आज बहुत से रिश्ते, रिश्ते नहीं रहे, बल्कि सिर्फ मुखौटे बन गए हैं।
ऐसे ही अनगिनत मुखौटे हैं -- खुश रहने का मुखौटा, सादगी का मुखौटा, देशभक्ति का मुखौटा। इंसान एक-एक करके इन्हें अलमारी से निकालता है और जरूरत के हिसाब से पहन लेता है। ऐसे मुखौटे अधिकांश लोग गाहे बगाहे बदल बदल कर पहनते रहते हैं।
दफ्तर में एक मुखौटा, घर में दूसरा, दोस्तों में तीसरा और सोशल मीडिया पर चौथा। धीरे-धीरे इंसान खुद ही भूल जाता है कि उसका असली चेहरा कौन सा था। यहाँ तक कि वह यह भी भूल जाता है कि कब किसको कौन सा मुखौटा दिखाया था। ऐसे में उसकी असलियत शीघ्र सबके सामने आ जाती है, क्योंकि ये मुखौटे सस्ते होते हैं
मुखौटे के बाजार का दूसरा पहलू....जिम्मेदार कौन है ?
यहाँ आकर हमें खुद से एक कड़वा सवाल पूछना होगा। क्या सिर्फ मुखौटा पहनने वाला ही दोषी है ? नहीं। ऐसा नहीं है, इस बाजार को गर्म करने में हम सबका हाथ है। हमारा समाज भी बराबर का जिम्मेदार है और समाज ही लोगों को मजबूर कर देता है, बनावटीपन अपनाने के लिए।
क्योंकि यह समाज सच सुनना ही नहीं चाहता। अगर कोई व्यक्ति आकर सच कह दे कि "मैं दुखी हूँ, मैं असफल हो गया, मुझसे गलती हो गई, मुझे कुछ नहीं आता", तो यह समाज सबसे पहले उसी पर हँसेगा। उसी को कमजोर समझेगा। उसी की कमजोरी का मजाक बनाएगा।
हमने बचपन से अपने बच्चों को यही सिखाया है - बेटा, रोना मत, लोग क्या कहेंगे ? फेल हो गए तो किसी को बताना मत, लोग क्या कहेंगे ? कम पैसे हैं तो छुपा लो, लोग क्या कहेंगे ? इसी, "लोग क्या कहेंगे" के एक डर ने पूरे समाज को मुखौटा पहनने पर मजबूर कर दिया है।
हम असली चेहरे को इज्जत नहीं देते, हम चमकदार मुखौटे को इज्जत देते हैं। हम यह नहीं देखते कि इंसान अंदर से कैसा है, हम देखते हैं कि बाहर से कैसा दिखता है। उसके कपड़े कैसे हैं, उसकी अंग्रेजी कैसी है, उसके फॉलोअर कितने हैं, उसकी गाड़ी कौन सी है।
जब समाज का पैमाना ही दिखावा बन जाएगा, तो हर इंसान दिखावेबाज क्यों नहीं बनेगा ? हमने ही नकलीपन की कीमत बढ़ाई है, तो बाजार में नकली माल तो आएगा ही। और यही आज के समय की सबसे बड़ी त्रासदी है। हम नकली को असली से ज्यादा सम्मान दे रहे हैं।
नकली मुखौटों से होने वाला नुकसान
किसी कंपनी की गुडविल अगर नकली हो, तो वह बाजार में बहुत ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सकती और एक दिन कंपनी डूब जाती है। ग्राहकों का भरोसा टूट जाता है। ठीक वैसे ही जब इंसानों के मुखौटे, लोगों के चेहरे से देर से या जल्दी उतरते हैं, तो समाज को डूबने से कौन बचाएगा, क्योंकि यहां तो अधिकांश इंसान किसी न किसी मुखौटे में अपनी असली पहचान छुपाये हुए हैं।
सबसे पहला नुकसान होता है... भरोसे का। आज किसी पर भरोसा करना सबसे मुश्किल काम हो गया है। क्योंकि हमें पता ही नहीं कि सामने वाला असली है या मुखौटा पहने हुए है। इसी कारण रिश्ते कमजोर हो रहे हैं। दोस्ती टूट रही है, परिवार बिखर रहे हैं, पति-पत्नी एक ही छत के नीचे दो अजनबियों की तरह रह रहे हैं। क्योंकि सबको डर है कि कहीं सामने वाले ने मुखौटा तो नहीं पहना।
