फौजी: जीते जी उपेक्षा, शहादत पर श्रद्धांजलि

फौजी: जीते जी उपेक्षा, शहादत पर श्रद्धांजलि

फौजी की जीवित उपेक्षा और शहादत पर श्रद्धांजलि को दर्शाने वाली प्रभावशाली रंगीन तस्वीर, सीमा पर अकेला खड़ा भारतीय सैनिक परिवार की तस्वीर हाथ में लिए हुए, दूसरी ओर माँ-पत्नी-बच्चे दीये और तिरंगे के साथ आशा भरी दृष्टि से देख रहे हैं, शीर्षक “फौजी: जीते जी उपेक्षा, शहादत पर श्रद्धांजलि”, ब्लॉग “सामाजिक ताना-बाना” और लेखक मनोज कुमार भट्ट कानपुर


 एक कठोर सत्य और चिंतन

जब कोई फौजी शहीद होता है, तो पूरा देश एक स्वर में उसकी वीरगति पर श्रद्धांजलि अर्पित करता है। तिरंगे में लिपटी उसकी देह पर फूल बरसाए जाते हैं, सड़कें बंद हो जाती हैं, सोशल मीडिया पर भावुक पोस्ट्स वायरल होते हैं, नेता मंच से भाषण देते हैं, और स्कूलों में बच्चे “सैनिक हमारा गौरव है”,"जय जवान जय किसान" जैसे नारे लगाते हैं। 

लेकिन असलियत ये है कि किसान और जवान के अपने परिवार के अंदर चल रही रोजमर्रा के जीवन की परेशानियों से समाज में किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता और ऐसे में उनकी कितनी जय है, ये भी सब जानते हैं।

क्या हमने कभी ठहरकर यह सोचा है कि जब वही फौजी अपनी वर्दी में सांस लेता हुआ, अपने परिवार के साथ होता है, तब समाज उसके साथ क्या व्यवहार करता है ? क्या उसे या उसके परिवार को वह सम्मान, वह सहानुभूति और वह सहयोग मिलता है, जिसका वह वाकई हकदार है ? लेकिन वहीं उसकी शहादत की खबर सुनते ही क्षणिक भीड़ अचानक उमड़ पड़ती है। क्यों...?

यह प्रश्न दुखद है, लेकिन जरूरी है। यह हमारी सामाजिक चेतना की परीक्षा है। यह लेख केवल एक भावुक अपील नहीं, बल्कि एक गहन चिंतन है, एक ऐसे यथार्थ का जो हमें झकझोर दे। हम फौजियों को “राष्ट्र का गौरव” कहते हैं, लेकिन क्या हम उन्हें जीते जी वैसा ही गौरव देते हैं ? 

इस लेख में हम इस विरोधाभास को खोलेंगे, इसके सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, आर्थिक और सांस्कृतिक आयामों पर चर्चा करेंगे, और अंत में कुछ व्यावहारिक सुझाव भी देंगे। क्योंकि शहादत की श्रद्धांजलि तभी सार्थक है, जब जीवित सैनिक और उसके को भी उतना ही सम्मान मिले।

शहादत का उत्सव और जीवन की उपेक्षा

कल्पना कीजिए। सीमा पर बर्फीली रात में तैनात एक जवान, हाथ में राइफल, आँखों में नींद की कमी और दिल में परिवार की चिंता लिए खड़ा है। उसके घर पर उसकी पत्नी अकेली बच्चे को सुलाती हुई सोच रही है कि कब फोन आएगा। उसके माता-पिता गांव में चिंता की घड़ी में प्रार्थना कर रहे हैं। यह उनकी रोजमर्रा की जिंदगी है। लेकिन जब एक दिन गोली लगती है और वह शहीद हो जाता है, तो अचानक पूरा देश जाग उठता है।

