सपने : छोटे हों या बड़े, अपने हों

सपने : छोटे हों या बड़े, अपने हों

( श्रृंखला: लड़कियों की किशोरावस्था - भाग 11 )

किशोरियों की समझ, साहस और सपनों की यात्रा... सपना, जो सिर्फ तुम्हारा है

किशोरावस्था की दहलीज़ पर खड़ी हर लड़की के मन में स्वाभाविक सा एक सवाल कुलबुलाता है,“मैं बड़ी होकर क्या बनूँगी ?” यह सवाल सिर्फ करियर का नहीं होता है। यह पहचान का सवाल होता है। यह उस आवाज़ का सवाल है जो भीतर से कहती है, “मैं भी कुछ कर सकती हूँ, कुछ बन सकती हूँ।“

पिछले दस भागों में हमने किशोरावस्था के भ्रम, पहचान, संवाद, समाज, शिक्षा, डिजिटल दुनिया, भावनाओं, सीमाओं, पैसे और असफलता पर बात की। अब हम उस धागे को पकड़ते हैं जो इन सबको एक माला में पिरोता है,"तुम्हारा सपना"। सपना कोई लग्ज़री नहीं है। यह तुम्हारी ज़रूरत है। जैसे शरीर को साँस चाहिए, वैसे ही मन को दिशा चाहिए। और यही सपना ही तुम्हे दिशा देता है ।

लेख श्रृंखला का यह 11वाँ भाग तुम्हें यह नहीं बताएगा कि डॉक्टर बनो या टीचर। यह भाग तुम्हें यह बताएगा कि जो भी बनो, वह ‘तुम्हारा’ चुना हुआ हो। किसी के दबाव का नहीं, किसी की नकल का नहीं, किसी डर का नहीं।

1. ‘अनुमति’ का अदृश्य ताला खोलो

हमारे समाज में हमारी लड़कियों के सपनों की सबसे पहली मौत ‘परमिशन’ के नाम पर होती है। “पापा से पूछ लिया ?”“मम्मी मानेंगी ?”“शादी के बाद देखेंगे।“ ये वाक्य सुनते-सुनते लड़कियाँ अपनी चाहत को ही गलत समझने लगती हैं।

पर ध्यान रहे, सच्चाई यह है कि चिंता और कैद में फर्क होता है। माता-पिता की चिंता जायज़ है। वे तुम्हारी सुरक्षा चाहते हैं। पर सुरक्षा का मतलब यह नहीं कि तुम उड़ना ही छोड़ दो। इसका मतलब है कि तुम उड़ना सीखो, और उन्हें भरोसा दिलाओ कि तुम गिरोगी नहीं।

जब तुम्हें लगे कि घर वाले तुम्हारे सपने को नहीं समझ रहे, तो लड़ो मत, समझाओ। ज़िद से नहीं, ज़िम्मेदारी से। उन्हें अपना रोडमैप दिखाओ। साफ बताओ कि तुम क्या करना चाहती हो, कैसे करोगी, उसमें जोखिम क्या हैं और अगर वह रास्ता बंद हुआ तो प्लान-बी क्या होगा।

लेकिन यह विश्वास भी  हमेशा साथ रखना कि माता पिता अथवा घर वालों को जब तुम खुद अपने सपने को लेकर गंभीर और तैयार दिखोगी, तो निश्चित मानो कि घर वालों की ‘ना’ धीरे-धीरे तुम्हारे लिए ‘चलो कोशिश करो’ में बदलने लगती है।

याद रखो, सपना देखने के लिए किसी की अनुमति नहीं चाहिए। सपना निभाने के लिए हिम्मत और तैयारी चाहिए। वह हिम्मत तुम्हारे भीतर है। उसे एक मजबूत धरातल पर बस आवाज़ देनी है। जो तुम्हारी सफलता का पहला कदम साबित होगा।

