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भौतिकतावाद में सिमटती संवेदनाएं

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भौतिकतावाद  में सिमटती संवेदनाएं भटकाव का चक्रव्यूह “जब इंसान अंदर से पूरी तरह खाली और भटका हुआ हो जाता है, तो वह उस भयानक खालीपन को बाहर की निर्जीव वस्तुओं और व्यर्थ के शोर से भरने की कोशिश करता है।” हां यह सच है कि आज का इंसान इतना ज्यादा व्यस्त रहता है, जितना पहले कभी नहीं था। लेकिन सच यह भी है कि इतनी व्यस्तताओं के बाद भी वह जितना आज अकेला है उतना पहले कभी अकेला और खाली नहीं रहा।  चारों तरफ रोशनी है, स्क्रीन्स चमक रही हैं, आवाजें गूंज रही हैं, लेकिन अंदर एक सन्नाटा है जो दिन-ब-दिन गहरा होता जा रहा है। और इस भयावह सन्नाटे में आज का इंसान भटक गया है। लेकिन यह भटकाव कोई संयोग मात्र नहीं है।  पूरी दुनिया में अधिकांश सत्ता के शासकों द्वारा अपनी सत्ता को लंबे समय निर्बाध रूप से संचालित करने के लिए पर्दे के पीछे ऐसी गुप्त कूटनीति ( मनोरंजन की अफीम का चक्रव्यूह ) बनाई जाती है कि जिससे आम जन मानस, खासकर युवा वर्ग उसमें उलझ कर अपने मूल उद्देश्य से भटक जाए। जिसका उल्लेख इस लेख में विस्तार से आगे है। इस लेख में हम इन विचारों को विस्तार से समझेंगे, भारतीय संदर्भ में उनके प्रभावों ...