यह विरोधाभास क्यों ?  आज शहादत को निहित स्वार्थी वर्ग और मीडिया द्वारा एक नाटकीय घटना बना दिया जाता है। तथाकथित मीडिया इसे हाइलाइट करता है और वर्तमान राजनीति इसे निहित स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करती है और समाज को पानी के बुलबुले की तरह क्षणिक भावुकता का एक मौका मिल जाता है। हालांकि समाज में ऐसे लोग भी हैं जो कहीं भी किसी भी जवान के शहादत की खबर से मर्माहत होते हैं।

आज हमारे समाज के बड़े वर्ग को, उनके लिए जीवित फौजी की रोजमर्रा की समस्याएं, बेमतलब और बोरिंग लगती हैं। जैसे जवान से संबंधित बिल भुगतान, बच्चों के स्कूल के एडमिशन, अस्पताल में बेड, पेंशन की फाइल, या PTSD (पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर) की चुपचाप लड़ाई, ये असल समस्याएं लोगों के सामने नहीं आतीं, कभी वायरल नहीं होतीं।

भारतीय सेना में लाखों जवान हैं। हर साल सैकड़ों शहीद होते हैं। लेकिन जीवित जवानों की संख्या लाखों में है। और उनके परिवार, करोड़ों लोगों को प्रभावित करते हैं। फिर भी, जब कोई फौजी रिटायर होता है या छुट्टी पर अपने परिवार के पास आता है, तो अक्सर उसे समाज में “आर्मीवाला” कहकर एक अलग गैरसमाजिक तरह का व्यवहार देखने को मिलता है, उसके कामों को अक्सर टाल दिया जाता है। 

बाजार में भी दुकानदार ऊंची कीमत वसूलता है, क्योंकि वह जानता है कि उसके पास समय की कमी होती है और वह समझता है कि “फौजी के पास तो पैसा होता ही होगा”। यहां तक कि यदि उसकी पत्नी किसी सरकारी दफ्तर में कोई काम से जाती है तो उसको कई बार घंटों खड़ी रहना पड़ता है। और स्कूलों में “फौजी आरक्षण का लाभ”,“तेरे पापा तो सिर्फ घूमते रहते हैं” आदि आदि ताने उनके बच्चे सुनते हैं, 

समाज का, फौजी और फौजी के परिवार के प्रति ये रुखा और असम्मानजनक व्यवहार उनके आत्मबल को तो तोड़ता ही है बल्कि बॉर्डर में देश की रक्षा के लिए अपनी ड्यूटी के दौरान, वह समाज से अपने परिवार की सुरक्षा के लिए चिंतित भी रहता है। यह हमारे समाज की एक वास्तविकता और दुःखद विडंबना है।

वास्तविक कहानियां जो दिल दहला देती हैं

एक घटना दिसंबर 2017 की है  कारगिल युद्ध के शहीद लक्ष्मण दास की पत्नी शकुंतला देवी कई दिनों से बीमार थीं। उनका बेटा उन्हें इलाज के लिए पहले कई अस्पतालों में ले गया। अस्पताल ने भर्ती करने से पहले आधार कार्ड की मूल प्रति मांगी।

उसके पास आधार कार्ड की फोटो मोबाइल में थी और उसने आधार नंबर भी बताया, लेकिन अस्पताल ने उसे स्वीकार नहीं किया। थोड़े से विवाद पर अस्पताल प्रशासन ने पुलिस बुला ली। इस विवाद के चलते उनकी मां की हालत बिगड़ती गई। इसके बाद उन्हें दूसरे अस्पताल ले जाया गया, लेकिन जहां उनकी मृत्यु हो गई।

अन्य उदाहरण, मथुरा के एक पूर्व सेना जवान को महज 40 रुपये की विकलांगता पेंशन बढ़ाने के लिए 40 साल तक कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने पड़े। आखिरकार अदालत ने उनके पक्ष में फैसला दिया।