2. ‘शादी बनाम करियर’, यह तुलना ही गलत है

हर किशोरियों के साथ ये अनुचित है कि सोलह-सत्रह की होते-होते उसके कान में एक बात डाल दी जाती है, “पढ़-लिख लो, फिर तो शादी ही करनी है।“ ऐसे शब्द उसके किशोरमन को विचलित कर देते हैं, जैसे शादी एक फुल-स्टॉप हो, जिसके बाद तुम्हारी कहानी खत्म।

जबकि यह सोच सबसे बड़ा झूठ है। विवाह, जीवन का एक पड़ाव है, मंज़िल नहीं। जैसे नौकरी एक पड़ाव है, दोस्ती एक पड़ाव है, यात्रा एक पड़ाव है। कोई भी एक पड़ाव तुम्हारी पूरी मंज़िल तय नहीं कर सकता।

इसलिए अपने दिमाग से यह निकाल दो कि तुम्हें करियर और विवाह में से किसी एक को चुनना ही है। सही मायने में तुम्हें चुनना है कि तुम अपनी ज़िंदगी के फैसले खुद लेना चाहती हो या किसी और के फैसले के नीचे दबकर जीना चाहती हो। 

लेकिन, तुम्हे अपनी समझ से और घर के बड़ों के अनुभवों के आधार पर निर्णय लेना चाहिए। तुम्हारी शादी बाईस की उम्र में हो या बत्तीस की, तुम माँ बनो या न बनो, ये कैलेंडर समाज का नहीं है। यह कैलेंडर सिर्फ तुम्हारा है। 

यूपीएससी निकालने वाली अट्ठाईस साल की दीदी भी सही है, और उन्नीस की उम्र में अपनी बेकरी खोलने वाली लड़की भी सही है। लेकिन उसमें शर्त सिर्फ एक है, कि फैसला उनका अपना होना चाहिए, किसी के दबाव का नहीं।

सर्व प्रथम एक बात स्पाट जान लो कि आर्थिक रूप से अपने पैरों पर खड़ा होना ही, भविष्य में तुम्हें ताकत देगा, चुनने की ताकत। क्योंकि जब तुम्हारे पास अपनी कमाई होगी, तो ‘एडजस्ट कर लो’, ‘सहन कर लो’ जैसे वाक्यों का बोझ अपने आप हल्का हो जाएगा।

इसलिए भूलकर भी तुम्हारा सपना यह तय करना नहीं होना चाहिए कि तुम शादी करोगी या नहीं। बल्कि सपना यह तय करना है कि तुम्हारी ज़िंदगी की बागडोर किसके हाथ में होगी, तुम्हारे या किसी और के।

3. ‘छोटा सपना’ जैसी कोई चीज़ नहीं होती

अक्सर हर परिवार में “बड़ा सोचो, बड़ा बनो”, कमोवेश यह लाइन इतनी बार दोहराई जाती है कि लड़कियाँ अपने छोटे-छोटे सपनों पर शर्मिंदा होने लगती हैं। लेकिन हमेशा ध्यान में रखो कि कोई भी सपना छोटा या बड़ा नहीं होता है। हर सपने को पूरा करने के लिए दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है।

जैसे कानपुर की नाज़िया को देखो। दसवीं के बाद उसने सिलाई सीखी। उसका सपना बहुत ‘बड़ा’ नहीं था। उसने सिर्फ इतना सोचा, “अपने मोहल्ले की चार-पाँच लड़कियों को सिलाई सिखा दूँ, ताकि महीने के दो हज़ार रुपये घर में आ जाएँ।“ 

और आज दो साल बाद नाज़िया तीस लड़कियों को ट्रेनिंग दे रही है। उसकी महीने की कमाई पच्चीस हज़ार से ऊपर है और उसकी अपनी एक छोटी-सी दुकान भी है। नाज़िया ने इसरो में रॉकेट नहीं बनाया, पर उसने तीस परिवारों की सोच को एक नई उड़ान दी है।

