गांव का सच और हमारी सोच, पगडंडी से चौपाल तक

गांव का सच और हमारी सोच 

तालाब किनारे पीपल के नीचे बैठे रामलाल और बाबूलाल, पीछे गांव की पगडंडी, हरे खेत, मंदिर और स्वयं सहायता समूह की महिलाएं - गांव का सच और हमारी सोच दर्शाता चित्र





पगडंडी से चौपाल तक, शोर में दबा हुआ सच

गांव की पगडंडी पर जब हम चलते हैं, तो पैर के नीचे सिर्फ मिट्टी नहीं होती, बल्कि पूरी एक कहानी होती है, कई पीढ़ियों का एक इतिहास होता है। यह वही मिट्टी है जिसने हमें चलना सिखाया, जिसने हमारे दादा-परदादा को अन्न दिया। यह खेत, यह बगिया, यह पोखरा, यह बरगद के नीचे की चौपाल, यह सब हमारी पहचान है। शहर में लोग एड्रेस से पहचाने जाते हैं, गांव में लोग मिट्टी से पहचाने जाते हैं। दरअसल इसी मिट्टी के नीचे में हमारी जड़ें हैं।

पर आज जब उसी पगडंडी पर चलते हुए मैं लोगों की आंखों में देखता हूं, तो एक अजीब सा बोझ दिखता है। चेहरे पर झुर्रियां तो पहले भी थीं, पर अब उन झुर्रियों में चिंता ज्यादा है। आंखों में थकान ज्यादा है। लोग हंसते तो हैं, पर वह हंसी खुलकर नहीं निकलती। लगता है जैसे भीतर कुछ घुट रहा है।

आज का समय बड़ा अजीब है। अब गांव में भी चारों तरफ शोर है। सुबह-सुबह मंदिर में लाउडस्पीकर पर भजन, दोपहर में टीवी पर नेता लोगन की बहस, शाम को मोबाइल में टिक-टिक नोटिफिकेशन, और बाजार में सब्जी वाले की चिल्लाहट। इतना शोर है कि आदमी अपने मन की आवाज ही नहीं सुन पा रहा। 

और इस सारे शोर में सबसे ज्यादा अगर किसी की आवाज दब रही है, तो वह है गरीब आदमी की आवाज। आज उसकी भूख की आवाज, उसकी लाचारी की आवाज और उसकी खामोशी की आवाज को अब गांव में कोई महत्व नहीं देता।

एक तरफ चारों ओर तरक्की के दावे बहुत हो रहे हैं। सरकारी आंकड़ों में, अखबारी कागज पर गांव चमक रहा है। फोटो में गांव मुस्कुरा रहा है। पर जमीन पर आकर देखो तो वहां टूटा फूटा हुआ आईना दिखता है, जिसमें हर आदमी को अपना टूटा हुआ चेहरा ही देखने को मिल रहा है।

गांव के दो धरोहर, रामलाल दद्दा और बाबू चाचा 

हमारे गांव में तालाब किनारे, पीपल के नीचे दो बुजुर्ग रोज बैठते हैं। एक का नाम रामलाल, जिन्हें हम सब राम लाल दद्दा कह कर बुलाते और दूसरे का नाम बाबू राम, जिन्हें सब बाबू चाचा कहते हैं। दोनों की उम्र सत्तर पार। दोनों ने गांव को बनते-बिगड़ते देखा है। दोनों के पास न डिग्री है न कोई बड़ा पद, पर उनके पास अनुभव की वह पोथी है जो किसी लाइब्रेरी में नहीं मिलती।

मैं अक्सर या जब भी मौका मिलता, है उनके पास जाकर बैठ जाता हूं। वह मुझे काफी स्नेह देते हुए गुड्डू भैया कहकर बुलाते हैं। उनकी बातें सुनना किसी किताब को पढ़ने जैसा नहीं, बल्कि किसी आध्यात्मिक जीवन को जीने जैसा लगता है।

एक दिन गांव में गमी हो गई। रामलाल दद्दा कहने लगे, "गुड्डू भैया, पहिले गांव मा जब कोऊ बीमार पड़त रहा, तब पूरा गांव दवाई लाए खातिर दौड़त रहा। आज समय बड़ा बदल गवा है, अब देखौ, बगल वाले घर मा मातम है, और पड़ोसी टीवी और मोबाइल मा लगे हैं। ये कैसा समय है, ये कौन सी तरक्की है गुड्डू भैया ?"