एक और उदाहरण देखें, हिमाचल प्रदेश के रामगढ़ निवासी पूर्व जवान मुंशी राम को सेना से पेंशन दिलाने के लिए 41 साल तक दफ्तरों और अधिकारियों के चक्कर काटने पड़े। 1971 में भर्ती हुए मुंशी राम को आखिरकार 2020 में पेंशन और बकाया राशि मिल सकी।

ये अलग-अलग कहानियां नहीं, बल्कि एक वास्तविक पैटर्न हैं। ऐसे न जाने कितने तरह के कटु अनुभवों से जवान या शहीद जवान का परिवार प्रतिदिन गुजर रहा है और ये सब हम और हमारे कृतज्ञ समाज के द्वारा उन्हें दिया जा रहा है।

विधवाओं को पेंशन पहुंचने में देरी, उनके बच्चों की पढ़ाई में बाधाएं और फौजियों के बार-बार ट्रांसफर पोस्टिंग के कारण उनके परिवार की जड़ें जम न पाना ऐसी तमाम मुश्किलें, एक फौजी के परिवार के लिए ये सब चुपचाप चलने वाली त्रासदियां हैं। जिन्हें सिविल समाज समझता ही नहीं है।

एक्स-सर्विसमेन एसोसिएशंस के आंकड़ों और विभिन्न रिपोर्ट्स के अनुसार, रिटायर्ड फौजियों में काफी संख्या में लोग मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं, बेरोजगारी और सामाजिक अलगाव से जूझते हैं। क्या उनके मानसिक स्वास्थ्य समस्या या सामाजिक अलगाव की वजह हमारा सामाजिक ताना-बाना जिम्मेदार नहीं है ? क्या सरकारें  उन सभी अवकाशप्राप्त जवान या शहीद जवान के परिवार के जीवन यापन के प्रति अपने दायित्वों को पूरा कर पा रही हैं ?

समाज का दोहरा मापदंड

हमारा समाज वीरता को पूजता है, लेकिन वीर को नहीं। हम महाभारत और रामायण में वीरों की कहानियां पढ़ते हैं, लेकिन आज के वीरों को रोजमर्रा की जिंदगी में तुच्छ समझते हैं। फौजी जब सीमा पर दुश्मन का सामना कर रहा होता है, तब हम सुरक्षित घरों में सोते हैं। लेकिन जब वह घर आता है, तो हम उसे “सुरक्षा” का प्रतीक मानकर उसकी समस्याओं को नजरअंदाज कर देते हैं।

अगर ईमानदारी से अपना आंकलन करें तो पाते हैं कि हम “आर्मी डे” पर परेड देखकर तालियां बजाते हैं, लेकिन पड़ोस में रहने वाले फौजी परिवार की छोटी-छोटी मदद करने में कोताही बरतते हैं। एक फौजी परिवार जितने मान सम्मान का हकदार है, हमारा समाज कदाचित उसे नहीं देता

गांवों में शहीद की प्रतिमा बनवाते हैं, लेकिन जीवित फौजी के खेत की सिंचाई या बेटी की शादी में वो सहयोग नहीं देते जितना देना चाहिए। यहां तक कि फौजी की जमीन पर कब्जा हो जाता है, क्योंकि “वो तो ड्यूटी पर है, मुकदमा नहीं लड़ सकता। स्कूलों में “देशभक्ति” का पाठ पढ़ाया जाता है, लेकिन अधिकांश स्कूल या शिक्षक फौजी के बच्चे को अतिरिक्त मदद देने में हिचकिचाते हैं।

यह दोहरा मापदंड कहां से आया ? शायद हमारी “भावुकता की संस्कृति” से। हम दुःखद घटनाओं पर एकजुट तो हो जाते हैं, लेकिन उनके जायज हक की मांग करने वाली समस्याओं से बचते हैं, जिसे पूरा करने के लिए वो निरंतर प्रयास करते हैं। 

इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया भी इसमें दोहरी भूमिका निभाता है। शहीद होने की खबरों को तो ब्रेकिंग न्यूज बनता है, लेकिन वहीं किसी फौजी से संबंधित कोर्ट केस या याचिकाओं आदि की खबरों को अंदर के पन्नों पर छिपा दी जाती हैं, इस तरह से मीडिया भी समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने में भेदभाव करता है।

मनोवैज्ञानिक प्रभाव

फौजी की जिंदगी में अनिश्चितता सबसे बड़ा दुश्मन है। हर पोस्टिंग नई जगह, नया माहौल। परिवार बिछड़ता रहता है। बच्चे बार-बार स्कूल बदलते हैं, जिससे उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है। पत्नी अकेली घर संभालती है, बिजली बिल, स्कूल फीस, बीमारी, सब कुछ। जब फौजी घर आता है, तो वह भी पूरी तरह “रिलैक्स” नहीं कर पाता। मन में ड्यूटी की चिंता रहती है सो अलग।

रिटायरमेंट के बाद स्थिति और खराब हो जाती है। कई फौजी 35-40 साल की उम्र में ही रिटायर हो जाते हैं। जिससे उनके सामने भविष्य की तमाम अनिश्चितताएं उनके मानसिक स्वास्थ्य को डगमगा देती हैं। और इसका नकारात्मक प्रभाव निश्चय ही उनके परिवार पर पड़ता है।

सिविलियन जॉब में एडजस्टमेंट उनके काफी मुश्किल होता है। स्किल्स अलग, नेटवर्किंग कम, नतीजतन वे कई बार अवसादग्रस्त हो जाते हैं, परिवार में तनाव और कभी-कभी आत्महत्या तक के मामले सामने आ जाते हैं। आंकड़े बताते हैं कि एक्स-सर्विसमेन में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं सामान्य आबादी से ज्यादा हैं। लेकिन हम इसे उनकी “कमजोरी” समझकर नजरअंदाज कर देते हैं।

उनके शहीद होने पर, परिवार पर प्रभाव और गहरा पड़ता है। शहीद की विधवा न सिर्फ पति खोती है, बल्कि समाज की नजर में “सहानुभूति की पात्र” बनकर रह जाती है। और जीवित फौजी की पत्नी “फौजी की बीवी” के टैग के साथ अकेलेपन की मार झेलती है। वहीं बच्चे भी पिता की अनुपस्थिति में बड़े होते हैं, और जब पिता घर आते हैं तो वे अपने ही बच्चों को “अजनबी” लगते हैं।

आर्थिक और प्रशासनिक चुनौतियां

समाज के आम जनमानस को फौजी की सैलरी अच्छी लगती है, लेकिन वह असलियत नहीं समझते हैं कि उनके खर्च भी ज्यादा होते हैं, जैसे बार-बार घर बदलना, बच्चों की पढ़ाई, अन्य व्यवस्थागत खर्चे आदि, सब इसमें लग जाता है। रिटायरमेंट के बाद पेंशन पर्याप्त नहीं होती, खासकर महंगाई के इस दौर में। सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में इतनी रेड टेप (नौकरशाही) है कि कई बार फौजी थककर छोड़ देते हैं।

एक पूर्व सैनिक ने एक बार मुझे बताया, “शहीद होने पर तो सरकार तुरंत मदद करती है, लेकिन जीते जी मदद मांगने पर फाइल घूमती रहती है।” यह कड़वा सत्य है। ईएसएम (एक्स-सर्विसमेन) वेलफेयर संगठनों की शिकायतें वर्षों से अनसुनी हो रही हैं।

सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

भारतीय संस्कृति में वीरों का सम्मान गहराई से जुड़ा है। भगवान राम, कृष्ण, शिवाजी, राणा प्रताप, सब वीर हैं। लेकिन वे भी युद्ध के नायक थे। शांतिकाल में वीरता का सम्मान कम हो जाता है। ब्रिटिश काल में भी भारतीय फौजियों को “मुनीम” समझा जाता था। आजादी के बाद भी हमारी मानसिकता पूरी तरह नहीं बदली।