हर छोटे सपने की सबसे बड़ी खूबी यही है कि उसे शुरू करना आसान होता है। उसे शुरू करने के लिए लाखों की पूँजी नहीं चाहिए। पाँच सौ रुपये, एक हुनर और बहुत सारा जज़्बा काफी है। 

और जब वही एक छोटा सपना पूरा होता है, तो वह तुम्हारे भीतर एक आत्मविश्वास भरी आवाज़ पैदा करता है, “मैं कर सकती हूँ।“ यही आवाज़, यही आत्मविश्वास, तुम्हारे अगले, उससे आगे के बड़े सपने की पूँजी बन जाता है।

छोटा सपना फेल भी हो जाए तो चोट कम लगती है। लाखों की नौकरी छोड़कर किया गया स्टार्टअप अगर डूबे तो संभलना मुश्किल होता है। पर दो हज़ार रुपये का जोखिम अगर कामयाब न हो, तो तुम सिर्फ पैसे नहीं हारतीं, अनुभव जीतती हो। और अनुभव से महंगा कुछ नहीं।

इसलिए अगली बार अपने सपने को ‘छोटा’ कहकर मत कोसो। खुद से सिर्फ एक सवाल पूछो, “क्या यह सपना सच में मेरा है ?” अगर जवाब हाँ है, तो वह सपना दुनिया के सबसे बड़े सपने जितना ही कीमती है।

4. पोस्टर वाली रोल मॉडल नहीं, पड़ोस वाली दीदी खोजो

हम अक्सर कल्पना चावला, मैरी कॉम, पी.वी. सिंधु की तस्वीरें देखकर प्रेरणा लेते हैं। लेनी भी चाहिए। पर कई बार वे इतनी बड़ी लगती हैं कि हम सोचते हैं, “वे तो खास थीं, मैं तो साधारण हूँ।“

किशोरावस्था में तुम्हें पोस्टर नहीं चाहिए। तुम्हें एक ‘फ़ोन नंबर’ चाहिए। एक ऐसी दीदी, एक ऐसी आंटी, एक ऐसी दोस्त जो तुमसे सिर्फ दो कदम आगे हो। जिससे तुम बिना डरे पूछ सको, “दीदी, आपने कॉलेज में एडमिशन कैसे लिया ? स्कॉलरशिप का फॉर्म कहाँ मिलता है ? हॉस्टल में रैगिंग तो नहीं होती ?”

तुम्हारे आसपास ऐसी ‘रियल मॉडल’ बिखरी पड़ी हैं। कोई दीदी है जो तुमसे दो साल सीनियर है और उसने अभी-अभी नर्सिंग का कोर्स जॉइन किया है। कोई आंटी है जिसने तीस की उम्र में नौकरी छोड़कर घर से ही टिफिन सर्विस शुरू की और आज कामयाब है। कोई दादी-नानी है जिसने कभी स्कूल का मुँह नहीं देखा, फिर भी अपनी समझदारी से पूरा परिवार चलाया।

तुम्हारे काम का कोई न कोई जरूर मिलेगा, इनसे बात करो। इनकी कहानी सुनो। ये तुम्हें किताबी ज्ञान नहीं देंगी। ये तुम्हें ज़िंदगी के असली टिप्स देंगी। ये बताएंगी कि मुश्किलें आईं तो उन्होंने रास्ता कैसे निकाला।

बिहार के मधुबनी की अंशु की कहानी सुनो। पंद्रह साल की उम्र में उसने मिथिला पेंटिंग सीखी। उसका सपना था कि अपनी कला से कुछ कमाई करे। घर में माँ ने कहा, “ये सब सीख ले, शादी में काम आएगा।“ पर अंशु रुकी नहीं। उसने अपने फोन से ही इंस्टाग्राम पर पेज बनाया। पहला ऑर्डर तीन सौ रुपये का आया। 