बाबू चाचा ने हुक्का गुड़गुड़ाते हुए बीच में टोंकते हुए कहा, "रामलाल, तरक्की तो बहुत भई है। अब देखौ पहिले पगडंडी रही, अब खड़ंजा है। पहिले हर घर मा दिया जलत रहा, अब बिजली आ गई, तो बल्ब की रोशनी हो गई और पंखा की हवा मिल रही है। लेकिन तुम्हरी ई बात मा पूरा दम है कि हम सबके मन मा जो अंधेरा बढ़ा है, ओकर का करी ?"

उन दोनों की दार्शनिक तरह की यह दो लाइन की बात सुन कर मैं क्षण भर के लिए सन्न रह गया, फिर मुझे लगा कि उनके अंतःकरण से निकली ये बात पूरे समाजशास्त्र पर भारी है। यह केवल दो बुजुर्गों का दुख नहीं है, यह पूरे गांव का, पूरे देश के गांवों का सामूहिक सच है।

धर्म का शोर और इंसानियत की खामोशी

थोड़ी देर की उनकी बातों से समझ आ गया कि बाबू चाचा की सबसे बड़ी पीड़ा धर्म को लेकर है। वह खुद बड़े कर्मयोगी होने के साथ ही धार्मिक आदमी हैं। रोज सुबह चार बजे उठकर नहा-धोकर पूजा करते हैं। पर आज लग रहा था जैसे उनके अंदर का ज्वालामुखी फटने पर आमादा हैं।

वह कहते हैं, "गुड्डू भैया, आज कल लोग चारों तरफ पूजा पाठ तो खूब करत हई, पर इंसानियत भूलाय गये हैं।" आज गांव-गांव में मंदिर बन रहे हैं। बहुत अच्छी बात है। शहर से लेकर गांव तलक, मंदिर में भीड़ भी खूब है। भंडारा हो रहा है, जागरण हो रहा है, चंदा कट रहा है। 

"चारों तरफ लाउडस्पीकर पर दिन भर भजन बज रहे हैं। धरम का शोर बहुत है गुड्डू भैया, पर" , पर...मैने पूछा, पर क्या ? तो वह रुंधे गले से, जोर से बोले कि "इत्ते धरम वरम का कोऊ असर है का...? घर, परिवार और समाज मा तो कहूँ दिखाय नाहिं पड़त"? उनके अंदर की प्रश्नवाचक पीड़ा से मैं हतप्रभ हो गया।

बाबू चाचा की बात आज के दौर में सही है, हालांकि इस तरह की बाते अक्सर शहर में सुनने को मिलती है लेकिन आज गांव के एक बुजुर्ग की गूढ़ अर्थ वाली गंभीर और विचलित कर देने वाली उनकी बातें बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती हैं। आज हमारा समाज, खास कर युवा पीढ़ी चाहे वह शहर से संबंधित हो या गांव से, दिशाहीन और अंधी दौड़ में शामिल है।

चलिये कुछ दृश्य आंखें बंद कर देखते हैं। एक मंदिर की सीढ़ियों पर एक बूढ़ी अम्मा बैठी भीख मांग रही है और मंदिर के बाहर ही एक भूखा बच्चा प्रसाद के इंतजार में घंटों खड़ा है। तभी मंदिर के बगल से एक कोई बारात निकलती है, बाराती लोग डीजे पर नशे में चूर बेतरतीब नाच रहे हैं, कुछ बाराती दिखावटी खुशी में नोट उड़ा रहे हैं, इस तरह की शादियों में खुशी के नाम पर लाखों फूंक देते हैं, पर उसी गांव के एक गरीब की बेटी की शादी, पैसे के अभाव में टूट जाती है।