आज जब हम “आत्मनिर्भर भारत” की बात करते हैं, तो क्या हम, फौजी और उनके परिवार को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ठोस और पर्याप्त कदम उठा रहे हैं ? हम उन्हें सिर्फ युद्ध के लिए तैयार करते हैं। पर क्या हम उनके लिए ऐसी नीति या योजना नहीं बना सकते हैं जिससे शांतिकाल या उनके अवकाश प्राप्त करने के बाद में भी उन्हें सामाजिक ताना-बाना के लिए उपयोगी बना सकें ?

बदलाव की राह के कदम

इस स्थिति को बदलने के लिए सिर्फ भावुक लेखन काफी नहीं। जरूरत है ठोस कार्रवाइयों की जैसे....

सामाजिक जागरूकता:-- स्कूलों और कॉलेजों में “जीवित फौजियों का सम्मान” पर विशेष कार्यक्रम चलाएं। सिर्फ 26 जनवरी या शहीद दिवस पर नहीं, बल्कि साल भर।

प्रशासनिक सुधार:-- फौजी परिवारों के लिए एकल विंडो सिस्टम। सभी सुविधाएं ऑनलाइन, तेज और पारदर्शी।

रोजगार:-- रिटायर्ड फौजियों के लिए स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम और प्राथमिकता। प्राइवेट सेक्टर को टैक्स छूट देकर उन्हें हायर करने के लिए प्रोत्साहित करें।

मानसिक स्वास्थ्य:-- हर कैंटोनमेंट और एक्स-सर्विसमेन एसोसिएशन में काउंसलिंग सेंटर।

समाज की भूमिका:-- प्रत्येक गांव और मोहल्ले में “फौजी परिवार सहायता समिति” बनाएं। छोटी मदद, पढ़ाई, मेडिकल, रोजगार आदि में मदद के लक्ष्य हेतु।

मीडिया की जिम्मेदारी:-- जीवित फौजियों की सकारात्मक कहानियां भी उतनी ही प्रमुखता से दिखाएं, जितनी शहीदों की।

अंतिम अपील

दोस्तों, फौजी सिर्फ वर्दी नहीं पहनता, वह अपनी पूरी जिंदगी देश को सौंप देता है। उसकी शहादत पल भर की होती है, लेकिन उसकी सेवा सालों-साल की। अगर हम उसे जीते जी सम्मान नहीं दे सकते, तो शहादत पर दी जाने वाली श्रद्धांजलि महज दिखावा है।

आइए, आज से संकल्प करें। अगली बार जब कोई फौजी परिवार आपकी नजर आए, तो पूछिए, “क्या मदद चाहिए ?” अपने बच्चों को सिखाएं कि फौजी सिर्फ युद्ध का नहीं, बल्कि रोजमर्रा की बहादुरी का प्रतीक है। सरकार से मांग करें कि नीतियां बदलें। और सबसे जरूरी, खुद को बदलें।

क्योंकि असली देशभक्ति तब शुरू होती है, जब हम उन लोगों का सम्मान करें जो हर पल हमारे लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा रहे हैं, चाहे वे जीवित हों या शहीद।

एक फौजी की मां ने एक बार कहा था, “मेरा बेटा जब घर आता है तो मुझे लगता है जैसे पूरा देश आ गया है। लेकिन दुःखद है कि जब वह जाता है तो पूरा देश उसे भूल जाता है।” ध्यान रखे कि यह भूलना हमें और हमारी आगामी पीढ़ी के लिए महंगा पड़ सकता है....

जय हिंद। जय हिंद की सेना ।।

लेखक - मनोज कुमार भट्ट, कानपुर 

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