उसे लगा जैसे दुनिया जीत ली। आज उन्नीस साल की अंशु के क्लाइंट जापान और फ्रांस तक में हैं। अंशु कोई सेलेब्रिटी नहीं है। वह तुम्हारे-हमारे जैसी लड़की है। उसने बस अपने ‘घर के हुनर’ को ‘दुनिया का करियर’ बना दिया। तुम्हें भी ऐसी ही अंशु अपने आसपास मिल जाएगी। उसे खोजो।

5. शौक को ‘सपने’ में बदलने का तरीका

“मुझे गाना अच्छा लगता है।“ “मुझे डांस पसंद है।“ “मुझे लिखना अच्छा लगता है।“ ये वाक्य सपने नहीं हैं। ये शौक हैं। इस तरह के शौक को भी अपना सपना बनाने के लिए उसे नाम, तारीख और प्लान देना पड़ता है।

जैसे, “मुझे डांस पसंद है” एक शौक है। “मैं अगले दो साल में कथक में विशारद करूंगी और फिर बच्चों को डांस सिखाऊंगी”, यह सपना है। यानि कि अपने शौक को अपनी जिंदगी में आधार बनाने के लिए किए गए सार्थक प्रयास को सपना कहते हैं।

इसे करने के चार आसान स्टेप हैं। 

पहला, अपने शौक को साफ-साफ नाम दो। “लिखना अच्छा लगता है” को बदलकर लिखो, “मैं छह महीने में बच्चों के लिए दस कहानियों की एक ई-बुक लिखूँगी।“

दूसरा, इस बड़े सपने को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ दो। ई-बुक लिखनी है ? तो तय करो कि पहले महीने में तुम दस कहानियों के आइडिया सोचोगी। दूसरे महीने में रोज़ तीन सौ शब्द लिखोगी। तीसरे महीने में एडिटिंग करोगी और कवर बनाओगी। चौथे महीने में उसे अमेज़न किंडल पर डाल दोगी। जब मंज़िल को छोटे कदमों में बाँट दोगे, तो डर नहीं लगेगा।

तीसरा, देखो कि तुम्हारे पास रिसोर्स क्या हैं। पैसा नहीं है ? यूट्यूब पर फ्री में सब कुछ सिखाया जाता है। लैपटॉप नहीं है ? मोबाइल में कैनवा ऐप से शानदार कवर बन जाता है। टीचर नहीं है ? सरकार के स्किल डेवलपमेंट सेंटर में पाँच सौ रुपये में कोर्स हो जाते हैं। बहाने बनाना बंद करो। जहाँ चाह है, वहाँ राह खुद निकलती है। और...

चौथा, सबसे ज़रूरी स्टेप, ‘लोग क्या कहेंगे’ का एंटी-वायरस अपने दिमाग में डाल लो। एक डायरी बनाओ। उसका नाम रखो “क्योंकि यह मेरा है”। जब भी कोई तुम्हारे सपने को लेकर टोके, हँसे या सवाल उठाए, तो उस डायरी में लिखो कि तुम यह काम क्यों कर रही हो। जब तुम खुद को जवाब दे दोगी, तो तुम्हें दुनिया को सफाई देने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

6. डरना ज़रूरी है, रुकना नहीं

“लड़की है, अकेले बाहर कैसे भेजें ?” स्वाभाविक रूप से यह डर हर माँ-बाप का होता है। और यह डर गलत भी नहीं है। दुनिया अभी भी लड़कियों के लिए पूरी तरह सेफ नहीं है। पर इस डर का जवाब घर में कैद हो जाना नहीं है। इसका जवाब है, होशियार हो जाना।

अपने सपनों के साथ-साथ अपनी ‘सेफ्टी किट’ भी तैयार करो। अगर तुम सोशल मीडिया पर अपने काम का पेज बना रही हो, तो अपना पर्सनल अकाउंट लॉक रखो। काम की पोस्ट पब्लिक करो, पर अपनी रीयल-टाइम लोकेशन कभी शेयर मत करो।