बाबू चाचा फिर पूछते हैं पूछते हैं," भगवान के नाम पर इतना दान-धर्म हो रहा है, लेकिन गरीब के घर में रोटी  नहीं पहुंच रही है, काहे...? भगवान तो कहते हैं, नर में ही नारायण है। तो हम लोग नारायण को ढूंढने पहाड़ पर काहे जात हैं, बगल के भूखे पड़ोसी में काहे नहीं नारायण देखत हैं ? गुड्डू भैया, सच तो यह है कि हमने धर्म को कर्म से हटाकर केवल कांड बना दिया है"। वे लगातार भावुकता के साथ बोले जा रहे थे।

"धर्म का मतलब अगरबत्ती दिखाना नहीं, भूखे को रोटी खिलाना है। धर्म का मतलब घंटा बजाना नहीं, किसी गिरते हुए को हाथ देना है। पर आज धर्म दिखावे का चोला बन गया है। भीतर मन मैला, ऊपर जनेऊ और तिलक। यह धर्म नहीं, धर्म का व्यापार है। और जब तक हम इस शोर वाले धर्म से निकलकर इंसानियत वाली शांति तक नहीं पहुंचेंगे, तब तक कोई भी पूजा हमें शांति नहीं दे सकती"।

" गुड्डू भैया तुम तो जानत हौ कि गांव की भाषा में एक कहावत है, भूखे भजन न होय गोपाला, ये लो अपनी कंठी, ये लो अपनी माला, तो भैया जिसका पेट ही भूखा हो, उसको भजन और भगवद्भक्ति का रास्ता नहीं दिखता, अरे पहले उसकी भूख मिटाओ फिर जब उसका पेट भरा होगा तो वह खुद ब खुद भजन और पूजा पाठ करन लागी"।

गरीब की हकीकत - चूल्हा, अस्पताल और बस्ता

बाबू चाचा की बात अभी खतम भी नहीं हुई थी कि बीच में रामलाल दद्दा ने अपने अनुभव की किताब खोल दी और बोले, "हम अक्सर कहते हैं गुड्डू भैया कि गरीबन के तीन ही दुख होत हैं, चूल्हा, अस्पताल और बस्ता।" अब तक गुड्डू भैया भी उन दो बुजुर्गों के मन के मर्म की गंभीरता को समझ गये थे। "दद्दा जरा विस्तार से बताओ", गुड्डू भैया ने उन्हें कुरेदते हुए कहा।

"हां हां सुनो और समझो भी, एक एक करके सबका मतलब"... चेहरे पर हल्की सी एक गंभीर मुस्कान के साथ दद्दा ने बोलना शुरू किया,बोले...

पहला दुख - चूल्हा ठंडा...

"गांव की औरतों से पूछो, महंगाई का होत है। क्योंकि वह अपने आप में हिसाब किताब का पूरा बही खाता है। चाहे तेल का दाम देखो, दाल का दाम देखो, शक्कर का दाम देखो सब सातवें आसमान पर। पहिले जो सब्जी घर के आस पास से मिल जाती थी, अब वह भी बाजार से लानी पड़ती है। महंगाई की चाल देखो कि जब भी बाजार के लिए निकलो तब एक ही बात मन में आती है कि अबकी बार पहले से ज्यादा पैसा देना पड़ेगा।" 

"किसान कहता है, भैया, धान की कीमत कम है, खाद महंगी है, पानी के लिए डीजल महंगा है। मजदूर कहता है, काम है, पर मजदूरी वही पुरानी है। उस मजदूरी में घर नहीं चलता। घर की औरतें कहती हैं, हम कैसे घर चलाई, समझ नहीं आवत। बच्चन को का खिलाई, का पढ़ाई। शाम को जब चूल्हा जलता है, तो उसके धुएं के साथ औरत की चिंता भी उड़ती है।"

दूसरा दुख - अस्पताल महंगा।

दद्दा के सिलवटें वाले बूढ़े चेहरे में भी नाराजगी स्पष्ट झलक रही थी, वे आगे कहते हैं, "अपने गांव मा एक सरकारी अस्पताल है। बिल्डिंग जर्जर है, जंग लगा पुराना बोर्ड है, पर भीतर डॉक्टर नहीं, दवा नहीं। जब जाओ तब नर्स कहती है, चलो जाओ...जिला अस्पताल जाओ।"

