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रुपया कमाना सरल, खर्च करना कठिन

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रुपया कमाना सरल, खर्च करना कठिन बुद्धिमानी से खर्च, वित्तीय अनुशासन का मार्ग यह वाक्य सुनने में उलटा लगता है। हर कोई कहता है कि पैसा कमाना सबसे कठिन काम है। क्योंकि लोग सुबह से शाम तक पसीना बहाते हैं, तब जाकर दो पैसे हाथ में आते हैं। फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि कमाना सरल है और खर्च करना कठिन है।  पर जीवन को गहराई से देखने पर यह बात बिल्कुल सच निकलती है कि पैसा कमाने का रास्ता सीधा है, मेहनत करो, समय दो, हुनर दिखाओ और बदले में पैसा लो। इसमें नियम साफ हैं। पर पैसा हाथ में आने के बाद जो शुरू होता है, वही असली परीक्षा है क्योंकि खर्च करने के लिए कोई नियम की किताब नहीं है, इसलिय वहाँ आपका मन ही, आपका सबसे बड़ा शत्रु और सबसे बड़ा मित्र बन जाता है। इस बात से सभी भली भांति परिचित हैं कि धन संपत्ति को संभालना, आग को संभालने जैसा है। अगर संभाल लिया तो घर में उजाला होगा, भोजन पकेगा, सर्दी में गरमी मिलेगी। लेकिन अगर उसे बुद्धिमत्ता से नहीं संभाला और खुला छोड़ दिया तो वही धन की आग सब कुछ जला कर राख कर देगी।

एक वर्ष का सफर: 'सामाजिक ताना-बाना', मेरे संघर्ष और आपका स्नेह

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एक वर्ष का सफर: 'सामाजिक ताना-बाना', तकनीकी उलझनें और आपका साथ .... प्रिय पाठकों, नमस्कार! आज का दिन मेरे लिए बहुत ही खास और भावुक कर देने वाला है। ठीक एक वर्ष पहले, आज ही की तारीख में मैंने 'सामाजिक ताना-बाना' ब्लॉग की शुरुआत की थी। जब मैंने इस यात्रा का पहला कदम उठाया था, तो मेरे पास केवल शब्द थे और समाज के यथार्थ को उकेरने की एक प्रबल इच्छा। एक लेखक के लिए पन्नों पर भावनाएं उकेरना शायद आसान होता है, लेकिन एक डिजिटल प्लेटफॉर्म को स्थापित करना मेरे लिए किसी चुनौती से कम नहीं था। मुझे आज भी याद है कि कैसे मैंने बिना किसी बाहरी तकनीकी सहायता के, अकेले ही इस ब्लॉग की रूपरेखा तैयार की।  इसके लेआउट को संवारने से लेकर 'पब्लिश' बटन दबाने तक की उलझनें, थीम सेट करने की जद्दोजहद और कई रातों की तकनीकी माथापच्ची, ये सब मेरे लिए बिल्कुल नया था। कई बार झल्लाहट भी हुई, लेकिन मेरे भीतर मौजूद समाज के विभिन्न पहलुओं पर बात करने की तड़प मुझे रुकने नहीं दे रही थी। इस एक साल के सफर में, हमने और आपने मिलकर हमारे समाज के कई अनछुए और संवेदनशील पहलुओं पर गहरा संवाद किया है। चाहे बात.......

कल की कथा, आज की व्यथा (द्वितीय भाग)

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कल की कथा, आज की व्यथा  (द्वितीय भाग) कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई आँसुओं में नहीं, बल्कि मुस्कुराते हुए कहे गए व्यंग्य में छिपी होती है।  यह कविता भी ऐसी ही एक व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति है, जिसमें "पिटना" केवल शारीरिक मार का प्रतीक नहीं, बल्कि उस आम आदमी की रोज़मर्रा की बेबसी, अपमान, संघर्ष और व्यवस्था से लगातार होती टकराहट का रूपक है। बचपन की डाँट से लेकर दफ्तरों की उपेक्षा तक, रिश्तों की उलझनों से लेकर समाज और व्यवस्था की विसंगतियों तक, ज़िंदगी हर मोड़ पर हमें किसी न किसी रूप में "पीटती" रही है। समय बदला, चेहरे बदले, परिस्थितियाँ बदलीं, लेकिन आम आदमी की व्यथा आज भी वैसी ही है। यह कविता किसी व्यक्ति, धर्म, संस्था या वर्ग पर कटाक्ष नहीं, बल्कि उन सामाजिक परिस्थितियों और व्यवस्था पर एक हल्का-फुल्का लेकिन गहरा व्यंग्य है, जहाँ संवेदनशील इंसान कभी व्यवस्था से, कभी हालात से और कभी अपनी ही उम्मीदों से हारता दिखाई देता है। आइए, मुस्कुराते हुए इस व्यथा को महसूस करें और इस व्यंग्य में छिपे उस सच को पहचानें, जो शायद कहीं न कहीं हम सभी की अपनी कहानी है। कविता का मूल भाव हा...

वर्तमान आईना झूठ बोलता है

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वर्तमान आईना झूठ बोलता है यथार्थ, माया और परछाइयों के बीच एक दार्शनिक और व्यंग्यात्मक यात्रा ​मित्रों, मनुष्य और आईने का रिश्ता सदियों पुराना है। एक समय था जब आईना केवल एक परावर्तक सतह हुआ करता था, चाहे वह शांत जल काके तालाब हो या कांसे और कांच का टुकड़ा। उसका एकमात्र धर्म था सत्य बोलना। सामने जो है, जैसा है, उसे उसी रूप में प्रस्तुत कर देना। तब आईना सीधा-सादा होता था। लेकिन आज ? आज का आईना चालाक, कूटनीतिक और एक शातिर मार्केटिंग एक्सपर्ट बन चुका है। अब वह सत्य नहीं दिखाता, बल्कि वह दिखाता है जो हम देखना चाहते हैं। थोड़ा फिल्टर, थोड़ी चमक, थोड़ी परछाईं की भीड़, और बस, सच्चाई पूरी तरह से गायब। ​"वर्तमान आईना झूठ बोलता है" केवल एक वाक्य नहीं है, बल्कि यह हमारे पूरे आधुनिक युग का सबसे कठोर यथार्थ है। सजग हुआ जब आज देख, आईने में जो प्रतिबिंब है... परछाइयों की एक भीड़ है, सत्य कहीं पर लुप्त है.... ​ये पंक्तियां एक गहरी चुभन पैदा करती हैं। आज हम इसी आईने की चालाकी पर एक लंबी, तीखी, विचारशील और हँसते-हँसाते यात्रा करेंगे। इस व्यंग्य-यात्रा में हम देखेंगे कि कैसे हमारा पूरा सामाजिक त...