अगर तुम पढ़ाई या काम के लिए दूसरे शहर जा रही हो, तो जाने से पहले तीन महीने का खर्च अपने पास जोड़ लो। ताकि इमरजेंसी में तुम्हें टिकट के लिए भी किसी का मुँह न देखना पड़े।

अपना एक ‘ट्रस्ट सर्किल’ बनाओ। ऐसे तीन लोग जिन पर तुम आँख बंद करके भरोसा कर सको। एक घर का सदस्य, एक पक्की दोस्त, और एक मेंटर या टीचर। इन तीनों को हमेशा पता हो कि तुम कहाँ हो, किस इंटरव्यू के लिए जा रही हो, तुम्हारा हॉस्टल का पता क्या है।

और सबसे अहम बात, जैसा कि इसी लेख श्रृंखला के एक भाग में पहले ही बताया जा चुका है कि ‘ना’ कहना सीखो। अगर कोई तुमसे कहे कि “इंटर्नशिप का डिस्कशन रात दस बजे कैफे में करेंगे”, तो साफ मना कर दो। जो मौका असली होगा, वह दिन के उजाले में, ऑफिस के भीतर मिलेगा।

डर को अपना दुश्मन मत बनाओ। डर को अपना बॉडीगार्ड बनाओ। वह तुम्हें रोकेगा नहीं। डर तुम्हे चेतावनी देता है, वह बस तुम्हारे कान में कहेगा, “बेटा, इस गली से मत जाना, उधर अँधेरा है। दूसरी वाली गली से चलो, वहाँ उजाला है।"

7. सपना टूट जाए तो ? नया रास्ता बनाओ

ज़िंदगी हमेशा सीधी लाइन में नहीं चलती। कई बार हमारा सबसे प्यारा सपना टूट जाता है। नीट नहीं निकलता, किसी आर्ट कॉलेज में एडमिशन नहीं मिलता, घर की माली हालत ऐसी हो जाती है कि पढ़ाई छोड़नी पड़ती है। उस वक्त लगता है कि सब खत्म हो गया।

उस वक्त तुम्हारे पास दो रास्ते होते हैं। पहला, रोकर, खुद को कोसकर हार मान लेना। और दूसरा, थोड़ा रुकना, गहरी साँस लेना, और खुद से पूछना, “इस असफलता ने मुझे क्या सिखाया ? अब मैं इस हुनर का इस्तेमाल कहाँ कर सकती हूँ ?”

झाँसी की प्रिया को एयरफोर्स में पायलट बनना था। मेडिकल टेस्ट में वह रिजेक्ट हो गई। छह महीने तक वह डिप्रेशन में रही। फिर एक दिन उसने सोचा, “मुझे तो बस आसमान चाहिए था, वर्दी नहीं।“ उसने ड्रोन पायलट का कोर्स किया। आज प्रिया खेतों में ड्रोन से दवा छिड़काव करने वाली एक कंपनी में टीम लीडर है। उसे पायलट की वर्दी नहीं मिली, पर उड़ान मिल गई।

सूरत की हिना सीए बनना चाहती थी। तीन बार में भी फाइनल क्लियर नहीं हुआ। उसे लगा ज़िंदगी बेकार हो गई। पर उसे अकाउंट्स का बहुत अच्छा ज्ञान था। उसने छोटे-छोटे बुटीक और दुकानों का जीएसटी भरना शुरू किया। 

आज हिना की खुद की फर्म है, चालीस क्लाइंट हैं और उसने तीन और लड़कियों को नौकरी दी है। हिना के नाम के आगे सीए नहीं लगा, पर सीए वाला दिमाग उसके बहुत काम आया। ऐसे बहुत से उदाहरण समाज में हैं, जिनसे सीख ली जा सकती है।