दूसरा नुकसान है.... हमारे बच्चों का भविष्य। बच्चे किताबों से ज्यादा देखकर सीखते हैं। जब वह देखते हैं कि पिता घर में झूठ बोलते हैं पर बाहर सच का भाषण देते हैं, माँ घर में नौकरानी को डाँटती है पर बाहर करुणा की बात करती है, तो बच्चे के मन में क्या जाता है ? उसके मन में यही जाता है कि जीवन में सफल होने के लिए मुखौटा पहनना जरूरी है। हम अनजाने में अगली पीढ़ी को अभिनय करना सिखा रहे हैं, जीना नहीं सिखा रहे।
तीसरा नुकसान है.... इंसान का खुद से दूर हो जाना। जो व्यक्ति रोज मुखौटा पहनता है, वह धीरे-धीरे खुद से ही नफरत करने लगता है। उसे अंदर ही अंदर पता होता है कि वह झूठा है। वह रात में अकेले में बेचैन रहता है, उसे नींद नहीं आती, उसे लगता है कि कोई उसे समझता क्यों नहीं। क्योंकि उसने अपने असली चेहरे को तो कभी किसी को दिखाया ही नहीं। फिर उसे कौन समझेगा ? मुखौटों की इस दौड़ में मानसिक तनाव, अकेलापन और खालीपन दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है।
और अंतिम नुकसान है.... पूरे देश और पूरे विश्व की मानवता का नुकसान। जिस समाज में सच की कीमत न हो, वह समाज कभी तरक्की नहीं कर सकता। वहाँ सड़कें बनेंगी पर टूट जाएंगी, क्योंकि ठेकेदार ने ईमानदारी का मुखौटा पहना था। वहाँ स्कूल बनेंगे पर शिक्षा नहीं मिलेगी, क्योंकि शिक्षक ने ज्ञान का मुखौटा पहना था। वहाँ न्यायालय होंगे पर न्याय नहीं मिलेगा। एक नकली इंसान से पूरा सिस्टम नकली हो जाता है।
ज्वलंत सवाल - इन मुखौटों को पहचानें कैसे ?
क्योंकि दुश्मन अगर सामने हो तो लड़ना आसान है, पर दुश्मन ने अगर अपनों जैसा मुखौटा पहना हो तो पहचानना मुश्किल हो जाता है। फिर भी कुछ कसौटियां हैं, जो हमारे बुजुर्गों ने हमें दी हैं।
पहली पहचान है.... समय। मुखौटा ज्यादा देर तक नहीं टिकता। असली चेहरा थोड़ी देर के लिए छुप सकता है, पर हमेशा नहीं, एक न एक दिन उसकी असलियत सामने आ ही जाती है। इसलिए किसी भी इंसान को जल्दी परखने की कोशिश मत करो। समय, सबसे बड़ा जौहरी है।
जो व्यक्ति सुख में, दुख में, गुस्से में, लोभ में एक जैसा रहता है, समझो वह असली है। और जो व्यक्ति मौके के हिसाब से रंग बदल लेता है, समझ लेना कि वह मुखौटा पहने हुए है। ऐसे लोग पहली मुलाकात में ही सामने वाले को प्रभावित कर देते हैं, इसलिए उसके मीठे बोल पर नहीं, उसके लंबे व्यवहार पर ध्यान दो।
दूसरी पहचान है.... अकेले में उसका व्यवहार। मुखौटा हमेशा भीड़ के लिए पहना जाता है। क्योंकि अकेले में मुखौटे की जरूरत नहीं पड़ती। इसलिए ऐसे लोगों पर बारीक नजर रखो, देखो कि वह व्यक्ति अकेले में या अपने से छोटे लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है।