"जिला अस्पताल जाओ तो वहां लम्बी लाइन। ऐसा लगत है कि सबहिं लोग बीमार हो गए हैं। पर्ची बनवाए मा आधा दिन और डॉक्टर को दिखाने मा आधा दिन। जानत हौ गुड्डू भैया, डॉक्टर जो दवा लिखकर देत है, वो दवा अस्पतालन मा नाही मिलत है और बाहर दवा की दुकानन मा महंगी मिलत है।"

"अब बताओ गरीब आदमी का करे? वह कर्ज लेत है, जमीन गिरवी रखत है। इलाज के चक्कर में वह औरौ गरीब हो जात है। एक बीमारी पूरे परिवार को गरीबी के गड्ढे में धकेल देती है। रामलाल दद्दा भारी मन से कहते हैं, गुड्डू भैया, पहिले जड़ी-बूटी से काम चल जात रहा, अब तो छींक भी आवे तो हजार रुपया निकल जात है।"

तीसरा दुख - बस्ता भारी, पर ज्ञान हल्का।

और सुनो, गांव मा स्कूल तो है। दो कमरे हैं, लगत है कि अबहिन गिर पड़ी। एक मा मास्टर साहब बैठत हैं, दूसरे में बच्चे। लड़का लड़की खातिर एक शौचालय, सालन से सफाई नहीं, पानी पिये के लिए एक पुरान घड़ा, आधे गुम्मा से ढका। पढ़ाई का हाल ना पूछो तो अच्छा। भगवान जाने पढ़ाई कब होई...?" 

"मास्टर साहब भी का करें, उनकी ड्यूटी तो कभी जनगणना में लग जात हैं, कभी चुनाव में, कभी मिड-डे मील का हिसाब देखन मा। ऐसे में बच्चों का मन कहां लगी पढ़ाई मा? स्कूलन मा अनुशासन नाम की चीज ही खत्म हो गई है। शिक्षक डांट दे तो बवाल हो जात है।" 

"जब शिक्षक क्लास मा मोबाइल चलावत है, तो लड़का लोग भी एक हाथ मा किताब है, तो दूसरे हाथ मा मोबाइल। शिक्षक का सम्मान घटत जा रहा है। पहले हम लोगन के जमाने मा गुरुजी गांव के सबसे सम्मानित व्यक्ति होत रहे। आज उनका सबही मजाक उड़ावत है।"

गहरी सांस लेते हुए राम लाल दद्दा बड़े निराश होते हुए बोले,"गुड्डू भैया यह तीन दुख ही गरीब की पूरी कहानी है, पूरी जिंदगी उसकी यही मा खत्म हो जात है।" 

राम लाल दद्दा जब अपने मन की पीड़ा बता रहे थे, तभी मुझे इस बात का एहसास हो गया था कि बगल में बैठे बाबू चाचा के मन की बातें ज्यादा देर तक नहीं रुक सकतीं। और यही हुआ, जैसे ही दद्दा की बात खत्म हुई, वैसे ही पल भर का समय दिए बिना ही, बाबू चाचा ने बात को आगे बढ़ाते हुए बोलना शुरू किया।

वह बहुत गुस्से में बोले, "गुड्डू भैया, आज कल देखो, बच्चन के मुंह मा गाली, हाथ मा नशा, और दिल मा लालच। यही तरक्की है का ?"