इसलिए जब कोई एक दरवाज़ा बंद हो, तो दीवारों को मत पीटो। देखो, आसपास कोई खिड़की खुली है क्या, कोई ना कोई रास्ता अवश्य मिलेगा। असफलता तुम्हारे सपने की मौत का ऐलान नहीं है। वह सिर्फ एक नोटिफिकेशन है,“रास्ता बदलो, मंज़िल वही है।“

8. अकेले मत चलो, अपनी गैंग बनाओ

वैसे सपना तो तुम अकेले देखती हो, पर उसे पूरा करने के लिए तुम्हें एक टीम चाहिए। एक ऐसी टीम जो तुम्हें गिरने पर उठाए, भटकने पर रास्ता दिखाए और जीतने पर सबसे ज़ोर से ताली बजाए।

सोचो, तुम्हारी ‘सपनों वाली टीम’ में कौन-कौन होगा ? एक ‘चीअरलीडर’ ज़रूर होगा, तुम्हारी पक्की दोस्त या बड़ी बहन, जो, तुम जब भी थक जाओ, तो कहे, “उठ, तू कर लेगी।“ एक ‘मेंटॉर’ होगा, कोई टीचर, कोई यूट्यूबर, या तुम्हारे मोहल्ले की कोई आंटी जिसने अपना काम शुरू किया है। 

वह तुम्हें तकनीक सिखाएगा, गलतियों से बचाएगा। एक ‘अकाउंटबिलिटी पार्टनर’ होगा, तुम्हारे जैसी ही कोई और लड़की, जिसका सपना भी बड़ा है। तुम दोनों हर संडे एक-दूसरे से पूछोगे, “इस हफ्ते अपने गोल का कितना काम किया ?” 

और एक ‘क्रिटिक’ भी होगा, शायद तुम्हारे पापा या बड़े भाई। वह तुम्हें डराएंगे, मुश्किल सवाल पूछेंगे। उनसे नाराज़ मत होना। वे तुम्हारे दुश्मन नहीं हैं। वे चाहते हैं कि तुम हर सवाल के लिए तैयार रहो।

एक दृश्य, जो हर बच्चे और किशोर को समझ में आता है कि किस तरह से जंगल में शेर, अपने बच्चों को, बड़े होकर स्वतंत्र रूप से शिकार करने के लिए तैयार करता है। उसी तरह, अपने माता पिता और बड़ों की सीख और डांट को उसी भावना से लेना चाहिए। वे तुम्हे भविष्य के लिए बाहरी दुनिया का सामना करने का हुनर सिखाते हैं, तैयार करते हैं।

अगर तुम्हें ऐसी टीम न मिले, तो खुद बनाओ। अपने स्कूल या मोहल्ले में ‘सपनों वाली दीवार’ शुरू करो। एक चार्ट लगाओ, जहाँ हर लड़की अपना एक सपना लिखे। महीने में एक बार सब मिलो और एक-दूसरे की प्रोग्रेस पूछो। जब दस लड़कियाँ एक साथ बैठकर अपने सपनों पर बात करती हैं, तो ‘लोग क्या कहेंगे’ की आवाज़ अपने आप बहुत छोटी हो जाती है।

9. अंतिम बात: ‘असली’ बनो, ‘आदर्श’ नहीं

हमेशा से समाज को एक ‘आदर्श लड़की’ चाहिए होती है। जो चुपचाप पढ़े-लिखे, पर ज़्यादा सवाल न करे। जो अपने पैसे तो कमाए, पर घर को पहली प्राथमिकता दे। जो अगर कभी बोले भी तो, हमेशा धीरे और मीठा।

पर तुम्हारा सपना तुम्हें ‘आदर्श’ नहीं बनाता। तुम्हारा सपना तुम्हें ‘असली’ बनाता है। और असली इंसान परफेक्ट नहीं होता। असली लड़की कभी गुस्सा करती है, कभी गलती करती है, कभी अपना रास्ता बदल लेती है। पर वह "खुद' होती है। किसी की फोटोकॉपी नहीं।