जो व्यक्ति मंच पर बराबरी की बात करे और घर में अपने नौकर को इंसान न समझे, उसका मुखौटा समझ लो। जो व्यक्ति कैमरे पर दया दिखाए और अकेले में किसी लाचार को देखकर मुँह फेर ले, उसका मुखौटा समझ लो। इंसान की असलियत उसके बंद कमरे में तय होती है, भरी सभा में नहीं।
तीसरी पहचान है.... उसके स्वार्थ का टकराव। मुखौटा तब तक ही अच्छा लगता है जब तक स्वार्थ न टकराए। जहाँ स्वार्थ टकराया, वहीं मुखौटा गिर जाता है। इसलिए देखो कि जब उसका फायदा और तुम्हारा नुकसान एक साथ आता है, तब वह क्या चुनता है। अगर तब भी वह तुम्हारे साथ खड़ा है, तो वह असली है। अगर वह पल में पाला बदल ले, तो समझ जाओ कि अब तक वह मुखौटा पहने था।
चौथी पहचान है.... उसकी बातों और काम में अंतर। मुखौटा पहनने वाला बोलेगा बहुत मीठा, बड़े प्यार से बड़ी बड़ी बातें करेगा, बहुत बड़ा बनेगा। पर उसके काम छोटे होंगे। असली व्यक्ति कम बोलेगा, पर उसका काम बोलेगा। हमारे यहाँ कहा गया है, कथनी और करनी। जिसकी कथनी और करनी में बहुत बड़ा फासला हो, वह मुखौटाधारी है।
इन मुखौटों से बचा कैसे जाए ? समाधान क्या है ?
इस बीमारी का इलाज सरकार के पास नहीं है, किसी कानून के पास नहीं है। इसका इलाज हमारे ही हाथ में है। हमें अपना सामाजिक ताना-बाना फिर से बुनना होगा, और इसकी शुरुआत खुद से करनी होगी।
पहला समाधान -- खुद मुखौटा पहनना बंद करो।
दुनिया को बदलने से पहले खुद को बदलना होगा। हिम्मत करो और अपना असली चेहरा दिखाओ। अगर तुम दुखी हो तो कहो कि मैं दुखी हूँ। इसमें शर्म कैसी ? अगर तुम्हें कुछ नहीं आता तो कहो कि मुझे सीखना है। इसमें छोटापन कैसा ? जब तुम खुद सच बोलने लगोगे, तो तुम्हारे आसपास से मुखौटाधारी लोग खुद ही दूर हो जाएंगे और सच्चे लोग खुद ही पास आ जाएंगे।
याद रखो, नकली इज्जत से असली बेइज्जती अच्छी है। कम से कम तुम खुद की नजर में तो सच्चे रहोगे। तुम खुद की इज्जत तो करोगे ही, तुम्हारा परिवार भी तुम पर गर्व करेगा। रात को चैन की नींद आएगी।
दूसरा समाधान.... दूसरों की सुनना भी सीखो
हमने बोलना बहुत सीख लिया है, अपने आप को दिखाना बहुत सीख लिया है, अब सुनना सीखना होगा। किसी की सफलता की फोटो पर वाह-वाह करने से पहले उसकी कहानी सुनो। किसी की हँसी पर तालियाँ बजाने से पहले उसकी आँखों में देखो। सोशल मीडिया की चमक में मत उलझो। वहाँ हर कोई अपनी जिंदगी की हाइलाइट दिखाता है, पीछे की मेहनत और आँसू कोई नहीं दिखाता। तुलना करना बंद करो।
तीसरा समाधान.... बच्चों को सच की कीमत सिखाओ।
अपने घर में ऐसा माहौल बनाओ जहाँ सच बोलने पर सजा न मिले, बल्कि सम्मान मिले। अगर बच्चा फेल हो गया है तो उसे डाँटो मत, गले लगाओ। कहो कि कोई बात नहीं, अगली बार मेहनत करेंगे। अगर वह रो रहा है तो उसे रोने दो, यह मत कहो कि लड़के रोते नहीं। जब घर में सच को जगह मिलेगी, तो बच्चे को बाहर मुखौटा पहनने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