शिक्षा और युवा - मुंह में गाली, हाथ में नशा

यह वह मुद्दा है जिस पर बाबू चाचा सबसे ज्यादा दुखी होते हैं। "एक बात बताएं, बात कड़वी है, पर सच्ची है। गांव के नौजवानों को देखो। पहले के नौजवान सुबह उठकर खेत जाते थे, अखाड़े में जाते थे, बड़ों को प्रणाम करते थे। लेकिन आज का नौजवान सुबह दस बजे तक सोता है। उठता है तो सबसे पहले मोबाइल देखता है"।

"स्कूल कालेज तो केवल प्रमाण पत्र और डिग्री बांटने का  कारखाना बन गया है। संस्कार तो जैसे किताबों से गायब ही हो गए हैं। बच्चा अंग्रेजी में ए फॉर एप्पल तो सीख रहा है, पर मां-बाप से कैसे बात करनी है, यह नहीं सीख रहा। वह पहाड़ा तो याद कर लेता है, पर गांव के बुजुर्ग का सम्मान कैसे करना है, यह सब भूल जात है"।

"और सबसे बड़ा दुश्मन है यह मोबाइल और नशा। गांव-गांव में आज नशा पहुंच गया है। गुटखा, बीड़ी, शराब, और अब तो नए-नए तरह के नशे। छोटे-छोटे लड़के पुड़िया लिए घूम रहे हैं। शाम को तालाब किनारे बैठकर नशा करते हैं। उनसे पूछो क्या कर रहे हो, तो कहते हैं टाइम पास कर रहे हैं। अरे, जिस उम्र में तुम्हें अपना भविष्य बनाना था, तुम टाइम पास कर रहे हो"?

इत्ते में रामलाल दद्दा बीच में अपनी बात जोड़ते हुए कहते हैं, "भइया, जब तक शिक्षा के मंदिरन मा संस्कार नहीं जुड़ेगा, तब तक पढ़ाई लिखाई डिग्री, केवल कागज का टुकड़ा रही। हमेशा एक बात हमारी याद रखना कि पढ़ा-लिखा गंवार, अनपढ़ गंवार से ज्यादा खतरनाक होता है।"

हम जनत हैं कि युवा चाहे शहर का हो चाहे ही गांव का, युवा पूरे देश का भविष्य है। अगर हमारा युवा ही भटक गया, तो गांव का भविष्य अंधकार में चला जाएगा। इसलिए हम सबकी भी अपने बच्चों के भविष्य की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है, हमें उनको सिर्फ इंजीनियर, डॉक्टर हो नहीं, बल्कि अच्छा इंसान भी बनाना होगा।

रिश्तों का पतन - रुपया बड़ा, भाईचारा छोटा

अपने गांव के दोनों बुजुर्गों की कोई भी बात वर्तमान संदर्भ में कहीं से भी गलत नही थी, बल्कि दोनों की चिंता वर्तमान समय से कहीं आगे के लिए थी। मुझे भी अपने गांव के पुराने दिनों की याद है, जहां अपनी उम्र के एक पड़ाव, किशोरावस्था तक का समय यहां की आबो हवा में गुजरा था।

मुझे अच्छे से याद है कि पहले गांव में एक कहावत थी कि "एक का दुख, सबका दुख।" किसी के घर शादी हो तो सब मिल कर एक दूसरे की मदद, आगे बढ़ कर करते थे, पूरा गांव नाचता गाता था। और यदि किसी के घर में मौत का मातम हो तो पूरा गांव रोता था। दिल को छू लेने वाला, ईमानदारी वाला भाईचारा था।

लेकिन आज समाज को क्या हो गया है ? चाहे शहर हो या गाँव, कमोवेश आज हर जगह, रुपया-पैसा, रिश्तों से बड़ा हो गया है। भाई-भाई आपस में जमीन के लिए लड़ रहे हैं। कहीं बाप-बेटे में बोलचाल बंद है और कहीं चाचा-भतीजे में मुकदमा चल रहा है। हर परिवार में किसी ना किसी बात को लेकर विपत्ति दिखती है। पूरा सामाजिक ताना-बाना बिखर कर रह गया है।

पहले चौपाल पर जब चर्चा होती है, तब हर कोई एक दूसरे की बात को अच्छी तरह सुनता था, समझता था और मानता था, पकी अब तो हर कोई अपनी ही कहता है। कोई दूसरे की सुनने को तैयार नहीं। सबको लगता है, मैं ही सही हूं। सहनशीलता खत्म हो गई है। छोटी-छोटी बात पर लाठी चल जाती है। पहले लोग बात से मसला हल करते थे, अब लोग लात से हल करते हैं।