आज अपने आप से तीन वादे करो। 

पहला, मैं अपनी तुलना किसी से नहीं करूँगी। शर्मा जी की बेटी डॉक्टर है और तुम पेंटर हो, तुम दोनों की थाली अलग है, तुम दोनों की भूख अलग है। 

दूसरा, मैं ‘परफेक्ट टाइम’ का इंतज़ार नहीं करूँगी। नब्बे परसेंट तैयारी के साथ शुरू कर देना, सौ परसेंट का इंतज़ार करने से लाख गुना बेहतर है। और....

तीसरा, सबसे खूबसूरत वादा, जब मैं एक सीढ़ी चढ़ जाऊँगी, तो पीछे वाली लड़की के लिए रस्सी ज़रूर लटकाऊँगी। क्योंकि एक लड़की का कामयाब होना एक क्रांति है। पर जब एक लड़की दूसरी लड़की का हाथ पकड़कर उसे ऊपर खींचती है, तो वह क्रांति एक परंपरा बन जाती है।

लेखक के विचार:-- तुम एक चलता-फिरता कल हो

भाग दो में हमने कहा था, “तुम सिर्फ एक भूमिका नहीं हो, तुम एक संभावना हो।“ आज भाग ग्यारह में हम उस संभावना को नाम दे रहे हैं, चेहरा दे रहे हैं, पंख दे रहे हैं।

दुनिया को तुम्हारी डिग्री से, तुम्हारी सैलरी से, तुम्हारे पद से फर्क नहीं पड़ता। दुनिया को सिर्फ एक बात से फर्क पड़ता है, कि तुमने अपनी ज़िंदगी के फैसले खुद लिए हैं क्या ? तुम गाँव में मशरूम उगाकर महीने के बीस हज़ार कमाओ, या न्यूयॉर्क में बैठकर कोडिंग करो, अगर यह चुनाव तुम्हारा है, तो यह फैसला बड़ा है। बहुत बड़ा।

सपने देखने की सबसे सही उम्र यही है। जो तुम आज सोलह की उम्र में सोचोगी, वही तुम छब्बीस की उम्र में बनोगी। अगर छब्बीस की उम्र में तुम्हें लगे कि नहीं, अब कुछ और करना है, तो छत्तीस की उम्र में तुम फिर से नई शुरुआत कर सकती हो। 

"ज़िंदगी कोई एक उत्तर वाला सवाल नहीं है। यह मल्टीपल चॉइस है। और हर चॉइस तुम्हारी है।" 

तो आज रात जब तुम सोने जाओ, तो छत को देखते हुए खुद से एक सवाल पूछना। “अगर मेरे मन में कोई डर न होता, पैसे की कोई कमी न होती, और लोगों की कोई परवाह न होती... तो मैं क्या बनना चाहती ?”

जो भी जवाब तुम्हारे दिल से आए, उसे एक कागज़ पर लिख लेना। और सुबह उठकर उस जवाब की तरफ एक छोटा सा कदम बढ़ा देना। बस एक कदम।

क्योंकि जिस दिन एक लड़की अपना सपना खुद चुनती है, उस दिन वह सिर्फ करियर नहीं चुनती। उस दिन वह अपनी आवाज़ चुनती है। और जिस लड़की के पास अपनी आवाज़ होती है, उसी से समाज की तस्वीर बदलती है।

अगले और अंतिम भाग में हम मिलेंगे इस यात्रा के समापन पर, “जब एक लड़की आगे बढ़ती है...”। तब तक तुम अपने सपने को जीना शुरू कर दो। क्योंकि सपना देखने और सपने को जीने के बीच का फासला सिर्फ एक फैसले का है। और वह फैसला तुम्हारा है। 

लेखक - मनोज कुमार भट्ट, कानपुर  

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