उन्हें सिखाओ कि इंसान कपड़ों से बड़ा नहीं होता, गाड़ी से बड़ा नहीं होता, इंसान अपने कर्म से बड़ा होता है।
चौथा समाधान.... समाज के पैमाने बदलो।
हमें तय करना होगा कि हम किसे इज्जत देंगे। क्या हम उस व्यक्ति को इज्जत देंगे जो महंगे कपड़े पहनकर आता है, या उस व्यक्ति को जो भले ही साधारण कपड़ों में हो पर दिल का सच्चा है ? जब तक हम चमक को इज्जत देते रहेंगे, तब तक मुखौटे बनते रहेंगे।
अपने मोहल्ले, अपनी पंचायत, अपने समूह में उन लोगों को आगे लाओ जो वास्तविकता में काम करते हैं, न कि जो सिर्फ काम दिखाते हैं। सच्चे शिक्षक, सच्चे किसान, सच्चे कारीगर, सच्ची मेहनत करने वाली माताओं को सम्मान दो। जब समाज असली लोगों को पूजेगा, तो नकली मुखौटे कोई नहीं खरीदेगा। वो अपने आप सस्ते हो जाएंगे, फिर धीरे धीरे बाजार से ही गायब हो जाएंगे।
पाँचवाँ और अंतिम समाधान.... धीरज और करुणा।
जो व्यक्ति मुखौटा पहने हुए है, वह भी कहीं न कहीं डरा हुआ है, असुरक्षित है। उससे नफरत मत करो। उस पर दया करो। हो सकता है उसे बचपन में कभी सच्चे प्यार की जगह ही न मिली हो। इसलिए उसे भी बदलने का मौका दो। एक सच्चे व्यक्ति की संगत से बड़े से बड़ा मुखौटाधारी भी बदल सकता है।
हमें सबके साथ मिल एक ऐसी दुनिया बनानी है जहाँ किसी को मुखौटा पहनने की जरूरत ही न पड़े। जहाँ हर कोई विश्वास भरे स्वर में कह सके कि मैं जैसा हूँ, वैसा ही ठीक हूं और मुझे वैसा ही पूरे समाज को अपनाना होगा। जब हर इंसान अपनी असलियत के साथ सामने आएगा तो निश्चय ही समाज के द्वारा भी उसे, उसकी असली पहचान के साथ अपनाया जाएगा।
इससे समाज में छल कपट से दूर, एक दूसरे प्रति विश्वास और स्नेह का माहौल बनेगा और हमारा सामाजिक ताना-बाना नए सिरे से मजबूत होकर गर्व से सिर ऊँचा कर, पूरे विश्व के सामने खड़ा होगा। इससे हम अपनी आगामी पीढ़ी को एक मजबूत धरातल सौंप सकेंगे। इसके लिए हमें सभी के साथ धीरज तो रखना ही होगा साथ ही करुणा का व्यवहार करना होगा।
क्योंकि कोई भी इंसान मुखौटा पहनकर दुनिया को कुछ देर के लिए तो धोखा दे सकते हो, पर जिंदगी भर खुद को धोखा नहीं दे सकते। एक दिन हमारा आईना हमसे ही जरूर पूछेगा कि आपका अपना असली चेहरा कहाँ है। तक उस दिन के लिए आपके पास जवाब होना चाहिए। तो अभी से उस जवाब के लिए पृष्ठभूमि की तैयारी करना शुरू कर दे।
अंत में बस इतना ही कहना है कि आओ, हम सब मिलकर आज ही एक प्रण लें। आज से ही हम सब अपना एक-एक मुखौटा उतारेंगे। सबसे पहले खुद का, फिर अपने घर का, फिर अपने समाज का। और धीरे-धीरे इस नकली बाजार को बंद करके, फिर से एक सच्चे, भरोसेमंद और मानवीय समाजिक ताना-बाना बुनेंगे। एक ऐसा समाज जहाँ गुडविल बैलेंस शीट में नहीं, लोगों के दिलों में लिखी जाएगी...
क्योंकि याद रखना, दुनिया को चमकदार मुखौटों की जरूरत नहीं है, दुनिया को सच्चे चेहरों की जरूरत है।
लेखक मनोज भट्ट, कानपुर
"सामाजिक ताना-बाना"
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