अचानक रामलाल दद्दा ने मेरे कंधे में हाथ रखते हुए कहा, "अरे गुड्डू भैया कहां खो गए"...? "कहीं नहीं दद्दा, आप दोनों को बातों ने मुझे यहां बिताए पुराने दिनों में पहुंचा दिया। आप लोगों की गांव - समाज के लिए चिंता बिल्कुल सही है, अब देखो ना, पहिले गांव मा घर कच्चा रहे, पर रिश्ता पक्का रहा। अब घर तो पक्का हो गया, पर रिश्ता कच्चा हो गया।"

"वाह गुड्डू भैया वाह क्या कही, तुमने तो हमारी दुखती रगों को कुरेद दिया, हाँ यह सच है कि हमने ईंट और सीमेंट से घर तो मजबूत बना लिए, पर विश्वास और प्रेम से रिश्तों को मजबूत करना भूल गए। आज गांव में बड़े-बड़े घर बन गए हैं, पर उन घरों के भीतर लोग अकेले हैं। दरवाजे पर तो ताला है ही, दिलों पर भी ताला है।" 

"मुख्य बात यह है कि जब तक हम लोग फिर से रिश्तों को रुपया पैसे और संपत्ति से ऊपर नहीं रखेंगे, तब तक गांव में ही क्या पूरे मानवीय समाज में, वह पहले वाली खुशबू वापस नहीं आएगी।"

राजनीति और व्यवस्था - कागज पर गांव, जमीन पर कुछ और

सामाजिक उथल पुथल में कुटिल राजनीति की भूमिका भी बहुत जिम्मेदार है। आज सरकारी दस्तावेजों में सारे गाँव चतुर्मुखी सुविधा सम्पन्न और खुशहाल हैं, मगर कोई भी सामान्य इंसान,गावों में जाकर, वहां के वास्तविक माहौल और स्थितियों का अध्ययन करे तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए।

उसे सारी असलियत सभी जगह एक जैसी मिलेगी, जैसे जन सुविधाओं और खेती की बदहाल स्थिति। इसीलिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि अब गांव के लोग भी राजनीति से बहुत दुखी हैं। उनका एक ही डायलॉग है, "नेता चुनाव के समय आते हैं, वादे करते हैं, हाथ जोड़ते हैं, पर चुनाव के बाद कोई नहीं पूछता।"

अच्छी व्यवस्था केवल कागजों पर ही है। फाइल में सब कुछ ओके है। फोटो में सब कुछ चमक रहा है। पर गांव के अंदर की हकीकत कुछ और ही कहानी कहती है। भ्रष्ट अधिकारी और नेता आपस में अपनी अपनी जेब गरम कर रहे हैं। सरकारी दस्तावेजों के आंकड़े और जमीनी हकीकत में जमीन आसमान का फर्क है।

शहरों में हो या गांवों में, सरकारी सुविधाएं लकवाग्रस्त हो गई हैं। अस्पतालों में दवा नहीं, स्कूलों में शिक्षक नहीं। सड़के आधी बनी है और आधी में गड्ढा है। नल में पानी नहीं और नहर भी सूखी है। बिजली आती कम है, जाती ज्यादा है। राशन की दुकानों में राशन कम मिलता है और जो मिलता भी है उसकी गुणवत्ता निम्न दर्जे की। 

यह असलियत कमोवेश हर गांव की है। चुनाव से पहले नेता जी आते हैं। कहते हैं, "सड़क बनवा देंगे, अस्पताल बनवा देंगे, स्कूल में मास्टर ला देंगे, नहर में पानी ला देंगे, खेती के लिए सस्ती दरों में बिजली, पानी और खाद," ऐसे में गांव के भोले-भाले लोग विश्वास कर लेते हैं और वोट दे देते हैं। फिर पांच साल तक इंतजार करते हैं। लेकिन अब गांव वाले भी नेताओं की कुटिलताओं को भली भांति समझने लगे हैं।

तभी बाबू चाचा कहते हैं, "गुड्डू भैया...सिस्टम का घोड़ा केवल कागज पर दौड़ता है, जमीन पर तो वह लंगड़ा ही है और इसमें दोष केवल नेता का नहीं, हमारा भी है। हम वोट जाति धर्म देखकर देते हैं, दारू और पैसे पर देते हैं। हम लोग काम देखकर वोट नहीं देते। जब तक हम जागरूक होकर सवाल पूछना नहीं सीखेंगे, तब तक व्यवस्था नहीं बदलेगी।" 

"अब हमें अपनी अगली पीढ़ी को इस तरह से तैयार करना है कि उनके अंदर हिम्मत और नई सोच पैदा हो कि वे ही अपने गांव और समाज के भविष्य के निर्माता हैं। इसलिए उन्हें सबके साथ मिल कर नेताओं से, अपनी वर्तमान और भविष्य की पीढ़ी के लिए सवाल पूछना चाहिए, सभी जिम्मेदारों से सवाल पूछे, प्रधान से सवाल पूछे, अधिकारियों से सवाल पूछे। और यह हमारा, तुम्हारा और सबका कानूनन हक भी है।" 

समाज का टूटा हुआ आईना

राम लाल दद्दा बोले,"गांव की चौपाल समाज का आईना होती है। चौपाल पर जाओ तो हर कोई अपनी समस्या बताता है। पहले चौपाल पर बड़े-बुजुर्ग बैठते थे, ज्ञान की बातें होती थीं। अब चौपाल में परिवार, समाज और गांव और किसान हित की बातें न के बराबर होती हैं पर राजनीति की बड़ी बड़ी बाते बहुत होती हैं। हर जगह राजनीति घुस गई है।"

  • किसान कहता है, "भैया, लागत बढ़ गई, फसल का दाम नहीं मिल रहा। हम करें तो का करें ?"
  • मजदूर कहता है, "भैया, शहर भाग जाई का ? गांव में काम नहीं मिल रहा।"
  • महिला कहती है, "भैया, महंगाई ने कमर तोड़ दी। बच्चन की फीस कैसे भरी ?"
  • युवा कहता है, "भैया, पढ़ लिखकर भी बेरोजगार बैठे हैं। नौकरी कहां है ?"

"असलियत तो ये कि सबकी समस्या सही है। सबका दुख सच्चा है, पर समाधान किसी के पास नहीं। क्योंकि हम सब समस्या बताते हैं, समाधान पर कोई बात नहीं करता। क्योंकि हम सब चाहते हैं कि कोई दूसरा आकर हमारी समस्या हल कर दे। हमारा अपने आप पर भरोसा उठ गया है, हम दूसरों के सहारे बैठे हैं।"

मैने बीच में ही टोकते हुए एक दार्शनिक की तरह बोला कि "देखो दद्दा, समाज का आईना बुरी तरह टूटा हुआ है और हर टुकड़े में अलग चेहरा दिख रहा है। कल के भविष्य के लिए आज की जरूरत है कि इस आईने को फिर से जोड़ा जाए। और इसके लिए सभी की सामूहिक भूमिका या जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।" दोनों बुजुर्ग मेरी बात से पूर्णतः सहमत नजर आए।

उम्मीद की किरण - अंधेरे में भी जलता दिया

इतनी सब निराशाजनक बातें सुनकर आपको लगेगा कि गांव में कुछ भी अच्छा नहीं है। पर ऐसा नहीं है। गांव की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वहां पर कितनी भी मुश्किल हो, वह हार नहीं मानता। गावों में उम्मीद का दिया अभी भी टिमटिमा रहा है।

मैंने देखा है, गांव की महिलाएं कैसे स्वयं सहायता समूह बनाती हैं। दस-बारह औरतें मिलकर हर हफ्ते थोड़ा-थोड़ा पैसा जमा करती हैं। उसी पैसे से किसी एक का काम चल जाता है। किसी ने बकरी खरीद ली, किसी की सिलाई मशीन आ गई। वह धीरे धीरे लेकिन चुपचाप क्रांति कर रही हैं। बिना शोर के। सबसे बड़ी बात, वह किसी नेता का इंतजार नहीं कर रही हैं 

मैंने देखा है, गांव के कुछ युवा कैसे खेती में नई तकनीक अपना रहे हैं। कोई यूट्यूब देखकर जैविक खेती कर रहा है, कोई ड्रिप सिंचाई लगा रहा है, कोई शहर में जाकर मशरूम की खेती सीखकर आया है। वह निरंतर यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि खेती घाटे का सौदा नहीं, अगर दिमाग से की जाए तो।

मैंने देखा है, गांव के बच्चे कैसे सुबह-सुबह साइकिल से पांच किलोमीटर दूर पढ़ने जाते हैं। उनके पास अच्छी यूनिफॉर्म नहीं है, पर आंखों में चमक है। वह गरीबी को भी अपनी किस्मत नहीं, चुनौती मानते हैं। यही छोटी-छोटी कोशिशें ही उम्मीद की किरण हैं। बड़ा बदलाव, हमेशा छोटे-छोटे कदमों से ही आता है।

इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं

बातों बातों में कितन वक्त बीत गया, पता ही नहीं चला। अब शाम हो चली थी, मैं तालाब किनारे से उठा और घर की ओर चल दिया। रामलाल दद्दा और बाबूराम चाचा की बातें सुनकर उस दिन मेरा मन बहुत भारी हो गया।  शाम ढलनी शुरू हो रही थी। आसमान में लालिमा थी। चिड़िया अपने घोंसले में लौट रही थीं। खेतों से किसान लौट रहे थे।

रास्ते भर दोनों की बातें बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर रही थी कि सच में हम सब धीरे धीरे मानवीय समाज के मूल तत्व,"संवेदनशीलता" से कितनी दूर निकल गए। मैंने आसमान की ओर देखा और सोचा, हम फिर से एक संवेदनशील समाज का पुनर्निर्माण कर सकते हैं। सचमुच, पूजा-पाठ से बड़ा धर्म है, इंसानियत। मंदिर में घंटा बजाने से ज्यादा पुण्य, किसी भूखे को रोटी खिलाने में है। मस्जिद में सजदा करने से ज्यादा सवाब, किसी रोते हुए को हंसाने में है।

गांव को बचाना है तो हमें फिर से इंसान बनना होगा।

हमें अपने बच्चों को फिर से रामायण, महाभारत की कहानियां नहीं, बल्कि उसके पीछे का संस्कार सिखाना होगा। हमें अपने युवाओं को फिर से खेत और किताब से जोड़ना होगा। हमें अपने रिश्तों में फिर से मिठास घोलनी होगी। हमें धर्म के शोर से निकलकर कर्म की शांति तक जाना होगा।

बाबूलाल दद्दा की एक बात हमेशा याद रहेगी, "गुड्डू भैया, गांव सुधरा तो देश सुधरेगा। लेकिन गांव तब ही सुधरेगा जब हर आदमी सोचेगा कि गांव मेरा है, यहां की मिट्टी, नदी, तालाब, पेड़, पौधे और पशु पक्षी सब हमारे हैं, हम इन सबसे हैं।"

तो आओ, आज से हम यह सोचें। यह मिट्टी मेरी है, यह खेत मेरा है, यह तालाब मेरा है, और इस गांव का हर आदमी मेरा है। अगर हर आदमी थोड़ा सा भी दूसरों के दुख में साथ दे, थोड़ा सा भी अपने सुख का हिस्सा बांट दे, तो यकीन मानो, किसी सरकारी योजना की जरूरत नहीं पड़ेगी। समाज खुद बदल जाएगा।

क्योंकि अंत में, गांव की पगडंडी ही हमें शहर की सड़क तक ले जाती है। अगर पगडंडी ही टूट गई, तो सड़क किस काम की ?

यह लेख किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि हम सबके लिए एक आईना है। इस आईने में अपना चेहरा देखो, और सोचो, हम गांव के लिए क्या कर सकते हैं...?

लेखक--मनोज भट्ट, कानपुर "सामाजिक ताना-बाना"
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ब्लॉग वेबसाइट: www.samajiktanabana.in ईमेल: manojbhatt@samajiktanabana.in

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